AI और डॉग्स मिलकर करेंगे कैंसर की पहचान, मेडिकल साइंस में भारत की बड़ी खोज
Kaushiki | Sept 07, 2026, 17:06 IST
बेंगलुरु का स्टार्टअप डॉग्नोसिस एआई और कुत्तों की मदद से कैंसर की शुरुआती जांच कर रहा है। मरीज के सांस का सैंपल लेकर कुत्ते बीमारी की पहचान करते हैं। रिसर्च में 90 प्रतिशत से ज्यादा सटीकता देखी गई है, जो बेहद किफायती है।
Can Dogs Sniff Cancer: कैंसर एक बहुत ही गंभीर बीमारी है। भारत में हर साल लाखों लोग इसकी चपेट में आते हैं। सही समय पर बीमारी का पता न चलना सबसे बड़ी समस्या है। इसी गंभीर समस्या का समाधान ढूंढने के लिए एक नया प्रयोग शुरू हुआ है।
बेंगलुरु की एक बायोटेक कंपनी अब कुत्तों की मदद ले रही है। कुत्तों के सूंघने की क्षमता बहुत ही कमाल की होती है। उनके नाक में करोड़ों स्मेल रिसेप्टर्स (Smell receptors) पाए जाते हैं। इंसानों की तुलना में वे कई गुना ज्यादा बेहतर सूंघ सकते हैं।
इस स्टार्टअप का नाम डॉग्नोसिस है। वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी का भी यूज कर रहे हैं। एआई की मदद से कुत्तों की बॉडी लैंग्वेज समझी जाती है। ये एटेम्पट भारत में कैंसर की शुरुआती जांच को आसान बनाएगा। आइए इस पूरी रिसर्च और टेक्नोलॉजी के बारे में डिटेल से समझते हैं।
बीमार होने पर इंसानी शरीर में कई तरह के केमिकल बदलाव होते हैं। इन बदलावों की वजह से सांस और पसीने में गंध बदल जाती है। इंसान इस बहुत मामूली गंध को बिल्कुल महसूस नहीं कर पाते हैं। लेकिन ट्रेंड कुत्ते इस बारीक अंतर को तुरंत पकड़ लेते हैं।
कुत्तों को लैब में खास तरह की ट्रेनिंग दी जाती है। जब वे सही सैंपल चुनते हैं, तो उन्हें इनाम मिलता है। इस काम के लिए लैब में स्पेशल प्लेटफॉर्म बनाए गए हैं।
वहां सैंपल सूंघते ही मशीन कुत्ते को खाने की चीज देती है। एआई सेंसर कुत्तों की सांस और दिमाग की गतिविधि पर नजर रखते हैं। इससे जांच का रिजल्ट बिल्कुल सटीक और भरोसेमंद आता है।
इस जांच का तरीका एकदम सुरक्षित रखा गया है। मरीज को किसी भी कुत्ते के सामने सीधे नहीं जाना पड़ता। मरीज को केवल दस मिनट तक एक मास्क में सांस लेनी होती है। इसके बाद मास्क को अच्छे से सील कर दिया जाता है।
फिर उस सील मास्क को जांच के लिए सीधे लैब भेजा जाता है। लैब में ट्रेंड कुत्ते उस सैंपल की बारीकी से जांच करते हैं। एक घंटे में एक ट्रेनड कुत्ता हजारों सैंपल सूंघ सकता है।
इससे बड़े पैमाने पर मरीजों की स्क्रीनिंग संभव हो सकेगी। इस पूरी प्रक्रिया में मरीज को कोई दर्द या तकलीफ नहीं होती। ये तरीका ट्रेडिशनल इन्वेस्टीगेशन से बहुत आसान और अलग है।
डॉग्नोसिस ने कर्नाटक के छह बड़े अस्पतालों के साथ मिलकर रिसर्च की। इस स्टडी में 15 सौ से अधिक लोगों ने भाग लिया था। इस रिसर्च के रिजल्ट बेहद शॉकिंग और पॉजिटिव रहे हैं।
टेस्ट में 90% से ज्यादा सही परिणाम मिले हैं। ये रिसर्च सात अलग-अलग मेजर कैंसर पर किया गया था। इस रिपोर्ट को मेडिकल जर्नल में भी जगह मिली है। हालांकि, इंडिपेंडेंट कैंसर स्पेशलिस्ट्स ने अभी थोड़ी सावधानी बरतने की सलाह दी है।
उनका कहना है कि बड़े समूह पर टेस्ट जरूरी है। समय के साथ ही पता चलेगा कि यह तकनीक कितनी मददगार होगी। लेकिन शुरुआती नतीजे काफी उम्मीद जगाते हैं।
भारत में कैंसर के मामलों का पता काफी देर से चलता है। ज्यादातर लोग बीमारी के तीसरे या चौथे स्टेज में डॉक्टर के पास जाते हैं। समय पर बीमारी न पकड़े जाने से इलाज बहुत मुश्किल हो जाता है।
शुरुआती जांच की सुविधाएं काफी महंगी और सीमित हैं। ऐसे में कुत्तों से सूंघकर जांच करने वाला तरीका सस्ता पड़ सकता है। इसे गांव और दूर-दराज के इलाकों में भी इस्तेमाल कर सकते हैं। यह तकनीक सामान्य लोगों के लिए काफी ज्यादा किफायती साबित होगी।
कम खर्च में ज्यादा से ज्यादा लोगों की कैंसर का इलाज संभव हो सकेगा। कंपनी को उम्मीद है कि अगले साल तक कमर्शियल मंजूरी मिल जाएगी। इससे भारत में कैंसर इलाज की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।
डॉग्नोसिस में अभी कुल 15 कुत्तों को ट्रेनिंग दी जा रही है। इनमें बीगल, लेब्राडोर और शेफर्ड नस्ल के कुत्ते शामिल हैं। कंपनी कुत्तों की सेहत और खुशी का पूरा ध्यान रखती है। उनसे एक दिन में केवल 30 से 45 मिनट काम लिया जाता है।
बाकी समय वे फार्म पर दौड़ते-खेलते और आराम करते हैं। उनके लिए काम करना किसी मजेदार खेल की तरह होता है। उनके पहनने के लिए खास तरह का डेटा जैकेट और हेलमेट है।
इसे देखकर लोग इसे आयरन मैन सूट भी कहते हैं। कुत्तों और एआई की यह अनोखी जोड़ी एक नई मिसाल बन रही है। भविष्य में यह तकनीक लाखों लोगों की जान बचा सकती है।
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बेंगलुरु की एक बायोटेक कंपनी अब कुत्तों की मदद ले रही है। कुत्तों के सूंघने की क्षमता बहुत ही कमाल की होती है। उनके नाक में करोड़ों स्मेल रिसेप्टर्स (Smell receptors) पाए जाते हैं। इंसानों की तुलना में वे कई गुना ज्यादा बेहतर सूंघ सकते हैं।
इस स्टार्टअप का नाम डॉग्नोसिस है। वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी का भी यूज कर रहे हैं। एआई की मदद से कुत्तों की बॉडी लैंग्वेज समझी जाती है। ये एटेम्पट भारत में कैंसर की शुरुआती जांच को आसान बनाएगा। आइए इस पूरी रिसर्च और टेक्नोलॉजी के बारे में डिटेल से समझते हैं।
कुत्ते कैसे पहचानते हैं कैंसर की गंध
कुत्तों को लैब में खास तरह की ट्रेनिंग दी जाती है। जब वे सही सैंपल चुनते हैं, तो उन्हें इनाम मिलता है। इस काम के लिए लैब में स्पेशल प्लेटफॉर्म बनाए गए हैं।
वहां सैंपल सूंघते ही मशीन कुत्ते को खाने की चीज देती है। एआई सेंसर कुत्तों की सांस और दिमाग की गतिविधि पर नजर रखते हैं। इससे जांच का रिजल्ट बिल्कुल सटीक और भरोसेमंद आता है।
कैसे होती है मरीज के सैंपल की जांच
फिर उस सील मास्क को जांच के लिए सीधे लैब भेजा जाता है। लैब में ट्रेंड कुत्ते उस सैंपल की बारीकी से जांच करते हैं। एक घंटे में एक ट्रेनड कुत्ता हजारों सैंपल सूंघ सकता है।
इससे बड़े पैमाने पर मरीजों की स्क्रीनिंग संभव हो सकेगी। इस पूरी प्रक्रिया में मरीज को कोई दर्द या तकलीफ नहीं होती। ये तरीका ट्रेडिशनल इन्वेस्टीगेशन से बहुत आसान और अलग है।
रिसर्च में मिली 90% से ज्यादा एक्यूरेसी
टेस्ट में 90% से ज्यादा सही परिणाम मिले हैं। ये रिसर्च सात अलग-अलग मेजर कैंसर पर किया गया था। इस रिपोर्ट को मेडिकल जर्नल में भी जगह मिली है। हालांकि, इंडिपेंडेंट कैंसर स्पेशलिस्ट्स ने अभी थोड़ी सावधानी बरतने की सलाह दी है।
उनका कहना है कि बड़े समूह पर टेस्ट जरूरी है। समय के साथ ही पता चलेगा कि यह तकनीक कितनी मददगार होगी। लेकिन शुरुआती नतीजे काफी उम्मीद जगाते हैं।
भारत के लिए क्यों जरूरी है ये तकनीक
शुरुआती जांच की सुविधाएं काफी महंगी और सीमित हैं। ऐसे में कुत्तों से सूंघकर जांच करने वाला तरीका सस्ता पड़ सकता है। इसे गांव और दूर-दराज के इलाकों में भी इस्तेमाल कर सकते हैं। यह तकनीक सामान्य लोगों के लिए काफी ज्यादा किफायती साबित होगी।
कम खर्च में ज्यादा से ज्यादा लोगों की कैंसर का इलाज संभव हो सकेगा। कंपनी को उम्मीद है कि अगले साल तक कमर्शियल मंजूरी मिल जाएगी। इससे भारत में कैंसर इलाज की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।
कुत्तों के रहने और काम की खास व्यवस्था
बाकी समय वे फार्म पर दौड़ते-खेलते और आराम करते हैं। उनके लिए काम करना किसी मजेदार खेल की तरह होता है। उनके पहनने के लिए खास तरह का डेटा जैकेट और हेलमेट है।
इसे देखकर लोग इसे आयरन मैन सूट भी कहते हैं। कुत्तों और एआई की यह अनोखी जोड़ी एक नई मिसाल बन रही है। भविष्य में यह तकनीक लाखों लोगों की जान बचा सकती है।
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