जेन-ज़ी की गालियों के पीछे छुपी राजनीति क्या है?
सुशोभित
जेन-ज़ी की गालियों को लेकर "प्रबुद्ध-समाज" द्वारा बहुत चिंताएं जताई जा रही हैं, जैसे कि समाज में इससे पहले गालियां थी ही नहीं, इन्हें जेन-ज़ी ने ही आविष्कृत किया है।
सच्चाई तो यह है कि समाज हमेशा से गालियों से भरा रहा है, अब तो केवल मवाद फूटा है। मंटो साहब कहते थे ना, "मैं समाज की चोली क्या उघाडूंगा, वह तो पहले से ही नंगा है!" गाली एक विचार नहीं है, वह एक भावाभिव्यक्ति है। कभी-कभार उसमें एक बददुआ ('कर्सिंग') भी होती है। लोग अलग-अलग कारणों से गालियां देते हैं।
श्रेष्ठता-बोध बनाम विद्रोह की गाली में फर्क क्या है?
कल्पना करें कि एक ऊंचे ओहदे पर बैठा आदमी है, जो अपने से नीचे ओहदे वाले आदमी को दुत्कारता है, हिकारत से गालियां देता है। तब उसकी गाली में श्रेष्ठता-बोध का रोग है।
वो जानता है कि वह छोटा आदमी (साहित्य का 'लघुमानव' / दोस्तोयेव्स्की का 'अंडरग्राउंड-मैन') असहाय है और उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। लेकिन एक दिन उस छोटे आदमी का धैर्य जवाब दे जाता है और वो किसी नतीजे की परवाह किए बिना उस ऊंचे ओहदे वाले सामंत को इससे भी भद्दी गाली देता है। तब इस गाली में प्रतिरोध है, विद्रोह है, बगावत है।
आप कहेंगे, भाषा की शुचिता नष्ट हो गई। मैं कहूंगा, व्यापक दमन और उत्पीड़न का प्रेशर-कुकर जब फटता है तो उस विस्फोट की ध्वनि सुमधुर और कर्णप्रिय नहीं होती! आप अपनी भाषाई-शुचिता का अचार डाल लीजिये, एक मनुष्य की कुचली जा रही अस्मिता का विद्रोह उससे ज्यादा मूल्यवान वस्तु है।
जेन-ज़ी की गालियों का राजनैतिक पक्ष क्या है?
इन अर्थों में जेन-ज़ी की गालियों (gen z protest) का एक राजनैतिक पक्ष था। उसमें निडरता थी और संघर्ष का माद्दा था। कोई भी ये नहीं कह रहा है कि यह पीढ़ी विचारवान या मूल्यों से समृद्ध है या इनकी भाषा का मुख्यधारा में उपयोग किया जाना चाहिए। लेकिन जिस बेखौफ अंदाज़ में उन्होंने सड़कों पर उतरकर सत्ता को चुनौती दी, उसने उन्हें एक 'पोलिटिकल कैपिटल' बनाया है और इसकी देश को जरूरत थी।
जमीनी आंदोलनों में धार होनी चाहिए, उसमें राजनयिक-शैली की 'पहले आप, पहले आप' वाली नफीस खतो-किताबत नहीं चलती।
दलित साहित्य में गाली प्रतिरोध की भंगिमा क्यों है?
ध्यान रहे कि दलित-साहित्य में गालियों का प्रयोग होता रहा है। तब वह 'साधुभाषा' के प्रति प्रतिरोध की एक भंगिमा है। मराठी साहित्यकार नामदेव ढसाळ की 1986 में प्रकाशित एक पुस्तक के शीर्षक में ही अपशब्द है। और 1999 में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया था।
एक सीमा के बाद संसदीय-असंसदीय भाषा का द्वैत मिट जाता है। सोशल-मीडिया तो अनफिल्टर्ड माध्यम है, इसमें चीजों को सेंसर नहीं किया जाता। पहले जिन शब्दों का मुख्यधारा के मीडिया में उपयोग नहीं किया जाता था, उन्हें सोशल-मीडिया ने प्रकट कर दिया है।
सिनेमा की गाली कब और कैसे बदली?
सिनेमा में भी पहले नायक को खलनायक पर गुस्सा आता था तो वो उसे 'झूठे', 'फरेबी', 'मक्कार' और बहुत ज्यादा हुआ तो 'कुत्ते', 'कमीने', 'हरामजादे' कह बैठता था।
प्रसंगवश, अकविता के दौर वाले एक हिन्दी कवि की एक कविता में 'आजादी' शब्द की तुक 'हरामजादी' से मिलाई गई है, तब उसने 1970 के दशक में बहुत हलचलें मचाई थीं। लेकिन आज के ओटीटी सिनेमा में वो ठेठ गालियां भी चली आई हैं, जो पहले फिल्मों में सुनाई नहीं देती थीं। पर समाज में तो वो हमेशा से मौजूद रही हैं, समय के साथ उन्होंने केवल अपना माध्यम बदला है।
मेरा निजी अनुभव: गाली और साहित्य के बीच का फर्क
मेरा तो पूरा जीवन ही गाली देने वाले लोगों के बीच में बीता। कानों में बचपन से ही गालियां गूंजती रहीं। ये गालियां देने वाले अधिकतर सफेदपोश और सवर्ण ही थे। मैं जो साहित्य रचता हूं, उसमें आपको कभी कोई अपशब्द नहीं दिखाई देगा, लेकिन वह 'मैं' हूं और 'मेरा साहित्य' है। दुनिया इस कुएं की मेंढक नहीं है।
क्या मैं वैसा साहित्य पढ़ना चाहूंगा, जिसमें गालियां हों? शायद नहीं। या अगर वह कृति किसी विशेष सामाजिक या राजनैतिक-परिप्रेक्ष्य को उजागर करती हो तो शायद हां भी। लेकिन देश और दिल्ली में जेन-ज़ी का आंदोलन साहित्य नहीं था, प्रतिरोध था। सड़क की भाषा और किताब की भाषा में अकसर फर्क होता है। अलबत्ता, मुक्तिबोध ने कहा था- 'पोस्टर ही कविता है!'
क्या गाली से किसी के व्यक्तित्व का अंदाजा लगाया जा सकता है?
वैसे गालियां बड़ी पेचीदा शै होती हैं, उनसे आप किसी के व्यक्तित्व का अंदाजा नहीं लगा सकते। हमारे विराट कोहली साहब खुलेआम गालियां बकते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में एक प्रेमल पति और एक बेटी के संवेदनशील पिता हैं।
दूसरी तरफ संस्कारी प्रजाति के प्राणी सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा गालियां बकते हैं जबकि उनकी डीपी में देवी-देवताओं के चित्र लगे होते हैं।
हां, शायद लड़कियों को वैसी गालियां देने से बचना चाहिए, जो स्त्री के ही यौन-प्रतीकों और अंग-विशेषों को अवमानित करती हों। कौन जाने, अगले प्रोटेस्ट तक जेन-ज़ी लड़कियां पुरुषों और उनके फर्जी-पुरुषत्व-बोध को चुनौती देने वाली कुछ नई गालियां ईजाद कर लें। क्यों नहीं?
गाली या भक्त- कौन सा विकल्प बेहतर है?
अगर नई पीढ़ी खुलेआम गालियां देगी तो क्या मुझे अच्छा लगेगा? नहीं लगेगा। लेकिन अगर वो दक्षिणपंथी राजनीति का मोहरा बन जाए तब मुझे और ज्यादा बुरा लगेगा।
और अगर वो वैसी राजनीति के विरोध में आन्दोलन करती है तो इससे मुझे खुशी ही होगी। क्योंकि गाली देना फिर भी बेहतर है, बनिस्बत इसके कि आप एक 'भक्त' बन जाएं!
जरूरी FAQs
जेन-जी की गालियों को लेखक ने राजनैतिक क्यों बताया है?
गाली दमन के विस्फोट की ध्वनि है। जेन-ज़ी ने बेखौफ होकर सत्ता को चुनौती दी, इसलिए उनकी भाषा को 'पोलिटिकल कैपिटल' कहा गया है।
दलित साहित्य में गालियों का इस्तेमाल क्यों होता रहा है?
दलित साहित्य में गाली 'साधुभाषा' के विरुद्ध प्रतिरोध की भंगिमा रही है। नामदेव ढसाळ जैसे साहित्यकारों ने इसे अपनी रचनाओं में प्रमुखता से इस्तेमाल किया।
क्या गाली देने से किसी व्यक्ति के चरित्र का पता चलता है?
नहीं। उदाहरण के तौर पर विराट कोहली सार्वजनिक रूप से गुस्सा दिखाते हैं, पर निजी जीवन में संवेदनशील माने जाते हैं।
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