दिव्या मित्तल
अफसरी के ग्लैमर पर भारी राजनीति की चकाचौंध, कई IAS-IPS ने नौकरी छोड़ चुनी सियासत, इनमें एमपी, सीजी और राजस्थान के नौकरशाह
Arun Tiwari | Oct 16, 2026, 15:18 IST
आईएएस-आईपीएस अफसरों ने राजनीती में किया प्रवेश
भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) में काम करने वाले कई अधिकारी अपनी नौकरी छोड़कर राजनीति में कदम रख चुके हैं। इनमें कुछ ने मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री तक का सफर तय किया, जबकि कुछ को चुनावी राजनीति में संघर्ष करना पड़ा। अब इस सूची में पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल का नाम भी जुड़ गया है।
उन्होंने अपनी नई राजनीतिक पार्टी जननीति भारत पार्टी बनाने की घोषणा की है।
उनकी पार्टी 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेगी। दिव्या मित्तल ने करीब 13 साल तक प्रशासनिक सेवा में काम करने के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली। उनका कहना है कि राजनीति में आने का उद्देश्य लोगों की समस्याओं को सीधे समझना और नीतियों के निर्माण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना है। उन्होंने अपनी पार्टी के जरिए ऐसी व्यवस्था बनाने की बात कही है, जिसमें सरकार केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि पूरे पांच साल जनता के प्रति जवाबदेह रहे।
दिव्या मित्तल से पहले भी कई अधिकारी सरकारी सेवा छोड़कर राजनीति में आए हैं। इनमें कुछ ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई, तो कुछ ने राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आइए जानते हैं ऐसे अधिकारियों के बारे में, जिन्होंने प्रशासनिक सेवा से सियासत तक का सफर तय किया। इनमें मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान के नौकरशाह भी शामिल हैं।
दिव्या मित्तल - आईआईटी-आईआईएम से
दिव्या मित्तल 2013 बैच की उत्तर प्रदेश कैडर की आईएएस अधिकारी रही हैं। उन्होंने आईआईटी दिल्ली और आईआईएम बेंगलुरु से पढ़ाई की। प्रशासनिक सेवा में आने से पहले वह लंदन में काम कर चुकी थीं। दिव्या ने उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर, मिर्जापुर और देवरिया जिलों में जिलाधिकारी के रूप में सेवाएं दीं। वह राज्य सरकार के राजस्व विभाग में विशेष सचिव के पद पर भी रहीं।
मिर्जापुर में तैनाती के दौरान लहुरियादह गांव में पाइपलाइन से पेयजल पहुंचाने की पहल के कारण वह चर्चा में आई थीं। इस गांव के लोगों को लंबे समय तक पानी के लिए परेशानी का सामना करना पड़ता था। 30 अगस्त 2026 को उन्होंने आईएएस से इस्तीफा देने की घोषणा की थी। बाद में उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया। अब उन्होंने जननीति भारत पार्टी बनाकर 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उतरने का ऐलान किया है।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में अजीत जोगी का नाम प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आने वाले प्रमुख चेहरों में गिना जाता है। अजीत जोगी ने 1986 में आईएएस छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा। प्रशासनिक अधिकारी के रूप में काम करने के बाद उन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में अपनी जगह बनाई। वह राज्यसभा के सदस्य भी बने। साल 2000 में मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य बना, तो कांग्रेस ने उन्हें राज्य का पहला मुख्यमंत्री बनाया।
उन्होंने 2000 से 2003 तक मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। बाद में कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने 2016 में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ नाम से अपनी पार्टी बनाई। इस तरह जोगी का सफर प्रशासनिक सेवा से मुख्यमंत्री और फिर क्षेत्रीय दल के संस्थापक तक पहुंचा।
![अजीत जोगी]()
छत्तीसगढ़ के ओपी चौधरी भी प्रशासनिक सेवा छोड़कर राजनीति में आने वाले प्रमुख नामों में शामिल हैं। वह 2005 बैच के आईएएस अधिकारी रहे हैं। रायपुर के कलेक्टर के पद पर रहते हुए उन्होंने 2018 में इस्तीफा देकर भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। उसी साल उन्होंने खरसिया विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
हालांकि, उन्होंने राजनीति नहीं छोड़ी। 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने रायगढ़ सीट से जीत हासिल की। इसके बाद उन्हें छत्तीसगढ़ सरकार में वित्त मंत्री बनाया गया। उनका राजनीतिक सफर यह भी दिखाता है कि प्रशासनिक अनुभव के बावजूद चुनावी सफलता पहली कोशिश में मिलना जरूरी नहीं है।
![ओपी चौधरी]()
रुस्तम सिंह मध्यप्रदेश पुलिस में आईपीएस अधिकारी रहे। उन्होंने जबलपुर, इंदौर और रायपुर में एसपी सहित कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। बाद में वह पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) के पद तक पहुंचे। उन्होंने नौकरी से इस्तीफा देने के बजाय स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ली थी। वर्ष 2003 में सेवानिवृत्ति के बाद भाजपा में शामिल हुए और मुरैना विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। वह चुनाव जीतकर विधायक बने और मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे। 2013 में दोबारा विधायक चुने गए तथा 2016 में शिवराज सिंह चौहान सरकार में स्वास्थ्य मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। बाद में भाजपा से मतभेद के बाद उन्होंने 2023 में पार्टी छोड़कर बहुजन समाज पार्टी का दामन थाम लिया।
भागीरथ प्रसाद 1975 बैच के आईएएस अधिकारी रहे। उन्होंने मध्यप्रदेश में कलेक्टर और शासन के विभिन्न वरिष्ठ पदों पर काम किया। वह उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे और देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के कुलपति बने। भागीरथ प्रसाद ने वर्ष 2007 में आईएएस की नौकरी से इस्तीफा दिया था।
इसके बाद उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर भिंड सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने उन्हें फिर भिंड से उम्मीदवार घोषित किया। हालांकि, उम्मीदवार घोषित होने के अगले ही दिन वह भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर उन्होंने जीत हासिल की और 16वीं लोकसभा के सदस्य बने।
![डॉ. भागीरथ प्रसाद]()
अर्जुन राम मेघवाल राजस्थान के सबसे चर्चित उदाहरणों में शामिल हैं। मेघवाल राजस्थान प्रशासनिक सेवा में आए थे और बाद में पदोन्नति के जरिए आईएएस बने। वर्ष 2009 में चूरू के कलेक्टर रहते हुए उन्होंने सरकारी सेवा छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने बीकानेर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
वह लगातार लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। केंद्र सरकार में उन्हें विभिन्न मंत्रालयों में जिम्मेदारी मिली और मई 2023 में वह केंद्रीय कानून मंत्री बने। मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में भी उन्हें कानून एवं न्याय मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। उनका सफर प्रशासनिक अधिकारी से सांसद और केंद्रीय मंत्री तक पहुंचने का प्रमुख उदाहरण है।
![अर्जुन राम मेघवाल]()
हरीश चंद्र मीणा राजस्थान में पुलिस सेवा से राजनीति में आने वाले प्रमुख नाम हैं। हरीश मीणा 1976 बैच के आईपीएस अधिकारी रहे हैं। वह राजस्थान के पुलिस महानिदेशक यानी डीजीपी के पद पर भी रहे। 2014 में उन्होंने भाजपा में शामिल होकर राजनीतिक पारी शुरू की। वह दौसा लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। बाद में उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया।
2024 के लोकसभा चुनाव में वह कांग्रेस के टिकट पर टोंक-सवाई माधोपुर सीट से सांसद चुने गए। उनका उदाहरण बताता है कि पुलिस प्रशासन में शीर्ष पद तक पहुंचने के बाद भी अधिकारी सक्रिय चुनावी राजनीति में अपनी जगह बना सकते हैं।
सीडी देवल राजस्थान के पूर्व आईएएस अधिकारी और कांग्रेस नेता रहे हैं। उन्होंने प्रशासनिक सेवा में काम करने के बाद राजनीति में प्रवेश किया। वह 2003 में राजस्थान की विधानसभा सीट से विधायक चुने गए और 2008 तक विधानसभा के सदस्य रहे। उनका राजनीतिक सफर उन अधिकारियों का उदाहरण है, जिन्होंने प्रशासनिक अनुभव के बाद राज्य की चुनावी राजनीति में प्रवेश किया।
यशवंत सिन्हा उन पूर्व नौकरशाहों में शामिल हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने 1984 में भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर राजनीति में प्रवेश किया। उन्होंने जनता पार्टी से अपनी राजनीतिक पारी शुरू की और बाद में जनता दल से जुड़े। इसके बाद वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। यशवंत सिन्हा ने 1990-91 में चंद्रशेखर सरकार में वित्त मंत्री की जिम्मेदारी संभाली।
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में भी वह वित्त मंत्री रहे। बाद में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया। उनकी राजनीतिक यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आए। भाजपा से अलग होने के बाद वह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए। 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में वह विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार भी रहे।
मनीषंकर अय्यर भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी रहे हैं। उन्होंने 1989 में विदेश सेवा छोड़कर राजनीति में प्रवेश किया। वह पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय से भी जुड़े रहे थे। राजनीति में आने के बाद उन्होंने कांग्रेस का साथ चुना और 1991 में तमिलनाडु की मयिलादुथुराई लोकसभा सीट से चुनाव जीता।
कांग्रेस सरकार में उन्होंने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री सहित कई जिम्मेदारियां संभालीं। वह पंचायती राज मंत्रालय से भी जुड़े रहे। अय्यर का उदाहरण बताता है कि कूटनीतिक अनुभव रखने वाले अधिकारी भी चुनावी राजनीति में उतरकर राष्ट्रीय स्तर पर भूमिका निभा सकते हैं।
अरविंद केजरीवाल ने भारतीय राजस्व सेवा में काम किया था। वह आयकर विभाग में अधिकारी रहे और 2006 में सरकारी सेवा छोड़ दी। इसके बाद वह सूचना के अधिकार और भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों से जुड़े। अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन के दौरान उन्हें व्यापक पहचान मिली। 2012 में उन्होंने आम आदमी पार्टी की स्थापना की। उनकी पार्टी ने 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया।
केजरीवाल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को हराया और दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद उन्होंने 2015 और 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी पार्टी का नेतृत्व किया। दिल्ली की राजनीति में उनका उदय सरकारी नौकरी छोड़कर राजनीतिक संगठन खड़ा करने का एक प्रमुख उदाहरण माना जाता है।
केजे अल्फोंस भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं। उन्होंने 2006 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर राजनीति में प्रवेश किया। केरल में उन्होंने चुनावी राजनीति की शुरुआत की और कंजीरापल्ली विधानसभा सीट से वाम लोकतांत्रिक मोर्चे के समर्थन वाले निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता।
बाद में उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। वह राज्यसभा के सदस्य बने और 2017 में नरेंद्र मोदी सरकार में पर्यटन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाए गए। उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित जिम्मेदारियां भी संभालीं। उनकी यात्रा प्रशासनिक अनुभव को राजनीतिक गतिविधियों में इस्तेमाल करने का एक उदाहरण है।
सत्यपाल सिंह 1980 बैच के आईपीएस अधिकारी रहे हैं। महाराष्ट्र कैडर में सेवा देने के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। वह मुंबई के पुलिस आयुक्त भी रहे। जनवरी 2014 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर भाजपा का दामन थाम लिया। उसी वर्ष उत्तर प्रदेश की बागपत लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और राष्ट्रीय लोकदल के प्रमुख चौधरी अजित सिंह को हराया। 2019 में भी उन्होंने बागपत से चुनाव जीता। केंद्र सरकार में उन्होंने मानव संसाधन विकास तथा जल संसाधन से संबंधित मंत्रालयों में राज्य मंत्री के रूप में जिम्मेदारी निभाई।
अपराजिता सारंगी 1994 बैच की आईएएस अधिकारी रही हैं। उन्होंने 2018 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर राजनीति में कदम रखा। सेवा छोड़ने के बाद वह भाजपा में शामिल हुईं और 2019 के लोकसभा चुनाव में ओडिशा की भुवनेश्वर सीट से उम्मीदवार बनीं।
उन्होंने बीजू जनता दल के उम्मीदवार अरूप पटनायक को हराया। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने इसी सीट से जीत दर्ज की। सारंगी की राजनीतिक यात्रा में उल्लेखनीय बात यह रही कि उन्होंने वरिष्ठ प्रशासनिक पद छोड़ने के कुछ ही महीनों के भीतर चुनाव लड़ा और संसद पहुंचीं।
एके शर्मा 1988 बैच के गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी रहे हैं। उन्होंने जनवरी 2021 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली। नौकरशाही में अपने कार्यकाल के दौरान वह प्रधानमंत्री कार्यालय में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके थे। गुजरात में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान भी वह प्रशासनिक कामकाज से जुड़े रहे। सेवा छोड़ने के बाद वह भाजपा में शामिल हुए और उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बने।
बाद में योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री बनाए गए। उन्होंने नगर विकास और ऊर्जा जैसे विभागों की जिम्मेदारी संभाली। उनका उदाहरण दिखाता है कि वरिष्ठ नौकरशाह चुनाव लड़े बिना भी विधान परिषद के रास्ते सक्रिय राजनीति में प्रवेश कर सकते हैं और मंत्री बन सकते हैं।
इन अधिकारियों की राजनीतिक यात्राएं अलग-अलग रही हैं। कुछ ने मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री जैसे पद हासिल किए, कुछ सांसद बने, तो कुछ को चुनावी हार के बाद दोबारा प्रयास करना पड़ा। प्रशासनिक सेवा में अधिकारियों को सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, बजट, कानून-व्यवस्था और जनसमस्याओं से सीधे जुड़ने का अवसर मिलता है। राजनीति में आने के बाद यही अनुभव उनके काम आ सकता है। लेकिन चुनाव जीतने और राजनीतिक संगठन चलाने के लिए जनसंपर्क, स्थानीय मुद्दों की समझ तथा कार्यकर्ताओं के नेटवर्क की भी अहम भूमिका होती है।
उनकी पार्टी 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेगी। दिव्या मित्तल ने करीब 13 साल तक प्रशासनिक सेवा में काम करने के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली। उनका कहना है कि राजनीति में आने का उद्देश्य लोगों की समस्याओं को सीधे समझना और नीतियों के निर्माण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना है। उन्होंने अपनी पार्टी के जरिए ऐसी व्यवस्था बनाने की बात कही है, जिसमें सरकार केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि पूरे पांच साल जनता के प्रति जवाबदेह रहे।
दिव्या मित्तल से पहले भी कई अधिकारी सरकारी सेवा छोड़कर राजनीति में आए हैं। इनमें कुछ ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई, तो कुछ ने राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आइए जानते हैं ऐसे अधिकारियों के बारे में, जिन्होंने प्रशासनिक सेवा से सियासत तक का सफर तय किया। इनमें मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान के नौकरशाह भी शामिल हैं।
दिव्या मित्तल - आईआईटी-आईआईएम से IAS और अब राजनीति
अजीत जोगी - आईएएस से छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री तक
उन्होंने 2000 से 2003 तक मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। बाद में कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने 2016 में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ नाम से अपनी पार्टी बनाई। इस तरह जोगी का सफर प्रशासनिक सेवा से मुख्यमंत्री और फिर क्षेत्रीय दल के संस्थापक तक पहुंचा।
अजीत जोगी
ओपी चौधरी - रायपुर कलेक्टर से छत्तीसगढ़ के मंत्री तक
हालांकि, उन्होंने राजनीति नहीं छोड़ी। 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने रायगढ़ सीट से जीत हासिल की। इसके बाद उन्हें छत्तीसगढ़ सरकार में वित्त मंत्री बनाया गया। उनका राजनीतिक सफर यह भी दिखाता है कि प्रशासनिक अनुभव के बावजूद चुनावी सफलता पहली कोशिश में मिलना जरूरी नहीं है।
ओपी चौधरी
रुस्तम सिंह - आईपीएस से मंत्री तक का सफर
डॉ. भागीरथ प्रसाद - आईएएस से सांसद तक
इसके बाद उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर भिंड सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने उन्हें फिर भिंड से उम्मीदवार घोषित किया। हालांकि, उम्मीदवार घोषित होने के अगले ही दिन वह भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर उन्होंने जीत हासिल की और 16वीं लोकसभा के सदस्य बने।
डॉ. भागीरथ प्रसाद
अर्जुन राम मेघवाल - IAS से केंद्रीय कानून मंत्री तक
वह लगातार लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। केंद्र सरकार में उन्हें विभिन्न मंत्रालयों में जिम्मेदारी मिली और मई 2023 में वह केंद्रीय कानून मंत्री बने। मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में भी उन्हें कानून एवं न्याय मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। उनका सफर प्रशासनिक अधिकारी से सांसद और केंद्रीय मंत्री तक पहुंचने का प्रमुख उदाहरण है।
अर्जुन राम मेघवाल
हरीश मीणा - राजस्थान के डीजीपी से सांसद तक
2024 के लोकसभा चुनाव में वह कांग्रेस के टिकट पर टोंक-सवाई माधोपुर सीट से सांसद चुने गए। उनका उदाहरण बताता है कि पुलिस प्रशासन में शीर्ष पद तक पहुंचने के बाद भी अधिकारी सक्रिय चुनावी राजनीति में अपनी जगह बना सकते हैं।
सीडी देवल - आईएएस से राजस्थान विधानसभा तक
यशवंत सिन्हा - आईएएस से केंद्रीय वित्त मंत्री तक
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में भी वह वित्त मंत्री रहे। बाद में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया। उनकी राजनीतिक यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आए। भाजपा से अलग होने के बाद वह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए। 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में वह विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार भी रहे।
मनीषंकर अय्यर - विदेश सेवा से केंद्रीय मंत्री तक
कांग्रेस सरकार में उन्होंने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री सहित कई जिम्मेदारियां संभालीं। वह पंचायती राज मंत्रालय से भी जुड़े रहे। अय्यर का उदाहरण बताता है कि कूटनीतिक अनुभव रखने वाले अधिकारी भी चुनावी राजनीति में उतरकर राष्ट्रीय स्तर पर भूमिका निभा सकते हैं।
अरविंद केजरीवाल - आयकर अधिकारी से दिल्ली के मुख्यमंत्री तक
केजरीवाल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को हराया और दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद उन्होंने 2015 और 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी पार्टी का नेतृत्व किया। दिल्ली की राजनीति में उनका उदय सरकारी नौकरी छोड़कर राजनीतिक संगठन खड़ा करने का एक प्रमुख उदाहरण माना जाता है।
केजे अल्फोंस - प्रशासनिक अधिकारी से केंद्रीय मंत्री तक
बाद में उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। वह राज्यसभा के सदस्य बने और 2017 में नरेंद्र मोदी सरकार में पर्यटन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाए गए। उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित जिम्मेदारियां भी संभालीं। उनकी यात्रा प्रशासनिक अनुभव को राजनीतिक गतिविधियों में इस्तेमाल करने का एक उदाहरण है।
सत्यपाल सिंह - मुंबई पुलिस आयुक्त से सांसद तक
अपराजिता सारंगी - आईएएस से लोकसभा तक
उन्होंने बीजू जनता दल के उम्मीदवार अरूप पटनायक को हराया। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने इसी सीट से जीत दर्ज की। सारंगी की राजनीतिक यात्रा में उल्लेखनीय बात यह रही कि उन्होंने वरिष्ठ प्रशासनिक पद छोड़ने के कुछ ही महीनों के भीतर चुनाव लड़ा और संसद पहुंचीं।
एके शर्मा - प्रधानमंत्री कार्यालय से उत्तर प्रदेश सरकार तक
बाद में योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री बनाए गए। उन्होंने नगर विकास और ऊर्जा जैसे विभागों की जिम्मेदारी संभाली। उनका उदाहरण दिखाता है कि वरिष्ठ नौकरशाह चुनाव लड़े बिना भी विधान परिषद के रास्ते सक्रिय राजनीति में प्रवेश कर सकते हैं और मंत्री बन सकते हैं।
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