बोल हरि बोल : भाभी जी...भाभी सा और भाभी मां...भैया, भाईसाहब और साहब टेंशन में

एक नेताजी की पत्नी इन दिनों सोशल मीडिया पर 'बहकी-बहकी' पोस्ट कर रही हैं। दरअसल, इनके बहाने वे अपने पति देव को यह बताना चाहती हैं कि पद का अहंकार न करें, वरना परिवार से हाथ धो बैठेंगे।

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Pratibha ranaa
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बोल हरि बोल

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हरीश दिवेकर, BHOPAL. राजनीति वीरस्य भूषणं...सोशल मीडिया पर ये लाइन खूब वायरल है। क्या राजनीति 'वीरों' को ही सुशोभित होती है? कैसे वीर? अब यूं तो इसके दोनों जवाब हैं हां और न भी। सात फेरे और सात वचनों के साथ सियासत को संभालना कैलाश चढ़ने से भी मुश्किल होता है जनाब! 

अब देखिए न, लोकसभा चुनाव की इस बेला में कुछ नेता धर्म संकट में हैं। संकट ऐसा कि पत्नी धर्म निभाएं या पार्टी धर्म...? एक नेताजी के मामले में भाभी जी भयंकर गुस्सा हैं। दूसरे मामले में भाभी से तनिक भाईसाहब परेशान हैं और तीसरे में 'मां' से बेटा दु:खी। अब साहब क्या करें? श्रीमती जी को साथ न रखें तो वो नाराज और रखें तो बेटा जी गुस्सा हो जाते हैं। 

राजनीति तो बरसों-बरस चलती रहेगी, परिवार में टूट आ गई तो मुश्किलात आएगी। इसलिए सामंजस्य बनाओ, ताकि राजनीति भी चलती रहे और परिवार भी।

देश-प्रदेश में बहुत कुछ घट रहा है। पंत प्रधान हर दिन देश नाप रहे हैं। युवराज भी पीछे नहीं हैं। आप तो सीधे नीचे उतर आईए और बोल हरि बोल के रोचक किस्सों का आनंद लीजिए।

भाईसाहब तो भाभी को मना लेंगे...

एक नेताजी की पत्नी इन दिनों सोशल मीडिया पर 'बहकी-बहकी' पोस्ट कर रही हैं। दरअसल, इनके बहाने वे अपने पति देव को यह बताना चाहती हैं कि पद का अहंकार न करें, वरना परिवार से हाथ धो बैठेंगे। यहां तक कि भाभी जी दूसरे नेताओं की पत्नी के साथ बॉन्डिंग की तस्वीरें भी पोस्ट कर रही हैं। खबर है कि भाईसाहब अपने चुनाव में इतने व्यस्त हैं कि बात बिगड़ चुकी है। आपको बता दें कि भाईसाहब सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े नेता हैं। कभी सीएम पद के लिए भी इनका नाम दौड़ा था। अब ऐसी विकट स्थिति में हमारी तो भाईसाहब को यही सलाह है कि सियासत के साथ सात वचनों का भी मान रखिए, वरना फिर कहीं देर न हो जाए आते-आते। बोल हरि बोल...

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भैया अच्छे हैं, भाभी भड़क जाती हैं!

दूसरा किस्सा भी भाभी जी से ही जुड़ा है। ये तनिक अलहदा है। क्या है कि भाईसाहब चुनाव लड़ रहे हैं। उनकी सेहत और अंदरूनी सियासत का ध्यान रखने के लिए कई बार भाभी जी भी क्षेत्र में प्रचार के लिए निकल पड़ती हैं। भाभी जी से कारकेड में चलने वाला स्टाफ कई बार परेशान हो जाता है। 'द सूत्र' को कारकेड के एक कर्मचारी ने पूरी कहानी बताई है। क्या है कि भाभी छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाती हैं। स्टाफ पर भड़क पड़ती हैं। हालांकि कर्मचारी की सहृदयता भी देखिए। जब उससे पूछा कि क्या साहब भी गुस्सा होते हैं, तो उसका जवाब था कि साहब सबका ध्यान रखते हैं। वे कभी किसी को बेवजह डांट फटकार नहीं लगाते। राजनीति उनके लिए वाकई 'जनसेवा' का जरिया है। और भाभी...अब भाभी की तो मत ही पूछिए। कभी ठंडे-गरम पानी पर गुस्सा हो जाती हैं तो कभी किसी और बात पर। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भाभी स्टाफ से जो चाहें कहें, लेकिन भाभी से उनकी बॉन्डिंग शानदार है। अधिक जानकारी के लिए हमें फोन करें...। 

भाभी सा, साहब और युवराज 

अब पढ़िए भाभी सा से जुड़ा तीसरा किस्सा...। क्या है कि राज परिवार से ताल्लुक रखने वाले एक साहब एक दिन अपनी श्रीमती जी को प्रचार के लिए साथ ले गए। इससे उनके युवराज नाराज हो गए हैं। युवराज का कहना था कि 'मां' को साथ मत ले जाइए, लेकिन साहब नहीं माने। चुनाव के ऐन वक्त पर परिवार में कलह हो गई है। साहब के सामने मजबूरी वही सात वचन निभाने की है। अब श्रीमती जी को साथ न ले जाएं तो वे गुस्सा और साथ ले जाएं तो युवराज खफा। क्या ही करें साहब...! मामला पेचीदा हो गया है। आपको बता दें कि साहब जहां से चुनाव लड़ रहे हैं, वहां कड़ी टक्कर देखने को मिल रही है। ये अपने बयानों से भी आए दिन चर्चा में रहते हैं। एमपी में तमाम बड़े पदों पर रहे हैं। हमने तो अपना काम कर दिया है। आपके पास कोई सुझाव हो तो भेज दीजिए, ताकि सबकी बॉन्डिंग फिर अच्छी हो जाए। 

...तो अफसरों के यार्ड में बैठे होते साहब!

​अब आते हैं अफसरशाही पर। तो क्या है कि डॉक्टर साहब इन दिनों एक कलेक्टर साहब से बड़े खफा हैं। मामला भोपाल से ग्वालियर के बीच पड़ने वाले एक बड़े जिले का है। यहां कलेक्टर साहब आदिवासियों की जमीन पर खेल कर रहे हैं। जमकर मलाई मिल रही है। अब कोई ऐसी बल्लेबाजी करे और थर्ड अंपायर को पता न चले, ऐसा कैसे हो सकता है। डॉक्टर साहब को मामले की पूरी खबर है। उन्होंने कलेक्टर साहब पर बड़ी कार्रवाई करने का मन बना लिया है, बस अभी चुनाव के चक्कर में वे कोई रिस्क नहीं लेना चाहते हैं। वरना तो कलेक्टर साहब अब तक अफसरों के यार्ड कहे जाने वाले मंत्रालय में बिना पद के उपसचिव बने बैठे होते। 

जीते कोई, हारे कोई...खर्चा अध्यक्षों का!

ये चुनाव क्या—क्या दिखाएगा। किसके सपने तोड़ेगा, किसे ताज पहनाएगा, ये तो 4 जून को ही पता चलेगा। फिलहाल तो जिलों के पदाधिका​री बड़े परेशान हैं। क्या है कि चुनाव में खड़े उम्मीदवार जेब से पैसा खर्च नहीं कर रहे हैं। बीजेपी में ऐसा है कि यहां कई उम्मीदवारों को पता है कि वे जीत रहे हैं, इसलिए जेब ढीली नहीं कर रहे। उधर, कांग्रेस में कई प्रत्याशियों को पहले ही अपनी हार नजर आ रही है, लिहाजा...वे भी अपनी जमा पूंजी नहीं मिटाना चाहते। यही वजह है कि जिला और मंडल स्तर के पदाधिकारियों को स्वागत सत्कार में अपनी जेब से रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। 

धरती पकड़ नेताजी

ये किस्सा एक धरती पकड़ नेताजी का है। अब धरती पकड़ कैसे...? रामप्रकाश राजौरिया की हम बात कर रहे हैं। मुरैना से आते हैं ये। 17 साल में राजौरिया जी चार बार पार्टी छोड़ और ज्वाइन कर चुके हैं। अभी कांग्रेस में थे, चुनाव से ऐन पहले बहन जी की बीएसपी में चले गए हैं। इन्होंने बीएसपी से ही अपनी राजनीतिक गाड़ी शुरू की थी। 17 बरस अलग—अलग पार्टियों से जुड़े रहे। अब इनके समर्थक और जलने वाले दोनों कह रहे हैं कि 'सुबह का भूला, शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं रामप्रकाश कहते हैं...।'  

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