दांडी से सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा तक: 24 राजनीतिक यात्राओं ने देश में क्या बदला?
उज्जैन से अयोध्या पदयात्रा पर निकले दिग्विजय सिंह ने एक पुरानी बहस फिर छेड़ दी है। क्या राजनीतिक यात्रा सच में वोट दिलाती है? इतिहास का जवाब सीधा नहीं है। कुछ यात्राओं ने सत्ता पलट दी, लेकिन कुछ का असर चुनाव तक पहुंचा ही नहीं।
सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा में क्या है
विजयादशमी यानी दशहरा के दिन मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह उज्जैन से पैदल निकले। सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा से पहले उन्होंने चिंतामण गणेश, महाकाल और हरसिद्धि मंदिर में दर्शन किए। करीब 70 दिन में 970 किलोमीटर की दूरी तय करके यात्रा अयोध्या पहुंचेगी।
यात्रा के मुद्दे घोषित हैं। राम मंदिर के चढ़ावे और दान के प्रबंधन में पारदर्शिता की मांग होगी। धन के कथित दुरुपयोग की निष्पक्ष जांच की बात उठेगी। साथ में 'वोट चोरी' का मुद्दा भी रहेगा। एक विज्ञप्ति के मुताबिक दो शंकराचार्यों ने पत्र भेजकर इस यात्रा को समर्थन दिया है। ये हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और स्वामी सदानंद सरस्वती।
दिग्विजय सिंह यात्रा का पुराना रिकॉर्ड
Digvijaya Singh yatra पर नजर इसलिए भी है क्योंकि उनकी पिछली लंबी यात्रा चुनाव से पहले हुई थी। नर्मदा परिक्रमा 30 सितंबर 2017 को नरसिंहपुर के बरमान घाट से शुरू हुई। दिग्विजय और पत्नी अमृता 192 दिन में करीब तीन हजार 300 किलोमीटर पैदल चले।
9 अप्रैल 2018 को परिक्रमा उसी घाट पर पूरी हुई। यह यात्रा मप्र की 230 में से 110 विधानसभा क्षेत्रों से गुजरी थी। उसी साल दिसंबर में कांग्रेस 114 सीट के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी।
राजनीतिक यात्राओं का इतिहास दांडी से
अब जरा पीछे चलते हैं। 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी 78 साथियों के साथ साबरमती आश्रम से निकले। 24 दिन में करीब 387 किलोमीटर चलकर वे दांडी पहुंचे। 6 अप्रैल को उन्होंने नमक कानून तोड़ा। इसके बाद देशभर में सविनय अवज्ञा फैल गई।
6 जनवरी 1983 को पूर्व पीएम चंद्रशेखर कन्याकुमारी से पैदल निकले। 25 जून 1983 को वे दिल्ली के राजघाट पहुंचे। चार हजार 260 किलोमीटर की इस भारत यात्रा का मकसद आम लोगों की समस्याएं समझना था। लोग उन्हें 'मैराथन मैन' कहने लगे।
आडवाणी की रथ यात्रा ने क्या बदला
25 सितंबर 1990 को भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से निकले। करीब 10 हजार किलोमीटर चलकर 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचना तय था। रथ रोज करीब 300 किलोमीटर चलता था। 23 अक्टूबर को बिहार के समस्तीपुर में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। तब लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री थे।
गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। जल्दी चुनाव हुए और भाजपा को बड़ा फायदा मिला। हालांकि Rath Yatra 1990 के रास्ते में कई शहरों में सांप्रदायिक हिंसा भी हुई।
रथ यात्रा पर आडवाणी ने क्या लिखा
11 दिसंबर 1991 को मुरली मनोहर जोशी ने कन्याकुमारी से एकता यात्रा शुरू की। 14 राज्यों से गुजरकर 26 जनवरी 1992 को लाल चौक पर तिरंगा फहराया गया। नरेंद्र मोदी इसकी तैयारी करने वालों में थे। लेकिन लाल चौक कार्यक्रम में स्थानीय लोगों की भागीदारी कम रही। आडवाणी ने 1997 में करीब 15 हजार किलोमीटर की स्वर्ण जयंती यात्रा निकाली।
10 मार्च 2004 को कन्याकुमारी से भारत उदय यात्रा शुरू हुई। 7 हजार 870 किलोमीटर की यह यात्रा वाजपेयी सरकार की उपलब्धियां गिनाने के लिए थी। फिर भी एनडीए (NDA - National Democratic Alliance) सत्ता नहीं बचा सका। 11 अक्टूबर 2011 को जेपी की जन्मस्थली सिताब दियारा से जनचेतना यात्रा निकली। भ्रष्टाचार और काले धन पर केंद्रित यह यात्रा 76 सौ किलोमीटर की थी।
भारत जोड़ो यात्रा का असली हिसाब
7 सितंबर 2022 को राहुल गांधी कन्याकुमारी से निकले। 30 जनवरी 2023 को Bharat Jodo Yatra श्रीनगर में पूरी हुई। कांग्रेस के मुताबिक, यह 4,080 किलोमीटर की पदयात्रा थी। पार्टी ने महंगाई, बेरोजगारी और नफरत की राजनीति को मुद्दा बनाया।
कांग्रेस ने हिमाचल और कर्नाटक की जीत का श्रेय इस यात्रा को दिया। पर गुजरात में पार्टी बुरी तरह हारी। इंडियन एक्सप्रेस के विश्लेषण के मुताबिक भारत जोड़ो यात्रा 71 लोकसभा सीटों से गुजरी। 2024 में कांग्रेस इनमें 56 पर लड़ी और 23 जीती।
हालांकि मप्र की सात सीटों पर पार्टी को कोई फायदा नहीं मिला। भारत जोड़ो न्याय यात्रा 14 जनवरी 2024 को मणिपुर के थौबल से चली। 16 मार्च को यह मुंबई में खत्म हुई। ज्यादातर सफर बस से हुआ। रूट में मप्र के 698, छत्तीसगढ़ के 536 और राजस्थान के 128 किलोमीटर थे। यह 82 लोकसभा सीटों से गुजरी। कांग्रेस इनमें 49 पर लड़ी और 17 जीती।
17 अगस्त 2025 को राहुल ने बिहार के सासाराम से वोटर अधिकार यात्रा शुरू की। 16 दिन में करीब 13 सौ किलोमीटर तय कर यह एक सितंबर को पटना पहुंची। मुद्दा मतदाता सूची के एसआईआर (SIR - Special Intensive Revision) पर आपत्ति था। नवंबर 2025 के चुनाव में भाजपा गठबंधन ने बड़ी जीत दर्ज की।
मप्र में जन आशीर्वाद यात्रा का रिकॉर्ड
शिवराज सिंह चौहान ने 2008, 2013 और 2018 में जन आशीर्वाद यात्रा की अगुवाई की। 2013 की यात्रा 206 विधानसभा क्षेत्रों तक पहुंची। उस चुनाव में भाजपा ने 165 सीट जीतीं। 14 जुलाई 2018 को अमित शाह ने उज्जैन से यात्रा रवाना की। लक्ष्य 230 सीटें था, पर यात्रा 187 सीटों के बाद जबलपुर में थम गई। उस चुनाव में भाजपा 109 सीट पर रुक गई।
2023 में भाजपा ने बिना किसी एक चेहरे के पांच यात्राएं निकालीं। ये विंध्य, महाकौशल, मालवा, निमाड़ और ग्वालियर-चंबल से चलीं। 10 हजार 643 किलोमीटर में 210 सीटें कवर हुईं। भाजपा ने 163 सीट जीतकर बड़ा बहुमत पाया।
19 सितंबर 2023 को कांग्रेस ने सात जन आक्रोश यात्राएं शुरू कीं। 15 दिन में 11 हजार 400 किलोमीटर और सभी 230 सीटों का लक्ष्य था। नतीजों में कांग्रेस 66 सीट पर सिमट गई।
11 दिसंबर 2016 को शिवराज ने अमरकंटक से नमामि देवि नर्मदे सेवा यात्रा शुरू की। 3 हजार 344 किलोमीटर और एक हजार एक सौ से ज्यादा गांव-कस्बों से गुजरकर यह 15 मई 2017 को लौटी। समापन पर पीएम मोदी ने नर्मदा सेवा मिशन शुरू किया।
राजस्थान में परिवर्तन यात्रा का दम
वसुंधरा राजे ने 2003 में राजसमंद के चारभुजा मंदिर से परिवर्तन यात्रा निकाली। साल 1998 में 153 सीट जीतने वाली गहलोत सरकार 2003 में 56 पर आ गई। राजे राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। 2013 में सुराज संकल्प यात्रा भी चारभुजा से चली।
हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक दोनों यात्राओं ने भाजपा को बड़ी जीत दिलाई। दोनों बार राजे विपक्ष में थीं। 4 अगस्त 2018 को अमित शाह ने राजस्थान गौरव यात्रा रवाना की। 40 दिन में छह हजार 54 किलोमीटर और 165 सीटें तय थीं। विश्लेषकों के मुताबिक यह सरकार विरोधी माहौल नहीं बदल सकी।
सचिन पायलट की 125 किलोमीटर की पदयात्रा
11 मई 2023 को सचिन पायलट ने अजमेर से जन संघर्ष यात्रा शुरू की। 125 किलोमीटर की यह पदयात्रा पांच दिन में जयपुर पहुंची। मुद्दे भ्रष्टाचार और भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक थे। इससे गहलोत और पायलट की खींचतान और गहरी हुई।
2 सितंबर 2023 से भाजपा ने चार परिवर्तन संकल्प यात्राएं निकालीं। ये सवाई माधोपुर, बेणेश्वर धाम, रामदेवरा और गोगामेड़ी से चलीं। करीब नौ हजार किलोमीटर में सभी 200 सीटें कवर हुईं। भाजपा 115 सीट जीतकर सत्ता में लौटी।
छत्तीसगढ़ में विकास बनाम परिवर्तन
6 मई 2013 को आडवाणी ने दंतेवाड़ा से रमन सिंह की विकास यात्रा रवाना की।
झीरम घाटी में थम गई परिवर्तन यात्रा
25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर झीरम घाटी में नक्सली हमला हुआ। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश और महेंद्र कर्मा मारे गए। पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल की भी जान गई।
अदालती कार्यवाही में 29 मौतें दर्ज हैं। सितंबर 2026 में एनआईए (NIA - National Investigation Agency) कोर्ट ने सभी 10 आरोपियों को दोषी ठहराया। हमले के बाद रमन सिंह ने भी अपनी यात्रा रोक दी।
19 अगस्त 2013 को अरंग से यात्रा फिर शुरू हुई। सात चरणों में करीब 6,000 किलोमीटर का सफर पूरा हुआ। 2018 में रमन सिंह ने दो चरणों की अटल विकास यात्रा में सभी 90 सीटें नापीं।
अमित शाह ने इसे 11 हजार किलोमीटर का सफर बताया। फिर भी कांग्रेस 68 सीट जीती। भाजपा 15 पर सिमट गई। 12 सितंबर 2023 को दंतेवाड़ा और 15 सितंबर को जशपुर से भाजपा की परिवर्तन यात्राएं निकलीं। 2,989 किलोमीटर में 87 सीटें कवर हुईं। दोनों यात्राएं 28 सितंबर को बिलासपुर में मिलीं। भाजपा 54 सीट के साथ सत्ता में लौटी।
तो फिर यात्रा जीत की गारंटी क्यों नहीं
अगर यात्रा ही जीत दिलाती, तो 2004 में भारत उदय यात्रा के बाद एनडीए क्यों हारता? 2018 में शिवराज, राजे और रमन सिंह, तीनों यात्रा के बावजूद सत्ता से बाहर हुए। उधर 2023 में तीनों राज्यों में विपक्ष की यात्राएं जीत में बदलीं।
दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरू कॉलेज की राधिका कुमार ने 2017 में इस पर शोध पत्र लिखा। उन्होंने पदयात्रा को राजनीतिक संवाद और लामबंदी का पारंपरिक भारतीय तरीका बताया। उनके मुताबिक रथ यात्रा ने इसके अहिंसक स्वरूप को आक्रामक राजनीतिक संदेश में बदला। Political Yatra India की यह बहस अब फिर सड़क पर है। दिग्विजय की यात्रा का सियासी असर आने वाले चुनाव ही बताएंगे।
यह खबर क्यों जरूरी है
संविधान का अनुच्छेद 19 हर नागरिक को बोलने, शांतिपूर्ण सभा करने और देश में कहीं भी आने-जाने का हक देता है। राजनीतिक यात्रा इसी हक का सबसे पुराना इस्तेमाल है। दांडी मार्च ने इसे आजादी का हथियार बनाया।
बाद में यात्राएं सत्ता की सीढ़ी भी बनीं और कई बार हिंसा की वजह भी। मतदाता के लिए जरूरी है कि वह यात्रा के शोर से आगे मुद्दों को परखे। धर्म और राजनीति के मेल पर सवाल पूछना भी लोकतंत्र का हिस्सा है।
FAQs:
- दिग्विजय सिंह की सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा कहां से कहां तक है?
यह यात्रा उज्जैन से अयोध्या तक है। 20 अक्टूबर 2026 को शुरू हुई यात्रा करीब 950 किलोमीटर की है। करीब 70 दिन में अयोध्या पहुंचने का लक्ष्य है। - भारत की पहली बड़ी राजनीतिक यात्रा कौन सी मानी जाती है?
1930 का दांडी मार्च सबसे बड़ी शुरुआती मिसाल है। गांधी 78 साथियों के साथ 24 दिन में करीब 387 किलोमीटर चले। इसके बाद देशभर में सविनय अवज्ञा आंदोलन फैला। - क्या राजनीतिक यात्रा से चुनाव जीतना तय होता है?
नहीं, यात्रा जीत की गारंटी नहीं है। 2004 की भारत उदय यात्रा के बाद एनडीए हारा था। 2018 में मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री यात्रा के बावजूद सत्ता से बाहर हुए।