वेश्या, रखैल जैसे शब्दों पर अब लगी पूरी रोक, 125 केसों को पढ़कर भोपाल में तैयार हुई गाइडलाइन
समझें क्या है पूरा मामला...
- सुप्रीम कोर्ट ने जजों के लिए नई भाषा गाइडलाइंस बनाई हैं।
- अब अदालती फैसलों में रूढ़िवादी और अपमानजनक शब्द नहीं चलेंगे।
- जस्टिस अनिरुद्ध बोस की कमेटी ने खास ग्लॉसरी तैयार की है।
- इसमें पुराने शब्दों की जगह सम्मानजनक विकल्प दिए गए हैं।
- मकसद है पीड़ितों को अदालत में गरिमा और भरोसा देना।
भाषा से जुड़ी बड़ी पहल
अदालत की भाषा सिर्फ कानूनी औपचारिकता नहीं होती। यह न्याय की सोच भी दिखाती है। सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस पर संज्ञान लिया है। मामला Suo Moto Writ Petition Criminal No. 1/2025 के नाम से जाना गया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने यह आदेश दिया था।
एक हाईकोर्ट के फैसले में संवेदनहीन भाषा इस्तेमाल हुई थी। इससे सुप्रीम कोर्ट नाराज हुआ। कोर्ट ने विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाने का निर्देश दिया। नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी, भोपाल को यह जिम्मेदारी सौंपी गई।
जजों के लिए बनी खास कमेटी
जस्टिस अनिरुद्ध बोस इस कमेटी के अध्यक्ष हैं। साथ में जस्टिस सोनिया जी. गोकानी भी शामिल हुईं। पूर्व डीजीपी अनुराधा शंकर और वकील डॉ. सूरत सिंह भी सदस्य रहे। एंथ्रोपोलॉजी की प्रोफेसर लूसी टीवी जेहोल ने भी योगदान दिया।
कमेटी ने देशभर की 125 ट्रायल कोर्ट के फैसले पढ़े। इसके बाद एक विस्तृत रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई। इसमें पुराने और आपत्तिजनक शब्दों की एक बड़ी सूची शामिल है।
किन शब्दों पर लगी रोक
रिपोर्ट के मुताबिक कई पुराने शब्द पीड़िताओं को शर्मिंदा करते हैं। पत्रकारों, वकीलों और आम लोगों को अब इनसे बचना चाहिए। नीचे इसकी विस्तृत जानकारी दी गई है।
पीड़िता के लिए शब्द
प्रॉसिक्यूट्रिक्स, बेचारी महिला और असहाय महिला जैसे शब्द अब सही नहीं माने जाते। इनकी जगह सर्वाइवर या पीड़िता शब्द इस्तेमाल करें। बच्चों के लिए गुलेबल बच्ची जैसे शब्द भी उचित नहीं हैं। इसकी जगह नाबालिग पीड़िता या बाल पीड़िता लिखा जाना चाहिए।
चरित्र और शुद्धता से जुड़े शब्द
चरित्र, शुद्धता और सतीत्व खोना जैसे शब्द गलत संदेश देते हैं। इनकी जगह शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन लिखना सही होगा। 'आसान चरित्र वाली महिला' जैसे शब्द पूरी तरह अनुचित माने गए हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में ऐसी भाषा पर कड़ी नाराजगी जताई थी।
रिश्तों और पेशे से जुड़े शब्द
रखैल और कीप जैसे शब्दों की जगह अब पार्टनर शब्द चलेगा। वेश्या शब्द की जगह सेक्स वर्कर शब्द इस्तेमाल किया जाएगा। यह शब्द अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा भी मान्यता प्राप्त है।
हवस, शील और शर्म से जुड़े शब्द
हवस और शील भंग जैसे शब्द भी हटाए जा रहे हैं। इनकी जगह यौन हिंसा या यौन उत्पीड़न लिखना सही रहेगा। इज्जत और शर्म जैसे शब्दों से भी बचना चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे शब्द पुरानी और पितृसत्तात्मक सोच दिखाते हैं।
शब्दों के बदलाव की सूची | |
| पुराना और आपत्तिजनक शब्द | नया और सम्मानजनक विकल्प |
| Prosecutrix (प्रॉसिक्यूट्रिक्स) | Survivor / Complainant (सर्वाइवर) |
| Chastity (शुद्धता / सतीत्व) | Autonomy (स्वायत्तता) |
| Outraged Modesty (शील भंग) | शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन |
| Keep / Mistress (रखैल) | Partner (पार्टनर) |
| Prostitute (वेश्या) | Sex Worker (सेक्स वर्कर) |
| Lust (हवस) | Sexual Violence (यौन हिंसा) |
| Helpless woman (बेचारी महिला) | Survivor (सर्वाइवर) |
आम गलतियां जो पत्रकार करते हैं
पीड़िता के कपड़ों, व्यवहार या पुराने रिश्तों पर टिप्पणी से बचें। ऐसी बातें पीड़िता को ही दोषी ठहराने जैसी लगती हैं। खबर लिखते समय सिर्फ तथ्यों और घटना पर ध्यान दें। पीड़िता की पहचान उजागर करने वाले शब्द या संकेत भी न दें।
पुराने फैसलों ने दिखाई राह
भारतीय अदालतों ने पहले भी कई अहम फैसले दिए हैं। विशाखा केस में कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा तय हुई थी। जोसेफ शाइन केस में एडल्ट्री (व्यभिचार) से जुड़ा पुराना कानून हटाया गया। अपर्णा भट्ट केस में जजों को रूढ़िवादी टिप्पणियों से मना किया गया। नाल्सा केस में ट्रांसजेंडर लोगों को बराबरी का कानूनी हक मिला। शैलेन्द्र कुमार राय केस में टू-फिंगर टेस्ट पर रोक लगी।
उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि पीड़िता का यौन इतिहास बलात्कार के मामलों में पूरी तरह अप्रासंगिक है। अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA- Bharatiya Sakshya Adhiniyam) 2023 की धारा 48 भी यही सिद्धांत दोहराती है।
मील का पत्थर: वो फैसले जिन्होंने समाज को बदला
भारतीय अदालतों ने हमेशा पुरानी सोच को कड़ी चुनौती दी है। जेंडर जस्टिस के लिए कुछ केस बहुत महत्वपूर्ण रहे हैं।
विशाखा केस (1997): काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा के लिए नियम बने। इससे दफ्तरों में यौन उत्पीड़न रोकने में मदद मिली।
जोसेफ शाइन (2019): एडल्ट्री (व्यभिचार) से जुड़े पुराने भेदभाव वाले कानून को हटाया। कोर्ट ने कहा कि महिला पति की संपत्ति नहीं है।
अपर्णा भट्ट (2021): जजों को रूढ़िवादी टिप्पणियों से बचने की सलाह दी। रेप केस में समझौते का सुझाव देना गलत बताया।
नाल्सा केस (2014): ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को बराबरी का कानूनी हक दिया। इससे समाज में समावेशी सोच और सम्मान बढ़ा।
शैलेन्द्र कुमार राय (2022): टू-फिंगर टेस्ट को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया। अब यह टेस्ट करने वाला डॉक्टर दोषी माना जाएगा।
निपुण सक्सेना (2019): सर्वाइवर की पहचान गुप्त रखने के सख्त आदेश दिए। इससे उनकी निजता और गरिमा सुरक्षित हुई है।
इन फैसलों ने महिलाओं और बच्चों को जमीनी सुरक्षा दी है। यह समाज में समानता लाने का एक बड़ा जरिया बने।
विक्टिम-ब्लेमिंग पर कानूनी लगाम
अदालतों में सर्वाइवर के सम्मान की रक्षा करना अब अनिवार्य है। रेप-शील्ड नियम इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह अब नया कानून आया है।
अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) 2023 लागू हो चुका है। इसकी धारा 48 बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह पुराने कानून की धारा 53A की जगह आई है। यह कहती है कि सर्वाइवर का यौन इतिहास मायने नहीं रखता।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक सख्त फैसला सुनाया। यह Bechan Prasad v. State of U.P. (2026) का मामला था। कोर्ट ने आसान चरित्र जैसे शब्दों पर कड़ी नाराजगी जताई। अब कोई भी वकील सर्वाइवर के चरित्र पर सवाल नहीं उठाएगा।
मुआवजा और सहयोग की व्यवस्था
पीड़ितों को अब आर्थिक मदद भी आसानी से मिल सकेगी। विक्टिम कंपनसेशन स्कीम 2018 के तहत यह सुविधा दी जाती है। रेप पीड़िता को चार से सात लाख रुपये तक मुआवजा मिल सकता है। नाबालिग पीड़िता को यह राशि पचास प्रतिशत ज्यादा दी जाती है। एसिड अटैक पीड़िता को पंद्रह दिन में एक लाख रुपये मिलते हैं।
यह पूरी प्रक्रिया राज्य और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण संभालते हैं। आवेदन एफआईआर की कॉपी के साथ जमा करना होता है।
गवाह अब मेहमान की तरह
गवाहों को अब अदालत में मेहमान जैसा सम्मान मिलेगा। पहले उन्हें घंटों बिना कुर्सी और पानी के इंतजार करना पड़ता था। अब बुनियादी सुविधाएं देना जज की जिम्मेदारी होगी। इन-कैमरा ट्रायल से पीड़िता की निजता भी सुरक्षित रहेगी। ट्रायल शुरू होने से पहले काउंसलिंग की व्यवस्था भी होगी।
आगे क्या बदलेगा
यह रिपोर्ट सिर्फ जजों के लिए नहीं बनाई गई है। पत्रकार, वकील और आम लोग भी इससे सीख सकते हैं। संवेदनशील भाषा अपनाने से पीड़िताओं का भरोसा बढ़ेगा। यह बदलाव अदालतों को और ज्यादा मानवीय बनाएगा।
एक्सपर्ट की राय
रिपोर्ट का सीधा संबंध मध्यप्रदेश से
इस रिपोर्ट का मध्यप्रदेश से सीधा संबंध है। कमेटी सदस्य अनुराधा शंकर मध्यप्रदेश की पूर्व पुलिस महानिदेशक रही हैं। नेशनल जुडिशल एकेडमी, जहां यह रिपोर्ट तैयार हुई, भोपाल में स्थित है। मध्यप्रदेश कैडर के जिला जज श्रीश कैलाश शुक्ल ने भी कमेटी को सहयोग दिया। इसके अलावा मध्य प्रदेश राज्य महिला आयोग के इनपुट भी रिपोर्ट में शामिल किए गए हैं।
FAQ
- जजों के लिए नई गाइडलाइंस क्यों बनाई गईं?
अदालती फैसलों में रूढ़िवादी और अपमानजनक भाषा हटाने के लिए ये गाइडलाइंस बनाई गई हैं। इससे पीड़िताओं का सम्मान और भरोसा बढ़ेगा। सुप्रीम कोर्ट की एक कमेटी ने इसे तैयार किया है। - अदालत में अब किन शब्दों पर रोक है?
वेश्या, रखैल, शील भंग जैसे शब्दों की जगह अब नए शब्द इस्तेमाल होंगे। इनकी जगह सेक्स वर्कर, पार्टनर और यौन हिंसा जैसे शब्द चलेंगे। ये निर्देश जजों के लिए अनिवार्य हैं। - गवाहों को अदालत में क्या नई सुविधाएं मिलेंगी?
गवाहों को अब मेहमान जैसा सम्मान और बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी। उन्हें अनावश्यक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। पीड़िताओं को इन-कैमरा ट्रायल और काउंसलिंग की सुविधा भी मिलेगी।
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