NCP में नया संग्राम, जानिए पार्थ ने कैसे बदल दी महाराष्ट्र की पूरी सियासी बिसात?
Jinesh Jain | Jul 27, 2026, 20:09 IST
पार्थ पवार ने बदली महाराष्ट्र की पूरी सियासी बिसात, एनसीपी में नया संग्राम
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में अजीत पवार के बेटे पार्थ पवार 6 महीने पहले तक पर्दे के पीछे दिखते थे। लेकिन, अब वे पावर सेंटर बनकर उभर रहे हैं। उन्होंने पिता के निधन के बाद बिखराव के मुहाने पर खड़ी पार्टी को संभाला है। आइए समझतें हैं उनकी पूरी प्रोफाइल:
महाराष्ट्र की सियासत में पवार सरनेम का मतलब हमेशा से ही सत्ता का केंद्र रहा है। लेकिन इस कद्दावर राजनीतिक घराने के भीतर एक ऐसा किरदार भी है, जो बरसों तक सिर्फ नेपथ्य में रहा।
इस साल जनवरी तक 36 वर्षीय पार्थ पवार की पहचान बेहद सीमित थी। अजीत पवार के बेटे पार्थ ने 2019 में मावल लोकसभा सीट से 2.15 लाख वोटों की करारी हार झेली। वे बैठकों में चुपचाप एक कोने में बैठने वाले मूक दर्शक की भूमिका में रहे।
वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि अजीत दादा खुद अपने बेटे को अहम सियासी फैसलों से दूर रखते थे। पुणे नगर निगम चुनावों के वक्त पार्थ को साफ हिदायत दे दी गई कि वे चुनाव प्रचार से दूर देश से बाहर ही रहें।
बीते छह महीनों में महाराष्ट्र की राजनीति ने जो करवट ली है, उसने इस समीकरण को पूरी तरह पलट कर रख दिया है। वही पार्थ पवार आज राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के राष्ट्रीय महासचिव और पावर सेंटर बनकर उभरे हैं।
इस नाटकीय बदलाव की शुरुआत हुई एक दुखद हादसे से। इस साल की शुरुआत में एक विमान दुर्घटना में अजीत पवार के अचानक निधन ने पार्टी में गहरा शून्य पैदा कर दिया।
अजीत दादा के जाते ही उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष की कमान सौंपी गई। लेकिन, पर्दे के पीछे से इस पूरी बिसात के मोहरे पार्थ पवार सेट कर रहे थे। अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि आज संगठन का कोई भी छोटा या बड़ा फैसला पार्थ की हरी झंडी के बिना आगे नहीं बढ़ता।
समर्थकों की नजर में पार्थ ऐसे वफादार बेटे हैं, जिन्होंने पिता के जाने के बाद बिखराव के मुहाने पर खड़ी पार्टी को संभाला है। वे 2029 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए संसाधन जुटाने से लेकर संगठनात्मक नियुक्तियों तक में रात-दिन एक कर रहे हैं।
लेकिन आलोचकों का नजरिया अलग है। उनका आरोप है कि पार्थ के उभार ने एनसीपी के मूल लोकतांत्रिक चरित्र को ही बदल दिया है। फैसले अब चुनिंदा लोगों के बंद कमरों में हो रहे हैं।
दशकों की वरिष्ठता को दरकिनार कर व्यक्तिगत वफादारी का इनाम दिया जा रहा है। इसी खींचतान का नतीजा है कि सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल जैसे अनुभवी और कद्दावर नेता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
एनसीपी की राजनीतिक जड़ें महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों, सहकारी चीनी मिलों और किसान आंदोलनों से जुड़ी रही हैं। इसके ठीक उलट पार्थ का पालन-पोषण ठेठ शहरी और अभिजात माहौल में हुआ।
वे पवार परिवार के इकलौते ऐसे सदस्य हैं, जिनका जन्म तत्कालीन मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास वर्षा में हुआ। जब उनके दादा शरद पवार राज्य के सीएम थे।
परिवार के एक बुजुर्ग याद करते हैं कि अस्पताल से आए नवजात पार्थ को सबसे पहले अपनी गोद में लेने वाली उनकी बुआ सुप्रिया सुले ही थीं।
यही वजह है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सुप्रिया और पार्थ के रिश्ते हमेशा मधुर रहे। जब पुणे के विवादित जमीन सौदे में पार्थ घिरे, तो विपक्ष में होने के बाद भी सुप्रिया ने उन पर सीधा हमला करने से गुरेज किया।
मुंबई के प्रतिष्ठित कैम्पियन स्कूल से शुरुआती पढ़ाई के बाद पार्थ बिजनेस मैनेजमेंट का कोर्स करने लंदन गए। हालांकि, पढ़ाई अधूरी छोड़कर लौटे। बाद में कॉमर्स में ग्रेजुएशन किया। दोस्तों के बीच वे फुटबॉल प्रेमी के रूप में जाने जाते थे। इनकी दिलचस्पी राजनीति से ज्यादा बाहरी दुनिया में थी।
पार्थ का नाम पहली बार 2013 में विवादों में आया। मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन के एक अधिकारी की गाड़ी में तोड़फोड़ के मामले में उनका नाम उछला।
तब उनके पिता अजीत पवार उपमुख्यमंत्री थे। बाद में वह शिकायत वापस ले ली गई। लेकिन पार्थ का असली राजनीतिक पर्दापण 2019 के लोकसभा चुनाव में हुआ।
लेकिन, उनके लिए बेहद अनुभव कड़वा रहा। कहा जाता है कि शरद पवार खुद उन्हें टिकट देने के पक्ष में नहीं थे। मावल सीट पर शिवसेना के श्रीरंग बारणे ने पार्थ को 2.15 लाख से अधिक वोटों से धूल चटा दी। पवार परिवार के इतिहास में चुनाव हारने वाले वे पहले सदस्य बने।
इसके बाद भी विवादों का सिलसिला नहीं थमा। 2020 में जब पूरी एनसीपी अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में महाराष्ट्र पुलिस के साथ खड़ी थी।
तब पार्थ ने अचानक सीबीआई जांच की मांग कर डाली। तब भड़के शरद पवार ने सार्वजनिक रूप से उन्हें अपरिपक्व करार दिया था।
राजनीतिक रूप से बार-बार किनारे किए जाने के बावजूद पार्थ ने उम्मीद नहीं छोड़ी। वे चुपचाप विधायकों की बैठकों में शामिल होते रहे।
सत्ता के गलियारों में निर्णय लेने की प्रक्रिया को गहराई से देखते रहे। इस बात का बारीक हिसाब रखते रहे कि कौन उनके पिता का सच्चा वफादार है और कौन मौकापरस्त। इसी दौरान उन्होंने अपनी एक अलग टीम तैयार कर ली।
पार्थ के राजनीतिक सफर में पहला बड़ा मोड़ 2023 में आया। तब अजीत पवार ने बगावत कर पार्टी तोड़ दी। महायुति सरकार में शामिल हो गए।
पवार परिवार की नई पीढ़ी के दो बड़े चेहरे रोहित पवार और युगेंद्र पवार उस समय शरद पवार के खेमे में ही बने रहे।
अलग हुई एनसीपी में पार्थ के सामने अपनी पीढ़ी का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं बचा। पिता के रहते हुए तो वे पर्दे के पीछे ही रहे। लेकिन, इस साल अजीत दादा के निधन ने पासा ही पलट दिया।
अजीत पवार के जाने के बाद पार्थ ने अपनी मां सुनेत्रा पवार को सक्रिय राजनीति में बनाए रखा। पार्थ के दबाव में सुनेत्रा को राज्यसभा भेजा गया। बाद में उपमुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया गया।
मां सुनेत्रा ने भी बेटे के हर फैसले का मूक समर्थन किया। चाहे वह चुनाव आयोग को पत्र लिखकर पुराने पत्राचार को खारिज कराना हो या राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सूची से पुराने क्षत्रपों को बाहर करना।
पिता और पुत्र के काम करने के तरीके में जमीन-आसमान का फर्क है। अजीत पवार की सबसे बड़ी ताकत उनकी सुलभता थी।
कोई भी विधायक सीधा उनके केबिन में घुसकर काम बता सकता था और दादा तुरंत सामने अधिकारी को फोन लगा देते थे।
इसके विपरीत पार्थ बेहद अंतर्मुखी हैं। वे मीडिया से बचते हैं। रैलियों को संबोधित नहीं करते। बड़ी सभाओं के बजाय वन-ऑन-वन बैठकों पर भरोसा करते हैं।
मुंबई, पुणे और बारामती के दफ्तरों से लेकर सुनेत्रा पवार के सरकारी आवास देवगिरी तक पार्थ तक पहुंचने का रास्ता कठिन हैं। यह रास्ता उनके चुनिंदा वफादार सहायकों के घेरे से होकर ही गुजरता है।
महाराष्ट्र के एक अधिकारी कहते हैं, आमतौर पर किसी नेता के साथ दो साल काम करने के बाद हम उन्हें समझ जाते हैं। यह जान लेते हैं कि उसकी सोच क्या है।
लेकिन, मैं आज तक ऐसे किसी अफसर से नहीं मिला, जो यह दावा कर सके कि उसने पार्थ पवार को पूरी तरह डिकोड कर लिया है।
सिर्फ भरोसेमंद सलाहकारों की सुनना कभी-कभी नुकसानदेह भी साबित होता है। अमाडिया एंटरप्राइजेज का रद्द हुआ पुणे लैंड डील मामला इसका बड़ा उदाहरण है।
अफसरों का कहना है कि अगर पार्थ ने अपने पिता के पुराने अधिकारियों से सलाह ली होती तो वे कभी उस सौदे में हाथ न डालते।
मार्च के महीने में एनसीपी ने चुनाव आयोग को अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की नई सूची भेजी। इसमें प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे और राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल का नाम गायब था।
हालांकि बाद में इसे टाइपिंग की गलती बताकर सुधार लिया गया, लेकिन इसने पुराने नेताओं के कान खड़े कर दिए।
तनाव तब और बढ़ गया जब तटकरे और पटेल ने सुनेत्रा पवार को बिना बताए सीएम देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात की।
खबर फैलते ही अगले ही दिन पार्थ खुद फडणवीस से मिलने पहुंचे। यह संदेश साफ कर दिया कि भविष्य में किसी भी बातचीत की जानकारी उपमुख्यमंत्री को होनी चाहिए।
इसके बाद सुनेत्रा पवार के अध्यक्ष पद को कानूनी चुनौती दी गई। प्रफुल्ल पटेल ने सार्वजनिक रूप से सुधारात्मक कदमों की मांग की।
पार्टी उपाध्यक्ष उदयकुमार अहेर ने पार्थ को केंद्रीय कैबिनेट में शामिल करने की मांग उठाकर हलचल मचा दी। सूत्रों का कहना है कि पार्थ की इसी मेरी मर्जी या रास्ता नापो वाली कार्यशैली से तटकरे और पटेल जैसे नेता तंग आ गए हैं। अब वे शरद पवार गुट के साथ विलय के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।
दूसरी तरफ, भाजपा पार्थ के इस उभार को एनसीपी का अंदरूनी मामला मानकर देख रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि जब तक महायुति के हितों को नुकसान नहीं पहुंचता, पार्थ पार्टी में क्या करते हैं उससे उन्हें फर्क नहीं पड़ता।
वहीं, शरद पवार की एनसीपी (एसपी) के नेता पारिवारिक मर्यादा का हवाला देकर इस पूरे विवाद पर साधु की तरह मौन साधे हुए हैं।
पार्थ पवार आज अपनी राजनीतिक यात्रा के सबसे संवेदनशील मोड़ पर खड़े हैं। उन्होंने भले ही संगठन की कमान पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली हो। लेकिन, जनता और विधायकों के बीच अपनी राजनीतिक प्रामाणिकता साबित करना अभी बाकी है।
उन्होंने अभी तक शासन, नीति या अपनी राजनीतिक विचारधारा पर खुलकर कोई बात नहीं की है। वे आज भी अपने पिता की छोड़ी विरासत और अपनी मां के भरोसे के दम पर पार्टी चला रहे हैं।
एनसीपी के ही एक मंत्री टिप्पणी की कि विधायकों को जोड़े रखना अजीत दादा का हुनर था। पार्थ ने फिलहाल अपने पिता के नाम के अलावा कुछ नया पेश नहीं किया है।
वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर भाजपा नेतृत्व से सीधी बात करना उनके अहंकार को संतुष्ट कर सकता है। लेकिन, यह फॉर्मूला तभी तक कामयाब रहेगा जब तक विधायक उनके साथ खड़े हैं।
2029 के विधानसभा चुनाव दूर नहीं हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पार्थ पवार केवल अपने पिता के नाम की ढाल से पार्टी की कश्ती पार लगा पाएंगे। या फिर अपने विरोधियों को मात देकर महाराष्ट्र की राजनीति में अपना खुद का एक नया अध्याय लिखेंगे।
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इस साल जनवरी तक 36 वर्षीय पार्थ पवार की पहचान बेहद सीमित थी। अजीत पवार के बेटे पार्थ ने 2019 में मावल लोकसभा सीट से 2.15 लाख वोटों की करारी हार झेली। वे बैठकों में चुपचाप एक कोने में बैठने वाले मूक दर्शक की भूमिका में रहे।
वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि अजीत दादा खुद अपने बेटे को अहम सियासी फैसलों से दूर रखते थे। पुणे नगर निगम चुनावों के वक्त पार्थ को साफ हिदायत दे दी गई कि वे चुनाव प्रचार से दूर देश से बाहर ही रहें।
बीते छह महीनों में महाराष्ट्र की राजनीति ने जो करवट ली है, उसने इस समीकरण को पूरी तरह पलट कर रख दिया है। वही पार्थ पवार आज राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के राष्ट्रीय महासचिव और पावर सेंटर बनकर उभरे हैं।
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अजीत दादा के जाते ही उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष की कमान सौंपी गई। लेकिन, पर्दे के पीछे से इस पूरी बिसात के मोहरे पार्थ पवार सेट कर रहे थे। अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि आज संगठन का कोई भी छोटा या बड़ा फैसला पार्थ की हरी झंडी के बिना आगे नहीं बढ़ता।
समर्थकों की नजर में पार्थ ऐसे वफादार बेटे हैं, जिन्होंने पिता के जाने के बाद बिखराव के मुहाने पर खड़ी पार्टी को संभाला है। वे 2029 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए संसाधन जुटाने से लेकर संगठनात्मक नियुक्तियों तक में रात-दिन एक कर रहे हैं।
लेकिन आलोचकों का नजरिया अलग है। उनका आरोप है कि पार्थ के उभार ने एनसीपी के मूल लोकतांत्रिक चरित्र को ही बदल दिया है। फैसले अब चुनिंदा लोगों के बंद कमरों में हो रहे हैं।
दशकों की वरिष्ठता को दरकिनार कर व्यक्तिगत वफादारी का इनाम दिया जा रहा है। इसी खींचतान का नतीजा है कि सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल जैसे अनुभवी और कद्दावर नेता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
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परिवार के एक बुजुर्ग याद करते हैं कि अस्पताल से आए नवजात पार्थ को सबसे पहले अपनी गोद में लेने वाली उनकी बुआ सुप्रिया सुले ही थीं।
यही वजह है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सुप्रिया और पार्थ के रिश्ते हमेशा मधुर रहे। जब पुणे के विवादित जमीन सौदे में पार्थ घिरे, तो विपक्ष में होने के बाद भी सुप्रिया ने उन पर सीधा हमला करने से गुरेज किया।
मुंबई के प्रतिष्ठित कैम्पियन स्कूल से शुरुआती पढ़ाई के बाद पार्थ बिजनेस मैनेजमेंट का कोर्स करने लंदन गए। हालांकि, पढ़ाई अधूरी छोड़कर लौटे। बाद में कॉमर्स में ग्रेजुएशन किया। दोस्तों के बीच वे फुटबॉल प्रेमी के रूप में जाने जाते थे। इनकी दिलचस्पी राजनीति से ज्यादा बाहरी दुनिया में थी।
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इसके बाद भी विवादों का सिलसिला नहीं थमा। 2020 में जब पूरी एनसीपी अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में महाराष्ट्र पुलिस के साथ खड़ी थी।
तब पार्थ ने अचानक सीबीआई जांच की मांग कर डाली। तब भड़के शरद पवार ने सार्वजनिक रूप से उन्हें अपरिपक्व करार दिया था।
राजनीतिक रूप से बार-बार किनारे किए जाने के बावजूद पार्थ ने उम्मीद नहीं छोड़ी। वे चुपचाप विधायकों की बैठकों में शामिल होते रहे।
सत्ता के गलियारों में निर्णय लेने की प्रक्रिया को गहराई से देखते रहे। इस बात का बारीक हिसाब रखते रहे कि कौन उनके पिता का सच्चा वफादार है और कौन मौकापरस्त। इसी दौरान उन्होंने अपनी एक अलग टीम तैयार कर ली।
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अलग हुई एनसीपी में पार्थ के सामने अपनी पीढ़ी का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं बचा। पिता के रहते हुए तो वे पर्दे के पीछे ही रहे। लेकिन, इस साल अजीत दादा के निधन ने पासा ही पलट दिया।
अजीत पवार के जाने के बाद पार्थ ने अपनी मां सुनेत्रा पवार को सक्रिय राजनीति में बनाए रखा। पार्थ के दबाव में सुनेत्रा को राज्यसभा भेजा गया। बाद में उपमुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया गया।
मां सुनेत्रा ने भी बेटे के हर फैसले का मूक समर्थन किया। चाहे वह चुनाव आयोग को पत्र लिखकर पुराने पत्राचार को खारिज कराना हो या राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सूची से पुराने क्षत्रपों को बाहर करना।
एक्सेसिबल दादा बनाम ओपेक पार्थ
कोई भी विधायक सीधा उनके केबिन में घुसकर काम बता सकता था और दादा तुरंत सामने अधिकारी को फोन लगा देते थे।
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मुंबई, पुणे और बारामती के दफ्तरों से लेकर सुनेत्रा पवार के सरकारी आवास देवगिरी तक पार्थ तक पहुंचने का रास्ता कठिन हैं। यह रास्ता उनके चुनिंदा वफादार सहायकों के घेरे से होकर ही गुजरता है।
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लेकिन, मैं आज तक ऐसे किसी अफसर से नहीं मिला, जो यह दावा कर सके कि उसने पार्थ पवार को पूरी तरह डिकोड कर लिया है।
सिर्फ भरोसेमंद सलाहकारों की सुनना कभी-कभी नुकसानदेह भी साबित होता है। अमाडिया एंटरप्राइजेज का रद्द हुआ पुणे लैंड डील मामला इसका बड़ा उदाहरण है।
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खबर फैलते ही अगले ही दिन पार्थ खुद फडणवीस से मिलने पहुंचे। यह संदेश साफ कर दिया कि भविष्य में किसी भी बातचीत की जानकारी उपमुख्यमंत्री को होनी चाहिए।
इसके बाद सुनेत्रा पवार के अध्यक्ष पद को कानूनी चुनौती दी गई। प्रफुल्ल पटेल ने सार्वजनिक रूप से सुधारात्मक कदमों की मांग की।
पार्टी उपाध्यक्ष उदयकुमार अहेर ने पार्थ को केंद्रीय कैबिनेट में शामिल करने की मांग उठाकर हलचल मचा दी। सूत्रों का कहना है कि पार्थ की इसी मेरी मर्जी या रास्ता नापो वाली कार्यशैली से तटकरे और पटेल जैसे नेता तंग आ गए हैं। अब वे शरद पवार गुट के साथ विलय के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।
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वहीं, शरद पवार की एनसीपी (एसपी) के नेता पारिवारिक मर्यादा का हवाला देकर इस पूरे विवाद पर साधु की तरह मौन साधे हुए हैं।
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एनसीपी के ही एक मंत्री टिप्पणी की कि विधायकों को जोड़े रखना अजीत दादा का हुनर था। पार्थ ने फिलहाल अपने पिता के नाम के अलावा कुछ नया पेश नहीं किया है।
वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर भाजपा नेतृत्व से सीधी बात करना उनके अहंकार को संतुष्ट कर सकता है। लेकिन, यह फॉर्मूला तभी तक कामयाब रहेगा जब तक विधायक उनके साथ खड़े हैं।
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