गाली नहीं, सभ्यता का पतन : जब साहित्यकार गाली को सही ठहराने लगें, तब क्या होता है?

The Sootr | Jul 25, 2026, 15:11 IST
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sahityakar gaali nyayikaran bhasha sankat
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जब प्रतिष्ठित साहित्यकार गाली को वैचारिक औचित्य देने लगते हैं, तो वे भाषा की नैतिक मर्यादा तोड़ते हैं। रिटायर्ड आईएएस मनोज श्रीवास्तव का यह लेख बताता है कि गाली संवाद नहीं, हिंसा की भाषा है। साहित्यकारों की यह चुप्पी सभ्यता के लिए खतरा बन सकती है।

मनोज श्रीवास्तव

सामान्य व्यक्ति यदि क्रोध में गाली देता है तो वह अपनी निजी दुर्बलता प्रकट करता है। परन्तु जब कोई प्रतिष्ठित लेखक, कवि या बुद्धिजीवी उसी गाली को वैचारिक औचित्य प्रदान करता है, तब वह केवल स्वयं नहीं बोल रहा होता।

उसके पीछे उसकी अर्जित सांस्कृतिक पूंजी की अल्पता बोल रही होती है। साहित्यकार की सबसे बड़ी शक्ति उसकी भाषा पर समाज का विश्वास है। वह विश्वास वर्षों की साधना से अर्जित होता है।

जब वही व्यक्ति कहता है कि अमुक परिस्थिति में गाली उचित है, तब वह केवल एक अपशब्द का समर्थन नहीं करता; वह भाषा के नैतिक संविधान में संशोधन कर देता है।

समाज शब्दकोश कहां से सीखता है?

समाज अपने शब्दकोश केवल विद्यालयों से नहीं सीखता; वह उन्हें कवियों, उपन्यासकारों, नाटककारों और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों से भी सीखता है।
यदि साहित्यकार भाषा की मर्यादा का प्रहरी न रहकर उसकी सीमा-भंग का वैचारिक अधिवक्ता बन जाए, तब समाज में यह धारणा बनने लगती है कि नैतिकता भी दलगत है - जिसे हम अपना विरोधी मान लें, उसके लिए कोई भी शब्द वैध हो जाता है।

समाज असभ्यता की ओर कैसे बढ़ता है?

कोई समाज एक दिन अचानक असभ्य नहीं हो जाता। पहले एक अपशब्द को अपवाद कहा जाता है, फिर उसे प्रतिक्रिया कहा जाता है, फिर प्रतिरोध कहा जाता है, और अन्ततः उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पर्याय बना दिया जाता है।

इस क्रम में सबसे खतरनाक वह चरण है जहाँ बुद्धिजीवी उसका औचित्य सिद्ध करने लगते हैं। क्योंकि बुद्धिजीवी किसी प्रवृत्ति को जन्म भले न दें, उसे वैधता अवश्य दे सकते हैं।

सोशल मीडिया ने भाषा को कैसे बदल दिया?

सोशल मीडिया ने भाषा को तत्क्षण प्रतिक्रिया का माध्यम बना दिया है। अब शब्द तपस्या से नहीं, आवेग से जन्म लेते हैं। एल्गोरिद्म संयम को नहीं, उत्तेजना को पुरस्कृत करते हैं।

सबसे अधिक साझा वही वाक्य होता है जो सबसे अधिक अपमानजनक हो। परिणाम यह हुआ कि भाषा का बाज़ार बन गया, जहाँ शालीनता की नहीं, सनसनी की माँग है।

इस बाज़ार में यदि साहित्यकार भी वही बेचने लगे जो भीड़ खरीदना चाहती है, तो साहित्य और ट्रोलिंग के बीच का अंतर मिटने लगता है।

साहित्यकार का प्रतिरोध कब पराजय बन जाता है?

साहित्यकार को सत्ता से असहमति का पूरा अधिकार है; बल्कि अनेक बार वही उसका नैतिक दायित्व भी है। परन्तु यदि वह प्रतिरोध की भाषा को गाली की भाषा बना देता है, तो वह सत्ता का प्रतिरोध नहीं करता - वह भाषा की पराजय का उत्सव मनाता है।

तब समझ लीजिए कि लोकतंत्र का संकट चुनावों में नहीं, भाषा में प्रारम्भ हो चुका है।

गाली का असली अपराध क्या है?

गाली का सबसे बड़ा अपराध यह नहीं कि वह अशिष्ट है। अशिष्टता तो कभी-कभी केवल सामाजिक प्रशिक्षण का अभाव भी हो सकती है।

उसका वास्तविक अपराध यह है कि वह सामने वाले को संवाद के योग्य व्यक्ति नहीं रहने देती। वह उसे एक विचारशील अस्तित्व से घटाकर एक अपमानित वस्तु में बदल देती है।

दर्शनशास्त्री इमैनुएल लेविनास ने कहा था कि दूसरे मनुष्य का चेहरा हमें नैतिक उत्तरदायित्व का आह्वान देता है। गाली उस चेहरे को मिटा देती है। वह दूसरे को एक चेहरा नहीं, एक लक्ष्य (target) बना देती है।

जिस क्षण किसी व्यक्ति का नाम उसके लिए प्रयुक्त अपशब्द से प्रतिस्थापित हो जाता है, उसी क्षण संवाद समाप्त हो जाता है और केवल आक्रमण शेष रह जाता है।

साहित्यकार की असली पूंजी क्या है?

समाज में प्रत्येक व्यक्ति की विश्वसनीयता समान स्रोत से नहीं आती। सैनिक की विश्वसनीयता उसके साहस से जन्म लेती है, न्यायाधीश की उसके निष्पक्ष विवेक से, चिकित्सक की उसकी करुणा और कौशल से।
उसी प्रकार साहित्यकार की वास्तविक पूँजी न उसकी प्रसिद्धि है, न पुरस्कार, न पाठकों की संख्या; उसकी सबसे बड़ी पूँजी है - उसकी भाषा की नैतिक विश्वसनीयता।

जो साहित्यकार सत्ता-विरोध और सभ्यता-विरोध में फर्क ही नहीं पहचान सके, वह साहित्यकार नहीं प्रोपेगंडिस्ट है, जिसकी मानसिकता यह है कि विरोधी को पराजित करने के लिए कोई भी साधन उचित है। यही मनोविज्ञान भाषा में भी प्रवेश करता है कि विरोधी को पराजित करने के लिए कोई भी शब्द उचित है।

लोकतंत्र और भाषा का रिश्ता क्या है?

लोकतंत्र केवल सत्ता बदलने की व्यवस्था नहीं है; वह भाषा को हिंसा से बचाने की भी व्यवस्था है। जिस शब्दावली में कोई आंदोलन बोलना सीखता है, वही उसके राजनीतिक संस्कार का स्थायी हिस्सा बन जाती है।
यदि कोई आंदोलन केवल घृणा की भाषा सुनता और बोलता रहे, तो अंततः वह घृणा उसके नैतिक व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है। तब वह सत्ता बदलने के बाद भी उसी भाषा में शासन करता है।

महान आंदोलनों ने भाषा को कैसे संभाला?

वाक्लाव हैवेल ने चेकोस्लोवाकिया के दमनकारी शासन का कठोर विरोध किया, किंतु उनकी भाषा में प्रतिशोध नहीं, नैतिक स्पष्टता थी। अलेक्ज़ेंडर सोल्झेनित्सिन ने सोवियत अत्याचारों का भंडाफोड़ किया, पर उनकी शक्ति अपशब्दों से नहीं, साक्ष्य और नैतिक साहस से आई।

मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने नस्लवाद के विरुद्ध ऐसी भाषा विकसित की जिसमें क्रोध था, किंतु घृणा नहीं; पीड़ा थी, किंतु अपमान नहीं। इसी कारण उनका शब्द इतिहास में टिक गया और उनके विरोधियों के नारे समय के साथ विलुप्त हो गए।

यदि विश्व के सबसे सफल जनांदोलन - जहाँ दमन कहीं अधिक था, हिंसा कहीं अधिक थी, अन्याय कहीं अधिक था - अपनी भाषा को मर्यादित रख सकते थे, तो आज हम क्यों यह मान लें कि गाली प्रतिरोध की अपरिहार्य भाषा है?
जिन आंदोलनों को अपने नैतिक बल पर विश्वास होता है, वे भाषा को गिराने की आवश्यकता नहीं समझते। जिन्हें अपने तर्क पर विश्वास होता है, वे गाली से परहेज़ करते हैं। गाली प्रायः वहाँ जन्म लेती है जहाँ व्यक्ति को लगता है कि उसके शब्द पर्याप्त प्रभावशाली नहीं रहे। इसलिए गाली अनेक बार शक्ति का नहीं, असुरक्षा का व्याकरण होती है।

जब भाषा का प्रहरी ही द्वार खोल दे?

यदि साहित्यकार, जिसे भाषा का ऋषि होना था, स्वयं भाषा की मर्यादा के विघटन का तर्कशास्त्री बन जाए, तो समाज किससे अपेक्षा करे? यदि प्रहरी ही द्वार खोल दे, तो आक्रमणकारी को परिश्रम नहीं करना पड़ता।
इसलिए किसी साहित्यकार द्वारा गाली का औचित्यीकरण केवल एक व्यक्तिगत मत नहीं; वह भाषा की उस नैतिक परंपरा के विरुद्ध विद्रोह है जिसने साहित्य को सभ्यता का अंतःकरण बनाया था।
सभ्यताएँ गालियों से नहीं टूटतीं। वे तब टूटती हैं जब उनके साहित्यकार गालियों को सांस्कृतिक वैधता (Cultural Legitimacy) देने लगते हैं।

साधारण व्यक्ति गाली देता है, समाज उसे सुधार सकता है। राजनेता गाली देता है, चुनाव उसे दंडित कर सकता है। पर यदि साहित्यकार गाली को सिद्धांत बना दे, तब समाज के पास उसे सुधारने का कोई सहज साधन नहीं बचता - क्योंकि वह भाषा का न्यायाधीश माना जाता है। और जब न्यायाधीश ही अपराध को वैध घोषित कर दे, तब अपराधी को अपराध-बोध क्यों होगा?

हमारे समय की वास्तविक त्रासदी केवल यह नहीं है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा गिर रही है। उससे कहीं बड़ी त्रासदी यह है कि भाषा के संरक्षक स्वयं उसके पतन के दार्शनिक बनने लगे हैं। यही वह क्षण है जहाँ सभ्यता भीतर से दरकने लगती है।

क्योंकि किसी भी राष्ट्र की अंतिम रक्षा सेना नहीं करती। संविधान भी नहीं। उसकी अंतिम रक्षा उसकी भाषा करती है।
किसी सभ्यता का वास्तविक चरित्र इस बात से नहीं पहचाना जाता कि वह अपने मित्रों से कैसी भाषा बोलती है; बल्कि इस बात से पहचाना जाता है कि वह अपने विरोधियों से कैसी भाषा बोलती है।

संवाद-नैतिकता क्यों जरूरी है?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के दावे करने वाले अभिव्यक्ति की साधना को लगभग भूल गए हैं। ऐसे समय जुर्गेन हैबरमास की संवाद-नैतिकता (Discourse Ethics) अत्यंत प्रासंगिक हो उठती है।
उनके अनुसार लोकतंत्र का वास्तविक आधार केवल मतदान नहीं, संवाद है। किंतु संवाद तभी संभव है जब प्रतिभागी एक-दूसरे को तर्क के योग्य मनुष्य मानते हों। जिस क्षण हम विरोधी को अपमान के योग्य प्राणी मानने लगते हैं, उसी क्षण संवाद की नैतिक पूर्वशर्त समाप्त हो जाती है।

लोकतंत्र केवल मतपत्रों से नहीं बचता। वह शब्दों से बचता है। संविधान केवल अधिकारों की रक्षा करता है। भाषा उन अधिकारों के योग्य मनुष्य की रक्षा करती है।

भारतीय वाक्-परंपरा और गाली का विरोधाभास क्या है?

कभी आपको लगता है कि ऋग्वेद के वाक्-सूक्त, भर्तृहरि के शब्द-ब्रह्म, तांत्रिक परंपरा की परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाक् का देश किस स्तर तक के कीचड़ में लोटने में आनंदित युवाओं को देखेगा?
वाक् के साधकों की चेतना विकास की दिशा में बढ़ती है - आवेग से विवेक की ओर, प्रतिक्रिया से उत्तरदायित्व की ओर, हिंसा से संवाद की ओर। गाली इस विकास-यात्रा का उलटा मार्ग है। वह चेतना को पुनः आदिम प्रतिक्रियाओं की ओर ले जाती है। ये गालियाँ भारतीय चेतना के अवरोह (Regression of Consciousness) का संकेत हैं।

नाम और गाली में क्या टकराव है?

भारतीय दर्शन में नाम और रूप केवल पहचान नहीं हैं; वे अस्तित्व के आयाम हैं। किसी का नाम लेना उसकी सत्ता को स्वीकार करना है। इसीलिए भारतीय परंपरा में नामकरण संस्कार है।
इसके विपरीत गाली नाम का अपहरण करती है। वह व्यक्ति को उसके वास्तविक नाम से नहीं पुकारती; उसे एक अपमानजनक संकेत में बदल देती है।

गाली मनोविज्ञान में क्या दर्शाती है?

गाली का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि उसे केवल अशिष्ट भाषा समझ लिया जाता है। वस्तुतः गाली भाषा का नहीं, चेतना का विषय है। शब्द केवल उसका माध्यम हैं; उसका वास्तविक निवास मनुष्य की मानसिक संरचना में है।
किसी व्यक्ति की गालियाँ केवल उसके शब्दकोश का परिचय नहीं देतीं; वे उसके भावनात्मक संगठन, उसकी असुरक्षाओं, उसकी आक्रामकता, उसके आत्म-नियंत्रण और उसके सांस्कृतिक संस्कारों का भी परिचय देती हैं। गालियाँ प्रायः उस व्यक्ति के अचेतन का दर्पण होती हैं जो उन्हें उच्चार रहा है।

प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स और भावनात्मक अपहरण

गाली और तर्क का मूलभूत अंतर स्पष्ट है। जब मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स सक्रिय रहता है, तब मनुष्य कारण देता है, प्रमाण प्रस्तुत करता है, तर्क करता है और स्वयं को नियंत्रित रखता है।

परंतु जब वह निष्क्रिय हो तो अमिग्डाला खतरे या अपमान का अनुभव करती है और नियंत्रण अपने हाथ में ले लेती है, तब भाषा का स्वरूप बदल जाता है। तर्क की जगह विस्फोट आ जाता है। आधुनिक मनोविज्ञान इसे Emotional Hijacking कहता है - एक ऐसी स्थिति जिसमें भावनाएँ संज्ञानात्मक नियंत्रण पर अस्थायी विजय प्राप्त कर लेती हैं।

गाली और सांस्कृतिक पवित्रता का संबंध क्या है?

गालियों का अध्ययन करें तो स्पष्ट होगा कि लगभग प्रत्येक गाली किसी-न-किसी सांस्कृतिक पवित्रता पर आघात करती है। कहीं मातृत्व को अपवित्र किया जाता है, कहीं स्त्री-देह को, कहीं धर्म को, कहीं जातीय पहचान को।
गाली वहीं प्रहार करती है जहाँ समाज ने सबसे अधिक पवित्रता स्थापित की होती है। इसलिए गाली का वास्तविक कार्य सूचना देना नहीं, पवित्र का अपवित्रीकरण करना है।

इन गालियों का आश्चर्यजनक विरोधाभास यह है कि वे लगभग कभी भी यौन सुख (sexual pleasure) के बारे में नहीं होतीं; वे यौन सत्ता (sexual power) के बारे में होती हैं। वे कामुकता की भाषा नहीं, प्रभुत्व (domination), अपमान (humiliation) और अधिकार-हरण (violation) की भाषा हैं।

सोशल मीडिया और आउटरेज इकोनॉमी कैसे जुड़े हैं?

विकासवादी मनोविज्ञान गालियों को प्रभुत्व-प्रदर्शन (Dominance Display) के रूप में भी देखता है। गाली का उद्देश्य सामने वाले को कोई नई सूचना देना नहीं होता; उसका उद्देश्य उसे मनोवैज्ञानिक रूप से दबाना होता है।
सोशल मीडिया पर गाली केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं रहती; वह सामाजिक पुरस्कार (social reward) प्राप्त करने का साधन भी बन जाती है। यदि किसी अपमानजनक टिप्पणी पर हजारों लाइक, शेयर और प्रशंसा मिलती है, तो मस्तिष्क का डोपामिन तंत्र उसे सफलता के रूप में दर्ज करता है।

धीरे-धीरे व्यक्ति सीख जाता है कि संयमित तर्क की अपेक्षा उत्तेजक अपमान अधिक लोकप्रिय है। यही वह प्रक्रिया है जिसे आज कई विचारक "Outrage Economy" कहते हैं - एक ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें ध्यान (attention) सबसे मूल्यवान वस्तु है और गाली उसे प्राप्त करने का सबसे सस्ता साधन।

क्या गाली हिंसा की पूर्वपीठिका है?

गाली का प्रयोजन तर्क को परास्त करना नहीं, प्रतिद्वंद्वी की आत्म-प्रतिष्ठा को आहत करना है। यही कारण है कि गाली मूलतः degradation ritual है - एक ऐसा भाषिक अनुष्ठान जिसके माध्यम से बोलने वाला दूसरे व्यक्ति को उसके मानवीय स्तर से नीचे धकेलना चाहता है।

एरिख फ्रॉम ने अपनी प्रसिद्ध कृति The Anatomy of Human Destructiveness में विनाशकारी प्रवृत्ति और जीवनोन्मुख प्रवृत्ति का अंतर किया है। फ्रॉम के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति अपनी शक्ति का अनुभव सृजन द्वारा करता है, जबकि असुरक्षित व्यक्ति अपनी शक्ति का अनुभव दूसरे को छोटा करके करता है।

इस दृष्टि से गाली कई बार शक्ति का प्रदर्शन नहीं, शक्ति के अभाव की क्षतिपूर्ति (Compensation) होती है। इसलिए गाली अनेक बार साहस की नहीं, सृजनशक्ति के अभाव की भाषा होती है।

फ्रायड का कहना था कि गाली हिंसा का स्थानापन्न (substitute) है। मैं उससे असहमत हूं। मेरे विचार से गाली हिंसा की भूमिका है। प्रत्येक समाज अपनी हिंसा को वैध ठहराने से पहले अपने शिकार का नैतिक अवमूल्यन करता है।

इतिहास के प्रत्येक बड़े नरसंहार से पहले भाषा बदलती है। लोग व्यक्तियों को नाम से नहीं, अपमानसूचक विशेषणों से पुकारना प्रारम्भ करते हैं। यह हिंसा की पूर्वपीठिका होती है। यानी गाली हिंसा का विकल्प नहीं, अनेक बार उसकी प्रस्तावना होती है। गाली संवाद को समाप्त नहीं करती; वह संवाद की संभावना को ही समाप्त कर देती है।

साहित्यकारों की मॉरल लाइसेंसिंग क्या है?

यह तो गाली देने वालों का मनोविज्ञान है। उन साहित्यकारों का मनोविज्ञान भी पढ़िए जो इन गालियों की Moral Licensing कर रहे हैं - यानी जो यह विश्वास कर लेते हैं कि उनके उद्देश्य इतने पवित्र हैं कि उनके लिए सामान्य नैतिक नियम लागू नहीं होते।

जब वे गालियों के इन क्षणों को अपवाद मानने के बजाय आदर्श या सामान्य घोषित करने लगते हैं, तब समस्या केवल भाषा की नहीं रहती; तब हमारी सामूहिक मनोसंरचना बदलने लगती है। साहित्यकार जब गाली को नैतिक वैधता देता है, तब वह समाज के सामूहिक विवेक का पुनर्लेखन कर रहा होता है। वह केवल यह नहीं कह रहा कि "गाली दी गई"; वह यह कह रहा है कि "गाली उचित थी।"

साहित्य का असली दायित्व क्या है?

ऐसे माहौल में साहित्यकार का दायित्व सबसे अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि साहित्य का संपूर्ण प्रयोजन मनुष्य को पुनः नाम देना है। उपन्यास, कविता, नाटक और कथा - ये सभी हमें याद दिलाते हैं कि प्रत्येक मनुष्य किसी विशेषण से बड़ा है।

साहित्य व्यक्ति को उसकी जटिलता लौटाता है; गाली उसे उसकी जटिलता से वंचित कर देती है। साहित्य कहता है - "उसे समझो।" गाली कहती है - "उसे समाप्त करो।" साहित्य व्यक्ति के भीतर की कहानी खोजता है; गाली व्यक्ति को कहानी बनने से पहले ही एक निर्णय में बदल देती है।

होना तो यह चाहिए था कि सभी साहित्यकार एक साथ एक संयुक्त ज्ञापन निकालते कि भाषा का सम्मान रखें, पर देखा यह गया कि कुछ स्वनामधन्य उसी को जस्टिफ़ाई करने में लग गए। वे साहित्य को हमेशा चार खेमे और चौंसठ खूँटों में बांटे रहे, तो यहाँ भी वे एक ingroup moral immunity की स्थिति से - अपने समूह को नैतिक छूट देने से - मुतमईन हैं।

प्रतीकात्मक दूरी का भ्रम क्या है?

यौन-आधारित गालियों के समर्थन में एक और सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया कार्य करती है - प्रतीकात्मक दूरी (Symbolic Distance)। साहित्यकार स्वयं गाली नहीं देता; वह कहता है कि "यह जनता का क्रोध है", "यह प्रतिरोध की भाषा है।"

इस प्रकार वह अपने और गाली के बीच एक बौद्धिक दूरी निर्मित कर लेता है, और स्वयं को अशिष्ट नहीं बल्कि अशिष्टता का व्याख्याकार समझने लगता है। किंतु सामाजिक प्रभाव की दृष्टि से यह दूरी बहुत कम मायने रखती है - सार्वजनिक संस्कृति यह संदेश ग्रहण करती है कि यदि प्रतिष्ठित लेखक इसे उचित कह रहा है, तो यह नैतिक रूप से स्वीकार्य है।

आधुनिक बौद्धिक संसार प्रायः लैंगिक समानता, स्त्री-अस्मिता और गरिमा की वकालत करता है। किंतु यदि वही बौद्धिक वर्ग ऐसी गालियों का समर्थन करे जिनकी संरचना स्त्री-देह, मातृत्व या पारिवारिक स्त्री-संबंधों को अपमान के औज़ार के रूप में प्रयोग करती है, तो वह अनजाने में उसी पितृसत्तात्मक भाषा को वैधता दे रहा होता है जिसकी वैचारिक आलोचना वह अन्यत्र करता है।

क्या उन्हें अहसास है कि वे शब्दों की सीमा नहीं बदल रहे हैं; वे समाज की नैतिक संवेदनशीलता की सीमा भी बदल दे रहे हैं?

गालियों में कौन-कौन से मनोवैज्ञानिक रिसाव छिपे हैं?

कुछ चीजें लीक कर रही हैं - उन ग्रंथियों के रिसाव को भी देखिए। कुछ लोगों के मनोविश्व में संचित कुंठाओं के discharges भी देखिए। जैसे किसी विद्युत-तंत्र में कहीं इन्सुलेशन कमज़ोर हो जाए तो ऊर्जा अपने नियत मार्ग से न जाकर रिसने लगती है, वैसे ही मनुष्य की चेतना में भी अनेक ऊर्जाएँ - कामना, क्रोध, अपमान, असुरक्षा, वर्चस्व की इच्छा, मान्यता की भूख - यदि पर्याप्त रूप से रूपांतरित (sublimated) न हों, तो वे भाषा में leaks के रूप में दिखाई देने लगती हैं। गाली तब केवल मुख से नहीं निकलती; वह व्यक्तित्व की दरारों से रिसती है।

सत्ता-कामना का रिसाव

यौन गालियों में कामेच्छा का discharge बहुत कम होता है; सत्ता-कामना का discharge कहीं अधिक होता है। यहाँ यौनता सुख का प्रतीक नहीं रहती; प्रभुत्व का प्रतीक बन जाती है। व्यक्ति मानो यह leak कर रहा होता है कि उसकी कल्पना में संबंधों का अंतिम व्याकरण समानता नहीं, अधीनता है।

सामान्यतः परिपक्व चेतना अपनी आक्रामक ऊर्जा को तर्क, व्यंग्य, सृजन, संगठन या कर्म में रूपांतरित कर देती है। जब यह रूपांतरण अधूरा रह जाता है, तब आक्रामकता भाषा में रिसने लगती है। यौन गाली उस असंसाधित आक्रामक ऊर्जा का discharge बन जाती है।

असुरक्षा और सांकेतिक दरिद्रता का रिसाव

जितना अधिक व्यक्ति अपनी गरिमा को भीतर से अनुभव करता है, उतनी ही कम उसे दूसरे की गरिमा नष्ट करने की आवश्यकता होती है। यौन गाली कई बार इस बात का रिसाव होती है कि आत्मविश्वास भीतर से नहीं आ रहा; इसलिए दूसरे के सम्मान को तोड़कर स्वयं को ऊँचा अनुभव करने की कोशिश की जा रही है।

भाषा जितनी समृद्ध होती है, प्रतिरोध के उसके साधन उतने ही विविध होते हैं - रूपक, विडंबना, व्यंग्य, श्लेष, मौन, संकेत। जब बार-बार अंतिम आश्रय यौन गाली बन जाती है, तब यह कई बार भाषिक कल्पनाशक्ति के impoverishment का discharge भी हो सकता है। मानो चेतना के पास क्रोध व्यक्त करने के लिए प्रतीकों का विशाल वन नहीं, केवल एक संकीर्ण गलियारा बचा हो। कितनी-कितनी leaks का पता उस एक चक्कर में चल गया है।

Disclaimer: "यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचार और वैचारिक विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य भाषा और साहित्य में नैतिकता पर सामान्य चर्चा करना है, न कि किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या राजनीतिक विचारधारा को लक्षित करना।
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