पुलिस के 70% जवान बोले, बिना डर के पुलिस बल प्रयोग करने दो, क्या कहते हैं NCRB आंकड़े
समझें क्या है मामला
Status of Policing in India Report 2025 नाम के सर्वे में आठ हजार 276 पुलिसकर्मियों से बात हुई। इनमें से 70% से ज्यादा ने कहा कि उन्हें बिना सजा के डर के बल प्रयोग करने दिया जाना चाहिए। लगभग 69% ने माना कि पुलिस को बिना कोर्ट की मंजूरी के गिरफ्तारी और हिरासत का अधिकार मिलना चाहिए। यह सर्वे उसी हफ्ते चर्चा में आया जब दिल्ली में एक छात्र आंदोलन पर पुलिस का लाठी चार्ज सुर्खियों में रहा। रिपोर्ट कहती है कि पुलिस की मानसिकता और कानूनी सुरक्षा उपायों के बीच बड़ा फासला है। और यही फासला असली खतरे की जड़ है।
यह आपसे क्यों जुड़ा है
सोचिए एक बार। अगर पास के थाने का हर तीसरा पुलिसकर्मी यह मानता हो कि बिना कोर्ट पूछे किसी को उठाया जा सकता है, तो कल यह आप भी हो सकते हैं। यह सिर्फ किसी आंदोलन या प्रदर्शन का मामला नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है जो हर नागरिक अपने पास के सिपाही पर रखता है।
पहले क्या था- पृष्ठभूमि
बीस जुलाई को दिल्ली में "चलो संसद" मार्च निकला। यह मार्च कॉकरोच जनता पार्टी नाम के युवा संगठन ने आयोजित किया था, जो NEET परीक्षा पेपर लीक और CBSE अंक मूल्यांकन में गड़बड़ी को लेकर बीस जून से जंतर मंतर पर बैठा हुआ था। प्रदर्शनकारी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। मार्च संसद की तरफ बढ़ा तो पुलिस ने आंसू गैस और लाठी चार्ज का सहारा लिया। हजारों लोग मौके पर मौजूद थे। इसी घटना ने पुलिस के बल प्रयोग को लेकर पुराने सवाल फिर खड़े कर दिए।
क्या हुआ और क्यों
भारतीय नागरिक संहिता के तहत पुलिस किसी गैरकानूनी जमावड़े को तितर बितर करने के लिए तभी बल इस्तेमाल कर सकती है, जब आदेश के बावजूद भीड़ न हटे। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का मैनुअल भी कहता है कि पहले समझाइश, फिर चेतावनी, और बल सिर्फ आखिरी विकल्प के तौर पर। लेकिन सर्वे के आंकड़े कुछ और कहानी बताते हैं।
लगभग 55% पुलिसकर्मियों ने माना कि जनता में डर बिठाने के लिए सख्त तरीके अपनाना जरूरी या कुछ हद तक जरूरी है। करीब दो तिहाई ने यह भी स्वीकार किया कि जनता का दबाव उन्हें संदिग्ध अपराधियों से सख्ती से पेश आने पर मजबूर करता है। लगभग आधे पुलिसकर्मी "असामाजिक तत्वों" की ज्यादा गिरफ्तारी को अपराध घटाने का कारगर तरीका मानते हैं।
यहीं से मामला पलटता है। गिरफ्तारी के बाद के नियमों पर भी भरोसा कमजोर मिला। सिर्फ 41% पुलिसकर्मियों ने कहा कि गिरफ्तारी के तय कानूनी नियम हमेशा पूरे होते हैं। इनमें गिरफ्तारी का कारण बताना, मेडिकल जांच कराना, परिवार को सूचना देना और वकील से मिलने का हक देना शामिल है। हर पांचवां पुलिसकर्मी तो यह भी मानता है कि गिरफ्तार व्यक्ति को वकील से अकेले मिलने ही नहीं देना चाहिए।
इसे एक आसान उदाहरण से समझिए। मान लीजिए किसी सोसाइटी का सुरक्षा गार्ड खुद तय करने लगे कि किसे अंदर आने देना है और किसे बाहर रोकना है, बिना सोसाइटी के नियम देखे। पुलिस का यह रवैया कुछ वैसा ही असर डालता है, बस स्तर बहुत बड़ा है।
रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। हिरासत में यातना और मौत के आंकड़े देश के बाकी अपराध आंकड़ों जितने भरोसेमंद नहीं मिलते। NCRB के मुताबिक 2020 में पूरे देश में पुलिस कार्रवाई के दौरान सिर्फ 76 नागरिक घायल हुए, जबकि उसी साल नागरिकता संशोधन कानून को लेकर बड़े प्रदर्शन हुए थे। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक अकेले दिल्ली में 200 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। 2024 में तो NCRB के आंकड़ों में सिर्फ दो नागरिकों के घायल होने का जिक्र है, जबकि उसी साल किसानों के "दिल्ली चलो" आंदोलन में पुलिस बल प्रयोग की कई घटनाएं दर्ज हुईं।
और अगर आंकड़े ही भरोसेमंद न हों, तो जवाबदेही तय कैसे होगी?
कौन-कौन शामिल है
सर्वे कॉमन कॉज नाम की संस्था और लोकनीति सीएसडीएस ने मिलकर किया है। इसमें देश के 17 राज्यों के पुलिसकर्मी शामिल हुए। दूसरी तरफ कॉकरोच जनता पार्टी और छात्र संगठन हैं जो परीक्षा गड़बड़ियों और पुलिस कार्रवाई पर जवाबदेही मांग रहे हैं। केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस अपनी कार्रवाई को कानून व्यवस्था बनाए रखने का जरूरी कदम बताती हैं।
दोनों सइड्स की बात
पुलिस महकमे और कुछ पूर्व अधिकारियों का तर्क रहा है कि मीडिया अक्सर घायल नागरिकों की संख्या को उछालता है, जबकि ड्यूटी के दौरान घायल होने वाले पुलिसकर्मियों की बात कम होती है। उनका कहना है कि भीड़ नियंत्रण एक मुश्किल काम है और फैसले पल भर में लेने पड़ते हैं।
वहीं मानवाधिकार संगठनों और सर्वे बनाने वालों का कहना है कि तय संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों को नजरअंदाज करना खतरनाक मिसाल कायम करता है। उनका तर्क है कि जब खुद पुलिसकर्मी नियमों से हटकर काम करने को सही मानने लगें, तो आम नागरिक की सुरक्षा कमजोर पड़ जाती है।
मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ कनेक्शन
यह सर्वे सिर्फ दिल्ली या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश भी उन 17 राज्यों में शामिल रहा जहां यह सर्वे हुआ, और राज्य में इसका फील्डवर्क यतींद्र सिंह सिसोदिया और मनीष ज्ञानी की टीम ने किया।
राज्य में पुलिस बल प्रयोग की घटनाएं भी कम नहीं रहीं। मार्च 2026 में खंडवा में एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर भड़की भीड़ पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया था। इससे पहले हरदा में करणी सेना के प्रदर्शन पर और खरगोन में 2022 के सांप्रदायिक तनाव के दौरान भी पुलिस बल प्रयोग को लेकर सवाल उठे थे। सतना जिले में एक व्यक्ति की हिरासत में मौत के बाद भड़के प्रदर्शन में भी पुलिस को लाठी चार्ज और आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा था। यह पैटर्न बताता है कि सर्वे के नतीजे सिर्फ कागजी आंकड़े नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत के करीब हैं।
आगे क्या होगा
नजदीकी भविष्य में इस सर्वे पर संसद में सवाल उठ सकते हैं, खासकर चलो संसद मार्च के बाद पुलिस कार्रवाई की जांच की मांग तेज हो रही है। लंबे समय में असली सवाल यह रहेगा कि क्या पुलिस सुधार और ट्रेनिंग में बदलाव होता है, या मामला फिर एक रिपोर्ट बनकर रह जाता है।
एक बात जो आप नहीं जानते थे
ज्यादातर लोग सोचते हैं कि पुलिस हिंसा सिर्फ आंदोलनों या दंगों तक सीमित है। लेकिन सर्वे बताता है कि रोजमर्रा के अपराध नियंत्रण में भी करीब आधे पुलिसकर्मी सख्ती और डर को कारगर मानते हैं। यानी यह सोच किसी खास मौके की नहीं, बल्कि रोजमर्रा की कार्यशैली का हिस्सा बन चुकी है।
अब आप क्या करें
अब आप क्या करें: अपने इलाके में पुलिस कार्रवाई से जुड़ी शिकायत हो तो राज्य मानवाधिकार आयोग में दर्ज कराएं।
क्यों अभी: NEET आंदोलन के बाद पुलिस जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस तेज है, आवाज उठाने का सही समय है।
आगे देखें: संसद के अगले सत्र में गृह मंत्रालय से इस मुद्दे पर जवाब की मांग हो सकती है।
यह खबर क्यों जरूरी है
संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमा और स्वतंत्रता की गारंटी देता है। जब पुलिसकर्मी खुद बिना डर बल प्रयोग को सही मानने लगें, तो यह गारंटी कमजोर पड़ती है। बिना कोर्ट की निगरानी गिरफ्तारी की चाहत, विधि के शासन के मूल सिद्धांत के खिलाफ जाती है। NCRB के अधूरे आंकड़े जवाबदेही और पारदर्शिता के डिजिटल गवर्नेंस लक्ष्यों को भी कमजोर करते हैं।
FAQ
- SPIR 2025 सर्वे किसने किया और कितने पुलिसकर्मियों से बात हुई?
यह सर्वे कॉमन कॉज और लोकनीति सीएसडीएस ने मिलकर किया। इसमें 17 राज्यों के 8,276 पुलिसकर्मी शामिल हुए। - पुलिस को बिना कोर्ट अनुमति गिरफ्तारी का अधिकार कानूनन है क्या?
नहीं, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत गिरफ्तारी के लिए तय प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय जरूरी हैं। सर्वे में सिर्फ पुलिसकर्मियों की राय दर्ज हुई है, यह कानून नहीं है। - NCRB के घायल नागरिकों के आंकड़े कम क्यों दिखते हैं?
रिपोर्ट के मुताबिक हिरासत में यातना और पुलिस कार्रवाई से जुड़े आंकड़े अक्सर कम दर्ज होते हैं। यह अंडररिपोर्टिंग की समस्या मानी जाती है।
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