IceBoost v2.0 का कमाल: एआई ने सुलझाया ग्लेशियरों का रहस्य, जानें क्या है मॉडल

Manya Jain | Aug 09, 2026, 11:29 IST
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ai model iceboost glacier ice mapping
ai model iceboost glacier ice mapping

इटली के रिसर्चर्स ने IceBoost v2.0 नाम का AI मॉडल बनाया है। इसने दुनिया के ग्लेशियरों की बर्फ का सबसे सटीक नक्शा तैयार किया है। यह डेटा 2100 तक के अनुमान का आधार बनेगा।

समझें क्या है पूरा मामला

दुनिया के ग्लेशियरों में कहां और कितनी बर्फ जमा है, यह सवाल दशकों से वैज्ञानिकों को उलझाए हुए था। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने इस मुश्किल काम को आसान बना दिया है। इटली के रिसर्चर्स ने IceBoost v2.0 नाम का एक नया AI मॉडल तैयार किया है। इस मॉडल ने दुनियाभर के ग्लेशियरों की मोटाई और कुल आयतन का अब तक का सबसे सटीक नक्शा बनाया है। वैज्ञानिक अब अगले 74 साल तक इसी डेटा को आधार मानकर ग्लेशियरों के भविष्य का अनुमान लगाएंगे।

यह उपलब्धि वेनिस की का' फोस्करी यूनिवर्सिटी और इटली की नेशनल रिसर्च काउंसिल के रिसर्चर्स ने मिलकर हासिल की है। रिसर्चर्स के मुताबिक एआई ने जो डेटा तैयार किया है, वह अब तक का सबसे भरोसेमंद डेटा माना जा रहा है।

AI ने यह काम कैसे किया

रिसर्चर्स ने पारंपरिक फिजिक्स आधारित मॉडल बनाने की बजाय एक अलग रास्ता अपनाया। उन्होंने AI मॉडल को सीधे असली डेटा से सीखने के लिए ट्रेन किया। इसके लिए IceBoost v2.0 को दुनियाभर के ग्लेशियरों की मोटाई के 70 लाख से ज्यादा मापों पर प्रशिक्षित किया गया।

इस मॉडल ने जमीन की ढलान, बनावट, बर्फ की गति और तापमान जैसे 26 अलग-अलग मानकों को मिलाकर हर ग्लेशियर की मोटाई का अंदाजा लगाया। दावा किया जा रहा है कि यह मॉडल पुराने तरीकों की तुलना में 40 प्रतिशत से ज्यादा बेहतर नतीजे दे रहा है।

क्या निकलकर आई अहम जानकारी

AI मॉडल से पता चला है कि अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की मुख्य बर्फ की चादरों को छोड़कर दुनिया के बाकी ग्लेशियरों में करीब 1.5 लाख क्यूबिक किलोमीटर बर्फ जमा है। अगर ये सभी ग्लेशियर पूरी तरह पिघल जाएं, तो दुनियाभर में समुद्र का जलस्तर करीब 32.3 सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है।

पूर्वी ग्रीनलैंड के 'गीकी पठार' में भी चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। यहां ग्लेशियर करीब 2 किलोमीटर तक मोटे हैं। AI मॉडल के मुताबिक यहां पहले के अनुमानों से करीब दोगुनी बर्फ मौजूद है।

इस खोज से क्या फायदा होगा

भौतिकी के पारंपरिक नियमों के आधार पर ग्लेशियरों को मापना काफी मुश्किल काम है, क्योंकि ग्लेशियर सिस्टम बेहद जटिल होते हैं। वहीं AI मॉडल सीधे डेटा पर प्रशिक्षित होता है, जिससे यह काम आसान हो गया है।

संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन संस्था IPCC (Intergovernmental Panel on Climate Change) ने भी इस खोज को समर्थन दिया है। वैज्ञानिक अब साल 2100 तक ग्लेशियरों के भविष्य का अनुमान लगाने के लिए इसी AI डेटासेट को आधार के रूप में इस्तेमाल करेंगे। दुनियाभर में पीने के पानी का संकट बढ़ रहा है। ऐसे में यह मॉडल सूखाग्रस्त इलाकों में भविष्य में साफ पानी की उपलब्धता का अंदाजा लगाने में भी मदद करेगा।

नाजुक इलाकों पर भी नजर

इस AI मॉडल ने उन क्षेत्रों का भी डेटा जुटाया है, जो पर्यावरण के लिहाज से बेहद नाजुक माने जाते हैं। इनमें हिमालय, काराकोरम और पैटागोनिया के बर्फ के मैदान शामिल हैं।

इन इलाकों की सटीक जानकारी मिलने से आगे चलकर जलवायु परिवर्तन के असर को समझना आसान होगा। खासतौर पर हिमालय क्षेत्र से जुड़ी जानकारी भारत और पड़ोसी देशों के लिए भी अहम मानी जा रही है।

आम लोगों के लिए भी वेब ऐप

रिसर्चर्स ने सिर्फ वैज्ञानिकों तक ही यह जानकारी सीमित नहीं रखी है। उन्होंने आम लोगों के लिए भी एक वेब ऐप लॉन्च किया है, जिसका नाम IceBoost WebApp है।

इस वेब ऐप पर कोई भी व्यक्ति दुनिया के किसी भी ग्लेशियर की बर्फ की स्थिति देख सकता है। यह पहल आम लोगों को जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दों को बेहतर समझने में मदद करेगी।

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