आज का इतिहास: गद्दी पाने के लिए औरंगजेब ने अपने ही बड़े भाई की कर दी थी हत्या, सिर काटकर भेजा था शाहजहां के पास

Dablu Kumar | Aug 30, 2025, 08:00 IST
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दारा शिकोह की हत्या मुगल साम्राज्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। इस घटना ने धार्मिक सहिष्णुता को समाप्त किया और औरंगजेब के कट्टर शासन की शुरुआत की।

भारत के इतिहास में कई मुगल शासक हुए हैं, लेकिन जब भी मुगलों की बात होती है तो उनकी तानाशाही सामने आती है। हालांकि, इन मुगल शासकों में एक ऐसा शासक भी था, जिनकी कहानी दूसरों से अलग है। इस मुगल सम्राट को उन लोगों ने भी पसंद किया, जो हमेशा मुगलों के खिलाफ रहे थे।



यह मुगल शासक था दारा शिकोह। दारा शिकोह की कई रोचक और दिलचस्प कहानियां प्रचलित हैं और उन्हीं में से एक कहानी है उनके मारे जाने की। दारा शिकोह की मृत्यु इसलिए भी चर्चित है क्योंकि उन्हें उनके ही छोटे भाई औरंगजेब ने बंदी बना लिया था और बाद में उनके सिर को काटकर उनके पिता शाहजहां के पास भेज दिया था।



दारा सिकोह की तस्वीर

यह घटना 30 अगस्त 1659 को घटी थी और यह दिन दारा शिकोह की पुण्यतिथि के रूप में जाना जाता है। उस दिन औरंगजेब ने अपने भाई को मौत के घाट उतार दिया था। आज भी दारा शिकोह की मृत्यु के बारे में चर्चा होती रहती है।



दारा शिकोह की हत्या के पीछे का कारण क्या था और उनके व्यक्तित्व की कौन-कौन सी बातें थीं, जो मुगली इतिहास में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, यह जानना जरूरी है। दारा शिकोह की कहानी आज भी इतिहास के अहम हिस्सों में गिनी जाती है, जो दर्शाती है कि उन्होंने अपने जीवन में किस तरह से अलग-अलग सोच और दृष्टिकोण को अपनाया था।



औरंगजेब की तस्वीर

बड़े भाई का सिर काटकर सिंहासन पर किया कब्जा

शाहजहां के बेटे और दारा शिकोह के भाई औरंगजेब ने अपने बड़े भाई का सिर काटकर सिंहासन पर कब्जा कर लिया था। असल में, जब शाहजहां बीमार पड़े थे, तो उनके उत्तराधिकार को लेकर दोनों भाइयों के बीच संघर्ष हुआ था। इस युद्ध में औरंगजेब ने दारा शिकोह को हराया।



इसके बाद दारा शिकोह को रणभूमि छोड़कर भागना पड़ा। वह पहले दिल्ली के रास्ते पंजाब और फिर अफगानिस्तान तक गए, लेकिन औरंगजेब ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। एक समय ऐसा आया जब औरंगजेब ने उन्हें पकड़ लिया और सड़कों पर उनकी बेइज्जती करने के बाद उन्हें महल में बंदी बना लिया।



इसके बाद औरंगजेब ने दारा शिकोह को मौत की सजा देने का निर्णय लिया। नजर बेग ने दारा शिकोह का सिर धड़ से अलग कर दिया और फिर इस कटे हुए सिर को औरंगजेब के सामने पेश किया। सिर को दिल्ली में घुमाने के बाद इसे शाहजहां के पास भेज दिया गया।



शाहजहां की तस्वीर

दारा शिकोह के बारे में यह कहा जाता है कि वह विचारक, कवि और धर्मशास्त्री थे। लेकिन, सैन्य मामलों में उनकी कोई खास रुचि नहीं थी। शाहजहां उन्हें बहुत प्यार करते थे और उन्हें युद्ध में शामिल होने की अनुमति नहीं देते थे। एक रिपोर्ट के अनुसार, दारा शिकोह को शाही खजाने से दो लाख रुपए की राशि दी जाती थी और उन्हें रोजाना एक हजार रुपए भी मिलता था।



अब समझते हैं लड़ाई के पीछे की असल वजह

दारा शिकोह एक अत्यंत विद्वान, उदार और सहिष्णु व्यक्ति थे। उन्हें "लघु अकबर" भी कहा जाता था क्योंकि, उनकी धार्मिक नीति अकबर की तरह ही उदार थी। वे सूफीवाद के अनुयायी थे और उन्होंने हिंदू धर्मग्रंथों, विशेष रूप से उपनिषदों का गहन अध्ययन किया था।



उन्होंने 52 उपनिषदों का फारसी में "सिर्र-ए-अकबर" (महान रहस्य) शीर्षक से अनुवाद करवाया था। उनका मानना था कि इस्लाम और हिंदू धर्म के मूल सिद्धांत एक ही हैं।



उन्होंने "मजमा-उल-बहरेन" (दो सागरों का संगम) नामक पुस्तक भी लिखी, जिसमें उन्होंने सूफी और वेदांत दर्शन के बीच समानताएं दर्शाईं। उनकी यह विचारधारा उन्हें रूढ़िवादी इस्लामी विद्वानों और उनके भाई औरंगजेब के बीच विवाद का कारण बनी।



उत्तराधिकार का संघर्ष

शाहजहां के बीमार पड़ने के बाद उनके चार पुत्रों - दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंगजेब और मुराद बख्श के बीच सत्ता के लिए संघर्ष शुरू हो गया। शाहजहां दारा को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे और उन्होंने दारा को शाह-ए-बुलंद इकबाल (उच्च भाग्य का राजा) की उपाधि दी थी।



दूसरी तरफ, औरंगजेब अत्यंत महत्वाकांक्षी और कट्टर सुन्नी मुसलमान था। दारा की धार्मिक सहिष्णुता और उदारवादी दृष्टिकोण को पसंद नहीं करता था। उसने दारा को इस्लाम विरोधी घोषित किया और शाह शुजा और मुराद बख़्श के साथ मिलकर दारा के खिलाफ गठबंधन बनाया।



सामूगढ़ का निर्णायक युद्ध

उत्तराधिकार के संघर्ष में कई युद्ध हुए, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण 1658 का सामूगढ़ का युद्ध था। इस युद्ध में औरंगजेब और मुराद की संयुक्त सेना ने दारा शिकोह की सेना को बुरी तरह हराया। दारा की हार का मुख्य कारण उनका कम सैन्य अनुभव, उनके सेनापतियों का विश्वासघात और औरंगजेब की बेहतर रणनीति थी।



सामूगढ़ की हार के बाद, दारा को भागना पड़ा और औरंगजेब आगरा और दिल्ली पर नियंत्रण स्थापित करने में सफल रहा। उसने शाहजहां को आगरा के किले में कैद कर दिया और खुद को बादशाह घोषित कर दिया।



दारा की गिरफ्तारी और मुकदमा

सामूगढ़ की हार के बाद दारा ने पंजाब, सिंध और गुजरात में शरण ली, लेकिन उन्हें लगातार औरंगजेब की सेनाओं द्वारा पीछा किया गया। अंततः 1659 में सिंध में उनकी सेना को एक और हार मिली, जिसके बाद उनके साथ अफगान सरदार मलिक जीवन ने विश्वासघात किया और औरंगजेब की सेना को सौंप दिया। मलिक जीवन दारा का मित्र था, लेकिन उसने लालच में आकर दारा को धोखा दिया।



दिल्ली लाए जाने के बाद, दारा पर एक कठपुतली अदालत में मुकदमा चलाया गया। औरंगजेब ने उन पर इस्लाम धर्म का अपमान करने और "मूर्तिपूजकों" (हिंदुओं) से मेलजोल रखने का आरोप लगाया। यह आरोप पूरी तरह से राजनीतिक था क्योंकि औरंगजेब दारा को उत्तराधिकार के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता था। कठमुल्लाओं ने दारा को "काफिर" (विधर्मी) घोषित किया और उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई।



दारा शिकोह की हत्या

30 अगस्त 1659 को दारा शिकोह का सर कलम कर दिया गया। उनकी मृत्यु के बाद, उनके कटे हुए सिर को एक थाल में रखकर औरंगजेब के सामने पेश किया गया। औरंगजेब ने अपने भाई के सिर को पहचान कर कहा, "यह देश और सिंहासन के लिए एक बड़ा खतरा था।" बाद में, दारा शिकोह के धड़ को हुमायूं के मकबरे के परिसर में दफना दिया गया, जबकि उनके सिर को दिल्ली में कहीं छिपा दिया गया, ताकि उनके समर्थकों को कोई कब्र न मिले।



दारा शिकोह की मृत्यु मुगल साम्राज्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। यह धार्मिक उदारवाद और सहिष्णुता की हार थी और कट्टरता और रूढ़िवादिता की जीत थी। दारा की मृत्यु के साथ, मुगल दरबार में उदारवादी विचारों का अंत हो गया और औरंगजेब का शासन शुरू हुआ, जिसने इस्लामी शरीयत कानूनों को लागू किया और गैर-मुस्लिमों पर प्रतिबंध लगाए।



कई इतिहासकारों का मानना है कि दारा शिकोह का वध मुगल साम्राज्य के पतन की शुरुआत थी क्योंकि इसने धार्मिक सहिष्णुता की उस नीति को समाप्त कर दिया था, जिस पर अकबर ने मुगल साम्राज्य की नींव रखी थी। दारा शिकोह की त्रासदी हमें यह सिखाती है कि कैसे सत्ता की लालसा, धार्मिक कट्टरता और विश्वासघात एक महान सभ्यता को बर्बाद कर सकते हैं।





30 अगस्त का इतिहास: 10 बड़ी घटनाएं

30 अगस्त 1836: मेलबर्न शहर की स्थापना की गई।

30 अगस्त 1928: पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इंडिपेंडेंस फॉर इंडिया लीग की स्थापना की।

30 अगस्त 1947: भारतीय संविधान सभा ने 'अछूत' शब्द के प्रयोग को गैरकानूनी घोषित कर दिया।

30 अगस्त 1956: भारत में भाषा-आधारित राज्यों के पुनर्गठन के लिए राज्य पुनर्गठन आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश की।

30 अगस्त 1659: मुगल बादशाह शाहजहां के पुत्र दारा शिकोह को औरंगजेब द्वारा फांसी दी गई।

30 अगस्त 1806: न्यूयॉर्क शहर का दूसरा दैनिक समाचार पत्र ‘डेली एडवर्टाइजर’ आखिरी बार प्रकाशित किया गया।

30 अगस्त 1951: फिलीपींस और अमेरिका ने एक रक्षा संधि पर हस्ताक्षर किये।

30 अगस्त 1991: सोवियत संघ के पतन के बाद अजरबैजान ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की।

30 अगस्त 1997: भारतीय टेनिस खिलाड़ी महेश भूपति ने ग्रैंड स्लैम जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बनकर इतिहास रचा।

30 अगस्त 1999: पूर्वी तिमोर के निवासियों ने इंडोनेशिया से आजादी के लिए भारी मतदान किया।

30 अगस्त 2014: भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में आतंकवादियों के खिलाफ एक बड़ा ऑपरेशन चलाया।

30 अगस्त को भारत और विश्व के नजरिए से क्यों याद रखा जाना चाहिए?

भारत के नजरिए से:



30 अगस्त का दिन भारत के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है



राजनीतिक और सामाजिक सुधार: 1947 में संविधान सभा द्वारा 'अछूत' शब्द के इस्तेमाल को गैरकानूनी घोषित करने का निर्णय सामाजिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम था।



स्वतंत्रता के लिए बड़ा कदम: इंडिपेंडेंस फॉर इंडिया लीग की स्थापना पंडित जवाहरलाल नेहरू ने की।



विश्व के नजरिए से:



भू-राजनीतिक बदलाव: 1991 में सोवियत संघ से अजरबैजान की स्वतंत्रता ने विश्व मानचित्र पर नए देशों के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।



पेनसिल्वेनिया कॉलोनी की स्थापना: विलियम पेन इंग्लैंड से रवाना हुए और बाद में उन्होंने अमेरिका में पेनसिल्वेनिया कॉलोनी की स्थापना की।



दुनिया को मिला नया शहर: मेलबर्न शहर की स्थापना की गई।



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