राजनीति के आगे घुटने टेकती नौकरशाही, सिविल सेवा दिवस पर रिटायर्ड आईएएस उदय वर्मा ने दिखाया आईना
सिविल सेवा का स्टील फ्रेम जंग खा चुका है और हम उसे पॉलिश करके समारोह मना रहे हैं।
5 बड़े सच- बिना लाग-लपेट के
① ईमानदारी मर नहीं रही, वह सिस्टम द्वारा धीरे-धीरे दफनाई जा रही है
② नौकरशाह अब जनता के नहीं, कुर्सी के वफादार हैं
③ शासन अब सेवा नहीं, तमाशा बन गया है
④ नागरिक आज भी अधिकारी के दरबार में याचक बनकर खड़ा है
⑤ 2047 का विकसित भारत, इस सिविल सेवा से नहीं बनेगा, जब तक यह खुद न बदले
हर साल 21 अप्रैल को भारत की सिविल सेवाएं अपने कामों का उत्सव मनाती हैं। आधिकारिक तौर पर, पारंपरिक तरीके से और एक आश्वासन की भावना के साथ… इस दिन प्रशंसा की जाती है, नई पहलों की सराहना होती है और दक्षता की सफलता को मान्यता मिलती है।
यह एक महत्वपूर्ण रिवाज है, लेकिन जब ये रिवाज बिना आत्मनिरीक्षण के बार-बार किए जाते हैं तो ये केवल सांत्वना बन सकते हैं। अतः असल सवाल यह नहीं है कि इस दिन क्या मनाया जाता है, बल्कि महत्वपूर्ण है कि क्या बातों को अनकहा छोड़ दिया जाता है।
आज वह स्टील कहां है?
भारत के प्रशासनिक ढांचे का मुख्य हिस्सा भारतीय प्रशासनिक सेवा (Indian Administrative Service) है, जिसे एक समय "स्टील फ्रेम" कहा जाता था। यह शब्द तब महत्व रखता था जब यह न केवल सत्ता, बल्कि नैतिक मजबूती को भी दर्शाता था।
दबाव के खिलाफ टिके रहने की क्षमता, सत्ता से सच बोलने की शक्ति और एक उथल-पुथल वाले लोकतंत्र में स्थिरता का काम करने की योग्यता। आज, यह स्टील कुछ जगहों पर जंग लगने और मिश्रण होने की ओर बढ़ रहा है।
ईमानदारी का संकट सबसे बड़ा
सबसे चिंताजनक समस्या यह नहीं है कि दक्षता में कमी है या यह पुरानी हो गई है, बल्कि यह है कि ईमानदारी का क्षय हो रहा है। सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार नया नहीं है। लेकिन जो बदला है, वह है इसकी मात्रा, बेशर्मी, और कभी-कभी इसकी स्वीकार्यता।
जब अधिकारी, सीनियर और जूनियर, ऐसे फैसलों से जुड़े होते हैं जो नीतियों को विकृत करते हैं या सार्वजनिक संसाधनों को चुराते हैं तो यह केवल एक व्यक्तिगत विफलता नहीं होती, यह संस्थागत समझौते का संकेत देती है। असली खतरा गलत कामों से नहीं, बल्कि इस धारणा से है कि प्रणाली अब इसे सहन करना सीख गई है।
भरोसे का संकट सबसे बड़ा
इससे जुड़ा हुआ एक और गंभीर मुद्दा है नौकरशाही और राजनीतिक कार्यपालिका के बीच बढ़ता तनाव। एक स्वस्थ लोकतंत्र में, सिविल सेवक से अपेक्षा की जाती है कि वह उत्तरदायी हो।
कुछ अधिकारियों का झुकना, कभी-कभी विकृत होने तक नौकरशाही की तटस्थता और पेशेवर के विचार को कमजोर करता है। यह कोई विवाद की बात नहीं है, बल्कि सिद्धांत की बात है।
एक ऐसी व्यवस्था जो लचीलेपन को पुरस्कृत करती है और सिद्धांत को हाशिये पर डाल देती है, वह लंबे समय तक विश्वसनीयता नहीं बनाए रख सकती। और भी गहरे विकृतियां हैं।
नौकरशाही का घमंड भी एक समस्या
डिजिटल प्लेटफार्मों ने प्रशासन में प्रदर्शन को भी शामिल किया है। प्रशासन नाटक बनता जा रहा है। दिखावटीपन अब मूल्य के रूप में प्रकट होने लगा है। सार्वजनिक सेवा की श्रेष्ठ परंपराएं नियंत्रण, गुमनामी और सामूहिक स्वामित्व अब धीरे-धीरे एक अधिक व्यक्तिगत प्रदर्शन यानी शो बाजी में बदल रहे हैं।
इसके साथ ही नौकरशाही की घमंड भी एक समस्या है। नागरिक- केन्द्रित शासन की बातों के बावजूद, कई भारतीयों का अनुभव अब भी दूरी और विवेक से जुड़ा है। यह केवल एक मानसिकता की समस्या नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक भावना के आंतरिककरण की अधूरी प्रक्रिया को भी दर्शाता है।
तो कैसे पूरा होगा विकसित भारत का सपना
फिर भी, यदि केवल इन कमियों पर ध्यान दिया जाए, तो एक बड़ा मुद्दा छूट जाएगा। भारत ऐतिहासिक महत्वाकांक्षा के एक क्षण में खड़ा है। 2047 तक "विकसित भारत" का दृष्टिकोण केवल भाषण नहीं है, यह एक चुनौतीपूर्ण राष्ट्रीय परियोजना है। इसके लिए एक ऐसी सिविल सेवा की आवश्यकता है जो न केवल कार्यात्मक हो, बल्कि उदाहरण के रूप में हो, जो ईमानदारी को कल्पना, प्राधिकरण को सहानुभूति और दक्षता को नैतिक स्पष्टता के साथ जोड़ सके।
इसे ऐसे सिविल सेवकों (national civil services day) की आवश्यकता होगी जो जटिलता को समझ सके बिना अपनी विचारधारा को खोए पारदर्शिता और सशक्तिकरण के एक उपकरण के रूप में उपयोग कर सके।
आत्मनिरीक्षण की ओर बढ़ना होगा
सबसे ऊपर, इसे विश्वास की पुनर्स्थापना की आवश्यकता होगी। संस्थाएं अपनी ताकत केवल नियमों से नहीं, बल्कि इस विश्वास से प्राप्त करती हैं कि जो इन्हें संचालित करते हैं, वे एक बड़े उद्देश्य से मार्गदर्शित हैं। यह विश्वास, जो एक बार कमजोर हो जाता है, फिर से प्राप्त करना कठिन होता है। इसलिए, सिविल सेवा दिवस को बदलना होगा। इसे पुष्टि से आगे बढ़कर आत्मनिरीक्षण की ओर बढ़ना होगा और केवल पहचान से नवीकरण की ओर जाना होगा।
आखिरकार, एक सिविल सेवा की असली ताकत न केवल उसमें निहित शक्ति में, बल्कि उन सिद्धांतों में है जिन्हें वह छोड़ने से इंकार करती है।
(- उदय कुमार वर्मा मध्य प्रदेश कैडर के रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं। वे भारत सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्रालय में सचिव थे। बाद में केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण के सदस्य भी रहे हैं। यह लेख अंग्रेजी आर्टिकल का भावानुवाद है)
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