क्या विदेशी फंड वाले NGO की संपत्ती जब्त करने वाली है सरकार? समझें FCRA Amendment Bill का विवाद
FCRA Amendment Bill: 25 मार्च को FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) संशोधन बिल 2026, लोकसभा में पेश हुआ था। यह बिल तय करता है कि जिन संगठनों का FCRA लाइसेंस रद्द, सरेंडर या एक्सपायर हो जाए, उनकी विदेशी फंड से बनी संपत्ति कहां जाएगी। प्रस्तावित कानून कहता है कि एक डेजिग्नेटेड अथॉरिटी बनेगी जो ऐसी संपत्ति को अपने कब्जे में लेगी।
मानसून सत्र में इसे चर्चा के लिए रखा जाना था, लेकिन विपक्ष और कुछ सामाजिक संगठनों के विरोध के बाद सरकार ने चर्चा फिलहाल टाल दी। अब इसके नौ अगस्त के आसपास दोबारा पेश किए जाने की खबर है।
यह आपसे क्यों जुड़ा है
आप सोच सकते हैं कि यह सिर्फ NGO वालों का मामला है, लेकिन जरा रुकिए। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में सैकड़ों संगठन विदेशी फंड से स्कूल, अस्पताल और लाइब्रेरी चला रहे हैं। अगर इनका लाइसेंस रिन्यू नहीं होता तो जिस अस्पताल में आपका इलाज होता है या जिस स्कूल में आपके बच्चे पढ़ते हैं, वो भी इस दायरे में आ सकता है।
पहले इस कानून में क्या होता था
अभी के कानून में भी यह प्रावधान है। FCRA एक्ट की धारा 15 के तहत, अगर किसी संगठन का लाइसेंस रद्द होता है या वो खुद सरेंडर करता है तो उसकी विदेशी संपत्ति राज्य सरकार के पास चली जाती है। यह व्यवस्था 2010 से ही लागू है। तो फिर अब आपत्ति क्यों..?
दरअसल दिक्कत यह रही है कि राज्य सरकारें ऐसी संपत्ति संभाल नहीं पाईं। पिछले एक दशक में करीब 20 हजार लाइसेंस रद्द हो चुके हैं और 15 हजार से ज्यादा एक्सपायर हो गए हैं।
इतनी बड़ी संख्या में बिखरी संपत्ति का हिसाब- किताब रखने और उसे संभालने का कोई केंद्रीय ढांचा ही नहीं था। तो यही खालीपन भरने के लिए नया बिल लाया गया है।
FCRA बिल के बारे में थोड़ा गहराई से समझते हैं
नया बिल तीन बड़े बदलाव लाता है।
- पहला, अब सिर्फ रद्द या सरेंडर होने पर ही नहीं, बल्कि रिन्यूअल नहीं कराने पर भी संपत्ति सरकार के कब्जे में होगी।
- दूसरा, एक केंद्रीय डेजिग्नेटेड अथॉरिटी बनेगी जो पूरे देश की ऐसी संपत्ति संभालेगी।
- तीसरा, अगर संगठन को नया लाइसेंस मिल जाए तो संपत्ति वापस मिल सकती है, लेकिन तय समय में ऐसा न हो तो संपत्ति वापस नहीं मिलेगी।
इसे एक उदाहरण से समझते हैं....
मान लीजिए किसी संस्था ने विदेशी चंदे से एक अस्पताल बनाया। बाद में वो सिर्फ भारतीय दान से उसे चलाने लगी और FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) लाइसेंस रिन्यू कराना बंद कर दिया। नए कानून के तहत, यह पूरा अस्पताल अब सरकार के पास जा सकता है। भले ही वो सालों से विदेशी पैसे पर निर्भर न हो।
यहीं से विवाद शुरू होता है। सरकार का तर्क है कि यह सिर्फ पारदर्शिता के लिए है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, 15 जुलाई 2026 तक देश में 14 हजार 449 सक्रिय FCRA लाइसेंस थे। जबकि 22 हजार 498 रद्द हो चुके थे और 15 हजार 212 एक्सपायर हो चुके थे।
2019 से 2022 के बीच 13 हजार 520 संगठनों को कुल 55 हजार 741 करोड़ रुपए का विदेशी चंदा मिला। इतनी बड़ी रकम पर निगरानी के लिए एक साफ ढांचा जरूरी है, यह सरकार की दलील है।
लेकिन विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों को यह प्रावधान डरा रहा है। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि जो संगठन बरसों पहले विदेशी फंड से हटकर सिर्फ भारतीय दान पर चल रहे हैं, वो भी इस दायरे में आ जाएंगे। सोचिए, अगर आपने बरसों पहले लिया कर्ज चुका दिया हो, फिर भी बैंक आपकी संपत्ति जब्त करने आ जाए, तो कैसा लगेगा?
इस मामले में कौन-कौन शामिल है
गृह मंत्रालय इस बिल का मुख्य प्रस्तावक है। इसे राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में पेश किया था। विपक्षी दल इसे ड्रैकोनियन यानी बेहद सख्त बता रहे हैं। कई ईसाई संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता समूह भी विरोध में सामने आए हैं।
ऐसा इसलिए, क्योंकि प्रार्थना स्थल जैसी संपत्तियां भी इस दायरे में आ सकती हैं। हजारों वे NGO भी इस बहस के केंद्र में हैं जिनका लाइसेंस पहले ही रद्द या एक्सपायर हो चुका है।
दोनों साइड की बातें
सरकार का पक्ष साफ है। मौजूदा कानून में वेस्टिंग यानी जब्ती का कोई ठोस तरीका नहीं था। हजारों करोड़ की संपत्ति कानूनी अनिश्चितता में फंसी थी। नया ढांचा इसे सुलझाने के लिए है, न कि किसी को परेशान करने के लिए। सरकार यह भी कहती है कि बिल में यह कहीं नहीं लिखा कि पुरानी वेस्ट हो चुकी संपत्तियां दोबारा इस दायरे में आएंगी।
दूसरी तरफ, विरोध करने वालों का कहना है कि यह प्रावधान संगठनों को हमेशा के लिए FCRA के जाल में बांध देगा। अगर संपत्ति बचानी है तो हर पांच साल रिन्यूअल कराते रहना ही पड़ेगा, भले ही विदेशी फंड की जरूरत ही न बची हो।
अमेरिकी कांग्रेसमैन रिले मूर ने भी दावा किया कि यह बिल सरकार को चर्च और धार्मिक संस्थाओं पर कब्जे का रास्ता दे सकता है। हालांकि यह उनका अपना आकलन है और भारत सरकार ने इस पर कोई पुष्टि नहीं की है।
FCRA बिल का MP, RJ, CG कनेक्शन
मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सैकड़ों संगठन FCRA के तहत रजिस्टर्ड हैं, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और आदिवासी कल्याण के क्षेत्र में काम करते हैं। अगर इनमें से किसी का लाइसेंस रिन्यू नहीं होता, तो नए कानून का सीधा असर इन राज्यों के स्कूलों, अस्पतालों और सामुदायिक केंद्रों पर पड़ सकता है। हालांकि इन तीनों राज्यों में किसी विशेष संगठन पर अभी तक इस बिल के तहत कार्रवाई की पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए यह जोड़ना जरूरी है कि यह आशंका है, कोई तय घटना नहीं।
आगे क्या होगा
बिल अभी संसद में लंबित है। मानसून सत्र में इस पर चर्चा एक बार टल चुकी है। अब इसके फिर से आने की उम्मीद है। अगर यह पास होता है, तो अगले कुछ महीनों में हजारों संगठनों को अपनी संपत्ति की स्थिति साफ करनी होगी।
लंबी अवधि में यह तय होगा कि भारत में सामाजिक कार्य के लिए विदेशी फंडिंग कितनी आसान या मुश्किल बनती है। सवाल अभी भी खुला है। क्या यह बिल इसी रूप में पास होगा, या विपक्ष के दबाव में कोई बदलाव आएगा?
एक बात जो आप नहीं जानते थे
ज्यादातर लोगों को लगता है कि यह वेस्टिंग वाला नियम बिल्कुल नया है। असल में यह 2010 से ही कानून का हिस्सा है। नया बिल सिर्फ इसे रद्द और सरेंडर से आगे बढ़ाकर एक्सपायरी तक फैला रहा है। इसे संभालने के लिए एक केंद्रीय अथॉरिटी बना रहा है। यानी विवाद पुराने नियम का दायरा बढ़ाने को लेकर है, नियम के वजूद को लेकर नहीं।
अब आप क्या करें
अगर आप किसी NGO, ट्रस्ट या धार्मिक संस्था से जुड़े हैं जिसका FCRA लाइसेंस है, तो रिन्यूअल की तारीख और उपयोग की शर्तें अभी चेक कर लें।
- क्यों अभी: बिल पास होते ही रिन्यूअल न कराना सीधे संपत्ति खोने का कारण बन सकता है।
- आगे देखें: संसद में इस बिल पर अगली चर्चा की तारीख और उसमें आने वाले संशोधन।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह मामला सिर्फ प्रशासनिक नहीं, संवैधानिक भी है। संविधान का अनुच्छेद 25 धर्म पालन और प्रचार का अधिकार देता है, और प्रार्थना स्थलों की संपत्ति पर सरकारी नियंत्रण इस अधिकार से टकरा सकता है।
साथ ही, बिना अपील और सुनवाई के मौके के लाइसेंस रिन्यू न करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत पर सवाल खड़े करता है। पारदर्शिता और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन यहीं तय होगा।
FAQ
- FCRA संशोधन बिल 2026 क्या है?
यह एक प्रस्तावित कानून है जो तय करता है कि जिन संगठनों का FCRA लाइसेंस रद्द, सरेंडर या एक्सपायर हो जाए, उनकी विदेशी फंड से बनी संपत्ति एक केंद्रीय अथॉरिटी के पास जाएगी। यह अभी संसद में लंबित है। - क्या यह बिल पुराने संगठनों पर भी लागू होगा?
विपक्ष का दावा है कि यह पुराने वेस्ट हो चुके मामलों पर भी लागू हो सकता है, लेकिन सरकार ने बिल में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं किया है। यह विवाद का एक बड़ा बिंदु है। - इस बिल का धार्मिक संस्थाओं पर क्या असर होगा?
अगर कोई प्रार्थना स्थल विदेशी फंड से बना है और उसका लाइसेंस रिन्यू नहीं होता, तो वो भी वेस्टिंग के दायरे में आ सकता है। बिल कहता है कि ऐसी संपत्ति का धार्मिक स्वरूप बना रहेगा।
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