राजनीतिक फेरबदल से आगे बढ़कर शिक्षा सुधार पर ध्यान देना होगा
अगले सप्ताह संसद का सत्र शुरू होगा। वहां बहस होगी, हंगामा होगा और नए कानून बनेंगे। टीवी चैनलों पर राजनीतिक चर्चा चलेगी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या संसद उन मुद्दों पर ध्यान देगी जो देश के भविष्य से जुड़े हैं?
ऐसा ही एक मुद्दा पिछले कई दिनों से संसद के बाहर खड़ा है। मेरे पति सोनम वांगचुक, जो वैज्ञानिक, इंजीनियर, शिक्षक और समाज सुधारक हैं, शिक्षा सुधार की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। हर दिन उनका स्वास्थ्य गिर रहा है। उन्हें देखकर यही चिंता होती है कि उनका शरीर आखिर कब तक साथ देगा।
पूरे देश की जिम्मेदारी का सवाल
यह सिर्फ हमारे परिवार का मामला नहीं है। यह पूरे देश की जिम्मेदारी का सवाल है। जो लोग अहिंसक आंदोलन करते हैं, वे उम्मीद करते हैं कि उनका त्याग समाज और सरकार को सोचने पर मजबूर करेगा। अगर इस आंदोलन का नतीजा केवल शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक सीमित रहा, तो यह बहुत छोटी उपलब्धि होगी। मंत्री बदल सकते हैं, लेकिन शिक्षा व्यवस्था तभी बदलेगी जब पूरे सिस्टम में सुधार होगा। जरूरत ऐसी नीति की है, जिसके लिए हर सरकार और हर शिक्षा मंत्री जवाबदेह हो।
करीब 15 साल पहले भारत की आधी आबादी 25 साल से कम उम्र की थी। इसे देश का जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) कहा गया। मतलब देश के पास बड़ी युवा आबादी के रूप में विकास का शानदार मौका था।
भारत ने स्कूलों और कॉलेजों तक पहुंच तो बढ़ाई, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता नहीं बढ़ा पाया। अगर भारत को दुनिया में ज्ञान का नेतृत्व करना है, तो बच्चों को सिर्फ डिग्री नहीं, बेहतर शिक्षा देनी होगी। यही मौका अब तेजी से हाथ से निकलता दिख रहा है।
जनसांख्यिकीय लाभांश क्या है?
जब किसी देश में बड़ी संख्या में युवा आबादी होती है और उन्हें अच्छी शिक्षा, कौशल और रोजगार मिलता है, तो वही देश की सबसे बड़ी ताकत बनती है। इसे जनसांख्यिकीय लाभांश कहा जाता है।
अच्छी शिक्षा ही अच्छे वैज्ञानिक, शिक्षक, शोधकर्ता, उद्यमी, ईमानदार अधिकारी और जिम्मेदार नागरिक तैयार करती है। इसलिए शिक्षा को राजनीति से ऊपर रखकर देखने की जरूरत है। सोनम वांगचुक का आंदोलन सिर्फ किसी मंत्री के खिलाफ नहीं है। यह पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की मांग है।
शिक्षा सुधार के 10 बड़े सुझाव
परीक्षा प्रणाली बदले
आज ज्यादातर परीक्षाएं रटने पर आधारित हैं। इससे बच्चे सोचने की बजाय याद करने पर ध्यान देते हैं। स्कूल बोर्ड, जेईई, नीट, सीयूईटी और यूपीएससी जैसी परीक्षाओं में समझ, तर्क, रचनात्मक सोच और समस्या सुलझाने की क्षमता को महत्व मिलना चाहिए।
कोचिंग पर निर्भरता घटे
आज लाखों परिवार कोचिंग पर भारी खर्च करते हैं। इसकी वजह प्रवेश परीक्षाओं का तरीका है। अगर स्कूल की पढ़ाई और अलग-अलग मूल्यांकन को महत्व मिलेगा, तो कोचिंग पर निर्भरता कम होगी और बच्चों का बचपन भी बचेगा।
अच्छे शिक्षक तैयार हों
फिनलैंड, सिंगापुर, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की सफलता का बड़ा कारण अच्छे शिक्षक हैं। भारत को भी ऐसा राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू करना चाहिए, जिसमें शिक्षकों को बेहतर प्रशिक्षण, शोध और नेतृत्व के अवसर मिलें।
खाली पद जल्दी भरें
देश के कई स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के हजारों पद खाली हैं। इन पदों को पारदर्शी और योग्यता के आधार पर जल्द भरना चाहिए।
शिक्षा को समाज से जोड़ें
पढ़ाई सिर्फ नौकरी के लिए नहीं होनी चाहिए। हर छात्र को पढ़ाई के दौरान गांव, उद्योग, सामाजिक सेवा, शोध या उद्यमिता का अनुभव भी मिलना चाहिए।
सरकारी स्कूल मजबूत बनें
हर बच्चे को अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिए, चाहे वह किसी भी परिवार से हो। सरकारी स्कूलों में अच्छी प्रयोगशाला, पुस्तकालय, खेल मैदान, डिजिटल सुविधा और योग्य शिक्षक होने चाहिए।
संस्थानों को आजादी मिले
सरकार को शिक्षा के लक्ष्य तय करने चाहिए। लेकिन पढ़ाने का तरीका, शोध और पाठ्यक्रम तय करने की आजादी संस्थानों को मिलनी चाहिए।यही आजादी नवाचार को बढ़ाती है।
पारदर्शिता बढ़े
देश में ऐसा सार्वजनिक डैशबोर्ड होना चाहिए, जहां हर स्कूल और विश्वविद्यालय की गुणवत्ता, शिक्षक, शोध और अन्य जानकारी आसानी से देखी जा सके। इससे सुधार की प्रक्रिया तेज होगी।
शिक्षा पर ज्यादा खर्च हो
शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का कम से कम 6 प्रतिशत खर्च होना चाहिए। वहीं शोध पर कम से कम 2 प्रतिशत निवेश होना चाहिए।
सुधार लगातार जारी रहें
हर सरकार बदलने पर शिक्षा नीति नहीं बदलनी चाहिए। इसके लिए एक स्वतंत्र राष्ट्रीय शिक्षा सुधार आयोग बनाया जाना चाहिए, जो सुधारों की निगरानी करे और संसद को नियमित रिपोर्ट दे।
शिक्षा राजनीति से ऊपर हो
शिक्षा किसी एक पार्टी का मुद्दा नहीं है। हर सरकार ने कुछ अच्छे काम किए हैं, लेकिन कई समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। भारत को शिक्षा को राष्ट्रीय मिशन बनाना होगा। आज पहली कक्षा में दाखिला लेने वाले बच्चे का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम आज कैसी शिक्षा व्यवस्था तैयार करते हैं। इस समय सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि शिक्षा मंत्री कौन होगा। असल सवाल यह है कि क्या भारत अपने बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा व्यवस्था बनाने का साहस दिखाएगा।
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