बोल हरि बोल: नाखूनों में राज, वीडियो में वार और एसोसिएशन लाचार! कुछ ऐसा ही है MP का हाल

Harish Divekar | Oct 25, 2026, 12:33 IST
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वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर का लोकप्रिय कॉलम बोल हरि बोल।
वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर का लोकप्रिय कॉलम बोल हरि बोल।

BHOPAL. मंत्रालय में फाइलें भले धीरे चलें, लेकिन गॉसिप एक्सप्रेस हमेशा ही सुपरफास्ट रहती है। कहीं नेल आर्ट की आड़ में मैडमों के राज खुल रहे हैं, तो कहीं छह महीने पुराने वीडियो की अचानक हुई री-लॉन्चिंग ने अफसरशाही से लेकर सरकार तक के माथे पर बल डाल दिए हैं।

उधर, आईएएस एसोसिएशन की ताकत पर भी सवाल हैं। अपने साथी के साथ अनहोनी हो जाए, तो आवाज उठाने में इतनी देर क्यों? भोपाल के गलियारों में इन दिनों सवाल भी चटपटे हैं और उनके जवाबों पर रहस्य की चादर भी मोटी है। कोई दूसरों के राज जानने में जुटा है, कोई वायरल वीडियो के पीछे की कहानी तलाश रहा है और कोई एसोसिएशन की पुरानी धमक याद कर रहा है। अब इन सबके बीच किसकी दुकान चमक रही है, किसकी कुर्सी डोल रही है और कौन अपनी जिम्मेदारी से बच रहा है? यही तो है इस हफ्ते का असली मसाला। तो आइए, वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम बोल हरि बोल (Bol Hari Bol) में खोलते हैं गॉसिप की पोटली… क्योंकि भोपाल में कहानी सिर्फ होती नहीं, सही वक्त पर सुनाई भी जाती है!

नेल आर्टिस्ट के पास मैडमों के राज!

भोपाल के हाई-प्रोफाइल नेल आर्टिस्ट की इन दिनों ब्यूरोक्रेसी के गलियारों में खूब डिमांड है। वजह सिर्फ उनके नेल डिजाइन नहीं, बल्कि उनके पास मौजूद किस्सों का खजाना भी है। आईएएस-आईपीएस अफसरों की मैडमों के बीच उनकी पूछ-परख कुछ ऐसी है कि नेल पॉलिश के शेड के साथ-साथ गॉसिप का मूड भी मैच कराया जाता है। बताते हैं कि साहब नेल पर कलाकारी करते-करते बातचीत का ऐसा जाल बुनते हैं कि सामने वाली मैडम कब अपनी सहेली, प्रतिद्वंद्वी या किसी दूसरी मैडम की कहानी खोलने लगती हैं, उन्हें खुद पता नहीं चलता।

आर्टिस्ट भी कम उस्ताद नहीं! एक मैडम का किस्सा दूसरी के सामने, और दूसरी का तीसरी के सामने। यानी नेल आर्ट के साथ फ्री में गॉसिप सर्विस! अब आलम यह है कि कुछ मैडम उन्हें नेल डिजाइन के बहाने बंगले पर बुलाती हैं। मकसद नाखूनों को खूबसूरत बनाना है या प्रतिद्वंद्वी की खबरों का नया पैकेज हासिल करना, यह तो वही जानें। लेकिन मंत्रालय से लेकर बंगलों तक चर्चा यही है कि इन जनाब के पास नेल कलर से ज्यादा लोगों के रंग-ढंग की जानकारी है।

बोल हरि बोल! यहां नाखूनों पर डिजाइन बनते हैं, लेकिन कहानियों में किरदार बदलते देर नहीं लगती। और गॉसिप की इस दुनिया में सबसे बड़ा सवाल यही है। नेल आर्टिस्ट आखिर किसका राजदार है और किसका राजदार बनने की तैयारी में है?

मध्यप्रदेश में प्रशासनिक उठापटक: दो आईएएस में ठनी, कलेक्टरी पर ब्रेक और मैडम की किरकिरी | Administrative Upheaval in Madhya Pradesh: Two IAS Officers Clash, Collectorates on Hold, and Madam's Embarrassment
बोल हरि बोल: दो आईएएस में ठनी, कुछ अफसरों की कलेक्टरी पर ब्रेक और इधर मैडम की हुई खूब किरकिरी
18 Oct 2026 ,
By Harish Divekar
BHOPAL. मध्यप्रदेश में जो हो जाए, सो कम ही मानिए। बात राजनीति की हो या प्रशासन की, यहां किस्से ऐसे-ऐसे होते हैं कि सुनकर आप भी हैरान रह जाएं। अब देखिए ना, मलाई के चक्कर में दो आईएएस अफसर आपस में भिड़ गए। उधर, सरकार ने कुछ अफसरों की कलेक्टरी पर ऐसा ब्रेक लगाया कि दोबारा जिले की कमान मिलना मुश्किल हो गया है।
BHOPAL. मध्यप्रदेश में जो हो जाए, सो कम ही मानिए। बात राजनीति की हो या प्रशासन की, यहां किस्से ऐसे-ऐसे होते हैं कि सुनकर आप भी हैरान रह जाएं। अब देखिए ना, मलाई के चक्कर में दो आईएएस अफसर आपस में भिड़ गए। उधर, सरकार ने कुछ अफसरों की कलेक्टरी पर ऐसा ब्रेक लगाया कि दोबारा जिले की कमान मिलना मुश्किल हो गया है।

एसीएस को कौन निपटाना चाहता है?

भोपाल की ब्यूरोक्रेसी में एक एसीएस का करीब छह महीने पुराना विभागीय बैठक का वीडियो अचानक चर्चा के केंद्र में आ गया। दिलचस्प यह है कि वीडियो करीब एक महीने पहले भी सोशल मीडिया के बाजार में उतारा गया था, लेकिन तब न मुख्यधारा के मीडिया ने खास तवज्जो दी और न ही सोशल मीडिया पर कोई बड़ी हलचल हुई।

फिर अचानक वही पुराना वीडियो पूरी प्लानिंग के साथ मैदान में उतरा। इस बार भोपाल से दिल्ली तक सोशल मीडिया के बड़े इन्फ्लुएंसर्स तक पहुंचाया गया और देखते ही देखते मीडिया की गाड़ी भी उसी ट्रैक पर दौड़ने लगी। अब सवाल वीडियो से ज्यादा उसकी टाइमिंग पर उठ रहे हैं। छह महीने पुरानी बैठक की रिकॉर्डिंग आखिर अब इतनी जरूरी क्यों हो गई? पहले प्रयास पर शोर नहीं हुआ तो दूसरी बार इसे बड़े मंचों तक पहुंचाने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या यह महज संयोग है या किसी की सोची-समझी रणनीति?

वीडियो से एसीएस साहब की मुश्किलें बढ़ीं, लेकिन चर्चा यह भी है कि इस पूरे घटनाक्रम में सरकार की किरकिरी कहीं ज्यादा हुई। डैमेज कंट्रोल के लिए मंत्री की तरफ देखा गया, मगर वहां से चुप्पी मिली। फिर आनन-फानन में राज्य मंत्री को आगे लाने की कवायद हुई। अब मंत्रालय के गलियारों में सवाल घूम रहा है कि आखिर इस पूरे एपिसोड का पटकथा लेखक कौन है? वीडियो पुराना था, लेकिन उसकी नई रिलीज ने कई नए सवाल खड़े कर दिए।

बोल हरि बोल! ब्यूरोक्रेसी में फाइलें अक्सर सही समय पर खुलती हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर वीडियो कब खुलना है, इसका कैलेंडर कौन तय करता है? यह पहेली फिलहाल बरकरार है। और एसीएस साहब के मामले में चर्चा इसी बात की है कि निशाना सिर्फ अफसर था या संदेश किसी और के लिए भी था?

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बोल हरि बोल: दिल्ली वाले साहब की प्रदेश में घुसपैठ, कमिश्नर साहब की बल्लेबाजी और सूबे के पुराने सरदार की सियासत?
04 Oct 2026 ,
By Harish Divekar
BHOPAL. मध्य प्रदेश... यहां के किस्से-कहानियां निराले होते हैं। अब देखिए न... 18 साल तक प्रदेश की सियासत के सरदार रहे मामा के लिए अब अपने ही इलाके से चिंता की खबरें आ रही हैं। उनकी कोई सुन ही नहीं रहा। सिस्टम की बात करें तो यहां से खबर है कि अब कड़वे दिनों में ही कुछ कलेक्टरों की कुर्सी हिलने वाली है।
BHOPAL. मध्य प्रदेश... यहां के किस्से-कहानियां निराले होते हैं। अब देखिए न... 18 साल तक प्रदेश की सियासत के सरदार रहे मामा के लिए अब अपने ही इलाके से चिंता की खबरें आ रही हैं। उनकी कोई सुन ही नहीं रहा। सिस्टम की बात करें तो यहां से खबर है कि अब कड़वे दिनों में ही कुछ कलेक्टरों की कुर्सी हिलने वाली है।

आईएएस एसोसिएशन की नींद किसने खोली?

आईएएस एसोसिएशन कभी प्रशासनिक बिरादरी की सबसे मजबूत आवाजों में गिना जाता था। उसके विरोध का मतलब होता था कि सरकार को भी अपने फैसलों पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है। लेकिन अब इसी एसोसिएशन की सक्रियता और प्रभाव को लेकर सवाल उठने लगे हैं। रिटायर्ड आईएएस राकेश अग्रवाल की हत्या के मामले में पुलिस जांच की रफ्तार पर सवाल उठे। इसी बीच रिटायर्ड आईएएस राजीव गौबा ने एसोसिएशन की भूमिका पर नाराजगी जताई।

अग्रवाल उनके बैचमेट रहे हैं और गौबा केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं। उनकी नाराजगी का संदेश साफ था। जब अपने ही साथी की हत्या हो गई, तो जांच को लेकर संगठन की आवाज इतनी कमजोर क्यों है? इसके बाद एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की और मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित कराने की पहल हुई। घटनाक्रम के बाद चर्चा इस बात पर भी होने लगी कि संगठन को सक्रिय होने के लिए आखिर इतनी देर क्यों लगी? क्या दिल्ली से आई एक नाराजगी ने भोपाल में संगठन को उसकी जिम्मेदारी याद दिलाई?

यदि यह सवाल उठ रहा है, तो उसके पीछे वजह भी है। कभी जिस एसोसिएशन की एकजुटता सरकार के लिए दबाव का कारण बनती थी, आज उसी की सक्रियता को लेकर सवाल पूछे जा रहे हैं। नए आईएएस अधिकारियों के बीच भी संगठन की भूमिका और अपने पेशेवर हितों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं चर्चा का विषय हैं। हालांकि, इन चिंताओं का आकलन अलग-अलग घटनाओं के संदर्भ में ही किया जाना चाहिए।

बोल हरि बोल! एसोसिएशन की ताकत सिर्फ उसके पदाधिकारियों की सूची से नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त में उठने वाली आवाज से मापी जाती है। सवाल यही है। क्या संगठन अब भी अपने साथियों की ढाल है, या ढाल उठाने के लिए भी किसी बड़े नाम के फोन का इंतजार करना पड़ता है?

मंत्रालय की फुसफुसाहट हो, बंगलों की गॉसिप या सोशल मीडिया पर अचानक वायरल होती पुरानी फाइल- भोपाल के गलियारों में कहानियों की कमी नहीं। बस, हर कहानी में सच, चर्चा और अटकल के बीच की लकीर पहचानना जरूरी है। बोल हरि बोल… अगले हफ्ते फिर मिलेंगे, एक नई चर्चा और कुछ नए सवालों के साथ!

वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के कॉलम बोल हरि बोल
बोल हरि बोल: कलेक्टर बन गए तहसीलदार, 1200 करोड़ के टेंडर पर खींचतान और वो नाराज फूफा जी...!
27 Sept 2026 ,
By Harish Divekar
मध्य प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी और सियासत में इन दिनों कई चर्चाएं तेज हैं। जमीन नामांतरण, भोपाल मास्टर प्लान और 1200 करोड़ के टेंडर को लेकर अंदरखाने हलचल है। जानिए वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के साथ बोल हरि बोल के जरिए प्रशासनिक गलियारों की रोचक बातें।
मध्य प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी और सियासत में इन दिनों कई चर्चाएं तेज हैं। जमीन नामांतरण, भोपाल मास्टर प्लान और 1200 करोड़ के टेंडर को लेकर अंदरखाने हलचल है। जानिए वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के साथ बोल हरि बोल के जरिए प्रशासनिक गलियारों की रोचक बातें।

दशहरे पर राम की विदाई, पुरस्कार की मलाई!

जबलपुर से भोपाल नगर निगम कमिश्नर बनकर आना वैसे तो प्रमोशन जैसा ही माना जाता है, लेकिन इस बार मामला कुछ उल्टा है। भोपाल की कुर्सी मिलने के बावजूद साहब का मन जबलपुर में ही अटका हुआ है। वजह भी जायज है। जबलपुर को स्वच्छता अभियान में अवार्ड दिलाने के लिए उन्होंने दिन-रात एक कर दिया था। शहर को चमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन अवार्ड की घोषणा से पहले ही उनका तबादला हो गया। यानी मेहनत अपनी, नतीजा आने की उम्मीद अपनी और सम्मान समारोह में तालियां बटोरने की बारी किसी और की!

कमिश्नर साहब को पूरा भरोसा है कि इस बार जबलपुर टॉप रैंकिंग में जगह बना सकता है। मुश्किल बस इतनी है कि अगर अवार्ड मिल गया तो उसका सेहरा किसके सिर बंधेगा? पसीना किसी और का, फोटो किसी और का और वाहवाही किसी तीसरे की। सरकारी सिस्टम में इससे बड़ा टीमवर्क भला क्या होगा!

वैसे जबलपुर में साहब की लोकप्रियता भी इन दिनों अच्छी-खासी हो गई थी। शहर को साफ-सुथरा बनाने की मुहिम ने उन्हें जनता के बीच पहचान दिला दी थी। लेकिन तभी तबादले का फरमान आ गया। साहब भोपाल पहुंच गए और जबलपुर में उनके काम का रिजल्ट आने का इंतजार शुरू हो गया। अब देखना यह है कि स्वच्छता के अवार्ड के साथ किसकी किस्मत चमकती है और किसके हिस्से में सिर्फ मेहनत की यादें आती हैं। उधर, साहब की विदाई पर सियासी रामायण भी शुरू हो गई।

बीजेपी विधायक जी ने अपने एक्स हैंडल पर पोस्ट ठोक दी। दशहरे पर राम की विदाई। बस फिर क्या था! विधायक जी ने भावनाओं में बहकर रामायण का ऐसा प्रसंग छेड़ा कि सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का रावण खड़ा हो गया। लोगों ने सवालों और तंज के तीर चलाने शुरू किए तो विधायक जी को अपनी पोस्ट ही सबसे बड़ी लंका नजर आने लगी। आखिरकार पोस्ट डिलीट करनी पड़ी। यानी पहले राम की विदाई का ऐलान, फिर खुद ही पोस्ट का विसर्जन! अब सवाल यह है कि कमिश्नर साहब जबलपुर से भोपाल चले गए, विधायक जी की पोस्ट भी चली गई, लेकिन अगर जबलपुर को स्वच्छता का अवार्ड मिल गया तो उसका श्रेय आखिर किसके खाते में जाएगा?

कहानी का सार बस इतना है। राम तो वनवास चले गए, लेकिन स्वच्छता के अवार्ड का राजतिलक किसका होगा, यह अभी बाकी है!
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