तमसो मा ज्योतिर्गमय: स्त्री–पुरुष की संयुक्त सहभागिता से सभ्य समाज का पुनर्निर्माण

Pawan Modiya | May 03, 2026, 16:57 IST
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भारतीय समाज की मजबूती परिवार, संवाद और सांस्कृतिक मूल्यों में है। स्त्री-पुरुष प्रतिस्पर्धी नहीं, पूरक हैं। जीजाबाई से गार्गी तक, महिलाएं समाज की नींव रही हैं। आज संवाद टूटने से मानसिक संकट बढ़ रहा है।

“असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतं गमय” यह मंत्र केवल आध्यात्मिक प्रार्थना नहीं, बल्कि मानव जीवन के विकास की संपूर्ण प्रक्रिया का सार है। यह हमें असत्य से सत्य की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर और भय से मुक्ति की ओर ले जाने का आह्वान करता है। आधुनिक समाज की जटिल परिस्थितियों में इस मंत्र का संदेश और भी प्रासंगिक हो गया है, क्योंकि आज का मनुष्य सूचना से भर गया है, परंतु विवेक से खाली होता जा रहा है; आवाज़ों से घिरा है, परंतु संवाद से दूर है; चमक से मोहित है, परंतु चरित्र-निर्माण को भूल रहा है। इसी पृष्ठभूमि में स्त्री–पुरुष की संयुक्त भूमिका (भारतीय संदर्भ में) सभ्य समाज निर्माण की नींव बनती है।

परिवार से समाज तक: सहभागिता की खोई कड़ी

भारतीय समाज की सबसे बड़ी ऐतिहासिक ताकत परिवार, समुदाय और संस्कार-व्यवस्था रही है। लेकिन पिछले हजार वर्षों की उथल-पुथल—आक्रमणों, राजनीतिक विखंडन और औपनिवेशिक मानसिकता ने सामाजिक ढांचे को भीतर तक प्रभावित किया। लोग सुरक्षित रहने के लिए परिवार के दायरे में सिमट गए। स्त्री–पुरुष दोनों की सामाजिक सहभागिता घटती चली गई।
हालांकि परिवार मजबूत रहा, पर समाज की सामूहिक ऊर्जा कमजोर पड़ी। आज भी यही स्थिति अनेक क्षेत्रों में देखी जाती है परिवारों में संवाद मौजूद है, पर समाज में कमी है। घरों में संस्कार हैं, पर सार्वजनिक जीवन में आदर्श कम हो गए हैं। बच्चे घर में सीखते हैं पर बाहर जाते ही भ्रम और प्रतिस्पर्धा से घिर जाते हैं।
इसलिए सभ्य समाज के निर्माण की शुरुआत परिवार से ही संभव है, क्योंकि परिवार वही छोटा समाज है जहां हम संवाद करना, निर्णय लेना, साझा करना, सहयोग करना और मूल्यों को जीना सीखते हैं। परिवार में स्त्री और पुरुष दोनों अपनी भूमिकाओं से समाज के व्यापक चरित्र को आकार देते हैं।

आधुनिक संकट और उनके भारतीय समाधान

1. लव जिहाद—संवादहीनता और सांस्कृतिक दूरी का परिणाम

आज अनेक परिवार यह अनुभव कर रहे हैं कि बच्चों के जीवन में माता–पिता की भूमिका कम हो रही है और मोबाइल या सोशल मीडिया की भूमिका बढ़ रही है। जब भाषा, भूषा, भोजन, भजन और भ्रमण ये पांच सांस्कृतिक सूत्र टूट जाते हैं, तब बच्चों को मार्गदर्शन देने और उन्हें सुरक्षित रख पाने की क्षमता कमजोर पड़ती है।
समाधान स्पष्ट है:
• परिवार में प्रतिदिन खुला संवाद
• सांस्कृतिक जीवन-पद्धति की पुनर्स्थापना
• समुदाय-आधारित मार्गदर्शन और सहयोग
यह प्रतिबंध नहीं, बल्कि सुरक्षा और चरित्र-निर्माण का प्राकृतिक तरीका है।

2. लैंगिक असमानता—दृष्टि का भ्रम

भारतीय संस्कृति का मूल भाव है “मातृवत् परदारेषु” समस्त स्त्रियों में माता का आदर। स्त्री को सदैव ज्ञान, संवेदना, धैर्य और संतुलन की प्रतिमूर्ति माना गया है। यह दृष्टि किसी श्रेष्ठता या हीनता की नहीं, बल्कि पूरकता की दृष्टि है। यहाँ स्त्री का रूप देवत्व में भी प्रतिष्ठित है, सरस्वती—ज्ञान, लक्ष्मी—समृद्धि, दुर्गा—शक्ति। इसी परंपरा के आधार पर भारत ने न केवल गृहस्थ जीवन, बल्कि समाज की संपूर्ण संस्कृति का निर्माण किया। समस्या आधुनिकता से नहीं, उसकी अपूर्ण समझ से उत्पन्न हुई। सशक्तिकरण का अर्थ अधिकार की होड़ नहीं, बल्कि समान अवसर, सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान है।

3. साहसी और विवेकशील महिलाएं—समाज की आधारशिला

भारतीय इतिहास में अनेक महिलाओं ने समाज और राष्ट्र के निर्माण में अद्वितीय योगदान दिया। जीजाबाई ने छत्रपति शिवाजी का चरित्र, दृष्टि और राष्ट्रधर्म गढ़ा। अहिल्याबाई होल्कर ने समाज, कृषि, नगर-निर्माण और धर्मस्थलों को पुनर्जीवित किया। द्रौपदी ने राजधर्म का सबसे तीव्र प्रतिरोध और न्याय का स्वर दिया। गार्गी और मैत्रेयी ने भारतीय ज्ञान-परंपरा का वैचारिक विस्तार किया। ये उदाहरण बताते हैं कि भारत में स्त्री सीमित नहीं—असीमित क्षमता का प्रतीक रही है।

4. परिवार-निर्माण में महिला की मुख्य भूमिका

भारतीय घर में व्यवस्था, अनुशासन, परंपरा, आदर और वातावरण का निर्माण मुख्यतः महिला करती है। पुरुष कमाता है, पर घर को “घर” बनाने का काम महिला करती है। भारतीय गृह-व्यवस्था में हमेशा कहा गया है कि पुरुष अपनी आय स्त्री को सौंपे। यह अधिकार नहीं, बल्कि विश्वास और स्थिरता का स्तंभ है। स्त्री के बिना घर बिखर जाता है; स्त्री के नेतृत्व में घर संस्कारों की पाठशाला बन जाता है।

5. मानसिक तनाव, अकेलापन और संवाद का महत्व

आज आत्महत्या, अवसाद और मानसिक तनाव बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है परिवार के भीतर संवाद का टूटना। जहां बातचीत है, वहां समाधान है; जहां मौन है, वहीं समस्या और दूरी जन्म लेती है। मोबाइल ने मनुष्य को व्यस्त तो कर दिया है, पर एक-दूसरे से दूर भी कर दिया है। परिवार को चाहिए साझा भोजन, साझा समय, साझा निर्णय और स्पष्ट सीमाएं (No Unlimited Access), यही मानसिक स्वास्थ्य की सबसे सशक्त नींव है।

6. संस्कृति ही समाज का कवच है

सांस्कृतिक आक्रमणों से घबराने की आवश्यकता नहीं। जब तक समाज सोता है, तब तक बाहरी विमर्श सक्रिय रहता है। समाज जागता है तो विदेशी विमर्श स्वतः समाप्त हो जाता है। भारत का सांस्कृतिक बल उसकी सबसे बड़ी सामर्थ्य है—चाहे भाषा हो, गीत हो, त्योहार हो, परिवार हो या समुदाय।
इसीलिए Swami Vivekananda ने कहा था, “भारतीय महिला को उठाने में पुरुष बाधा न बने—वह स्वयं सक्षम है।”

स्त्री–पुरुष प्रतिस्पर्धी नहीं, पूरक हैं

सभ्य समाज निर्माण का मार्ग संघर्ष से नहीं, सहयोग से बनता है। स्त्री–पुरुष दो शक्तियां नहीं, बल्कि एक ही शक्ति के दो रूप हैं। जब दोनों कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं, तब परिवार सुरक्षित होता है, बच्चे संस्कारी होते हैं, समाज संतुलित होता है और राष्ट्र महान बनता है

आज आवश्यकता है परस्पर संवाद की, संस्कार की, संगठन की, सांस्कृतिक चेतना की, और कर्तव्य-केंद्रित नागरिकता की। यही “तमसो मा ज्योतिर्गमय” का आधुनिक अर्थ है हम स्वयं में प्रकाश बनें, प्रकाशित हो और समाज को भी प्रकाश की ओर, सन्मार्ग, सद्भाव की ओर मिलकर ले जाएं।

(कैलाश चंद्र : आरएसएस के मध्य क्षेत्र प्रचार प्रमुख हैं)

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