न चीन के आगे झुकें, न अमेरिका पर निर्भर रहें: थरूर

Manya Jain | Jul 27, 2026, 12:30 IST
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कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने चेताया है कि ट्रम्प प्रशासन की अनिश्चितता के बीच चीन के साथ जल्दबाजी में रीसेट खतरनाक होगा। गलवान से ऑपरेशन सिंदूर तक चीन की आक्रामकता याद दिलाते हुए उन्होंने रणनीतिक धैर्य की वकालत की।

अमेरिका की राजनीति में बहुत उठा-पटक चल रही है। इससे भारत में एक नई चिंता पैदा हुई है। डोनाल्ड ट्रम्प सरकार के फैसले अक्सर अचानक बदल जाते हैं। इससे भारत को भी नुकसान हुआ है। पिछले साल स्टील और एल्युमिनियम पर भारी टैक्स लगाया गया। भारत का व्यापार में मिलने वाला विशेष दर्जा भी छीन लिया गया। साथ ही अमेरिका ने पाकिस्तान से दोस्ती और बढ़ा ली। H-1B वीजा के नियम भी सख्त कर दिए। इन सब वजहों से कुछ लोग कह रहे हैं कि भारत को चीन के साथ अपनी नीति बदल देनी चाहिए।



बिज़नेस लोगों की दलील

कांग्रेस सांसद शशि थरूर कहते हैं कि यह मांग खासकर बड़े व्यापारियों की तरफ से आ रही है। उनका कहना है कि भारत चीन से दुश्मनी इसलिए निभा रहा है, क्योंकि अमेरिका ऐसा चाहता है, न कि भारत के अपने फायदे के लिए। व्यापारियों का कहना है कि भारत, चीन की टेक्नोलॉजी, सामान और पैसे पर बहुत निर्भर है। इसलिए चीन से दुश्मनी रखने से भारत का ही नुकसान हो रहा है, चीन का कुछ नहीं बिगड़ रहा।


थरूर मानते हैं कि अमेरिका पर पूरा भरोसा करना गलत है, यह बात सही है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जल्दबाजी में चीन के आगे झुक जाएं और बदले में कुछ न मांगें। यह सोच थोड़े फायदे के लिए देश की सुरक्षा को दांव पर लगाने जैसा है।



पिछले 10 साल की चीन की आक्रामकता

थरूर लिखते हैं कि कुछ लोग 2020 से पहले वाली स्थिति में लौटना चाहते हैं। लेकिन वे भूल रहे हैं कि चीन की सेना और सरकार पिछले 10 साल से लगातार भारत को परेशान कर रही है। यह कोई छोटी-मोटी सीमा की झड़प नहीं है। यह एक सोची-समझी चाल है। 2013 में देपसांग, 2014 में चुमार, 2017 में डोकलाम और 2020 में गलवान घाटी में खूनी झड़प- चीन ने हर बार थोड़ा-थोड़ा करके सीमा बदलने की कोशिश की। इसे चीन धीरे-धीरे कब्ज़ा करने की रणनीति कहते हैं। चीन ने पुरानी शांति संधियों को भी तोड़ा है।



थरूर के मुताबिक चीन पूरे अरुणाचल प्रदेश को अपना बताता है, जबकि वहां उसका कोई कब्ज़ा नहीं। चीन वहां की जगहों के नाम भी बदल देता है। जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल के लोगों को चीन अलग तरह का वीज़ा देता है- यह भी भारत को छोटा दिखाने की एक चाल है।



आर्थिक दबाव और ऑपरेशन सिंदूर

चीन अपनी फैक्ट्रियों की ताकत को हथियार की तरह इस्तेमाल करता है। जब भी झगड़ा होता है, चीन अचानक जरूरी मशीनें और सामान देना बंद कर देता है। दुर्लभ धातुओं (rare earths) और सुरंग खोदने वाली मशीनों पर भी चीन का एकाधिकार है, जिसका वो फायदा उठाता है। थरूर के मुताबिक सबसे चिंता की बात यह है कि मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन ने पाकिस्तान की सीधे मदद की। चीन ने पाकिस्तान को सैटेलाइट से मिलने वाली जानकारी दी। इससे चीन सिर्फ हथियार बेचने वाला नहीं, बल्कि पाकिस्तान का साथी बन गया।



यह सोचना गलत है कि चीन बदले में अच्छा व्यवहार करेगा कुछ लोग सोचते हैं कि अगर भारत चीन से नरमी दिखाए तो चीन भी अच्छे से पेश आएगा। थरूर कहते हैं कि यह सोच गलत है। चीन की नीति ही यह है कि पूरे एशिया में सिर्फ उसी का दबदबा रहे। चीन कभी नहीं चाहेगा कि भारत उसके बराबर बने।



थरूर बताते हैं कि चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में अपने वीटो का इस्तेमाल पाकिस्तान के आतंकी संगठनों को बचाने के लिए करता आया है। चीन ने भारत को UNSC की स्थायी सदस्यता और परमाणु सप्लायर ग्रुप (NSG) की सदस्यता से भी रोका है। अगर भारत बिना शर्त चीन के लिए अपने बाज़ार खोल देता है, तो यह अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। चीन का भारत के साथ व्यापार में मुनाफा 100 अरब डॉलर से भी ज्यादा है। थरूर चेताते हैं कि आगे किसी संकट में चीन ज़रूरी सामान रोक सकता है, जिससे भारत के कारखाने बंद हो सकते हैं और भारत अपने फैसले खुद नहीं ले पाएगा।



झुकना या धैर्य रखना?

कुछ लोग मानते हैं कि तनाव कम करने से सीमा का मामला हमेशा के लिए सुलझ सकता है। थरूर कहते हैं कि सच इसका उल्टा है। चीन ताकत की इज्ज़त करता है, कमज़ोरी का फायदा उठाता है। अगर भारत झुक गया, तो चीन समझेगा कि उसका दबाव काम कर रहा है।



एक बार दी गई ताकत वापस लेना आसान नहीं होता। गलवान के बाद भारत ने चीनी ऐप्स, निवेश और टेलिकॉम कंपनियों पर जो पाबंदी लगाई थी, वो सिर्फ गुस्से में लिया फैसला नहीं थी — यह भारत की बड़ी ताकत थी। थोड़े से फायदे के लिए इसे हटाना खुद को कमज़ोर करने जैसा होगा।



अमेरिका पर भी भरोसा नहीं

थरूर मानते हैं कि भारत मुश्किल स्थिति में है। ट्रम्प सरकार का रवैया भरोसेमंद नहीं, इसलिए अमेरिका पर पूरी तरह टिके रहना ठीक नहीं- चाहे भारत में अमेरिकी दूत सर्जियो गोर कितने भी उत्साहित क्यों न हों। अमेरिका हमेशा पहले अपना फायदा देखेगा। भारत को यह समझना होगा कि लद्दाख की सीमा पर वह अकेला ही खड़ा है।



लेकिन थरूर यह भी साफ करते हैं- अमेरिका पर भरोसा न करने का मतलब यह नहीं कि भारत चीन की गोद में चला जाए। अमेरिका के अधीन होने और चीन के आगे झुकने के बीच एक तीसरा रास्ता भी है।



आगे क्या करना चाहिए?

थरूर के मुताबिक भारत को धैर्य रखना चाहिए और खुद को मज़बूत बनाना चाहिए। भारत को अपनी सप्लाई चेन मजबूत करनी चाहिए। यूरोप, पूर्वी एशिया और गरीब देशों के साथ व्यापार बढ़ाना चाहिए। भले ही महंगाई थोड़ी बढ़े, फिर भी भारत को अपने कारखाने और उत्पादन बढ़ाना चाहिए। चीन भारत के लिए एक लंबे समय की बड़ी चुनौती है। घबराकर या व्यापारियों की शिकायत सुनकर जल्दबाजी करने से भारत हमेशा के लिए कमज़ोर हो जाएगा।



थरूर आखिर में लिखते हैं- भारत को किसी भी तरफ झुकने की ज़रूरत नहीं। भारत को सीधे खड़े रहने की ताकत बनानी होगी।



लेखक शशि थरूर चौथी बार कांग्रेस से लोकसभा सांसद (तिरुवनंतपुरम, कांग्रेस) हैं। वे विदेश मामलों की संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष, साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता भी हैं। लेख में प्रकाशित विचार उनके व्यक्तिगत हैं।



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