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Education System Crisis: देश के करीब डेढ़ लाख स्कूलों में आधे से ज्यादा स्टाफ कॉन्ट्रेक्ट टीचर्स के भरोसे है। दूसरे शब्दों में कहें तो देश की आधी शिक्षा व्यवस्था कॉन्ट्रेक्ट यानी ठेके पर है।
UDISE के ताजा डेटा के मुताबिक, पुडुचेरी से लेकर मध्यप्रदेश और झारखंड तक, लगभग 16 लाख शिक्षक समान काम तो कर रहे हैं, लेकिन उनका भविष्य अधर में है।
सरकारी स्कूलों में रेगुलर टीचर्स को सम्मान और सुविधाएं मिलती हैं। वहीं ये कॉन्ट्रेक्ट टीचर्स और अतिथि विद्वान महज एक चौथाई सैलरी पर सिस्टम को संभाले हुए हैं। ये केवल उनके आर्थिक शोषण की कहानी नहीं है।
ये हमारे एजुकेशन फ्रेमवर्क की उस हैवी डिपेंडेंसी को भी दर्शाती है जो कम बजट और शॉर्ट-कट नीतियों के कारण पैदा हुई है। आइए, गहराई से समझते हैं इस नेशनल स्ट्रगल और शिक्षकों की जायज मांगों को।
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कौन होते हैं कॉन्ट्रेक्ट टीचर्स
कॉन्ट्रेक्ट टीचर्स (Contract Teachers) वे शिक्षक होते हैं, जिन्हें सरकार या प्राइवेट संस्थान एक निश्चित समय के लिए फिक्स्ड सैलरी पर अपाइंट करते हैं। इन्हें अतिथि शिक्षक, शिक्षा मित्र या पैरा-टीचर्स भी कहा जाता है।
विवाद का मुख्य कारण सबसे बड़ा विवाद समान काम, लेकिन असमान वेतन को लेकर है। ये टीचर्स रेगुलर टीचर्स के बराबर ही मेहनत करते हैं। वही सिलेबस पढ़ाते हैं। लेकिन इनकी सैलरी रेगुलर स्टाफ के मुकाबले 25% से भी कम होती है।
इनके पास जॉब सिक्योरिटी, पेंशन और मेडिकल लीव जैसी बेसिक सुविधाएं नहीं होतीं। दूसरा बड़ा कारण अनसर्टेन फ्यूचर है। हर साल कॉन्ट्रेक्ट खत्म होने पर इनकी नौकरी जाने का डर बना रहता है। इसके कारण देशभर में रेगुलराइजेशन की मांग को लेकर भारी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।
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आइए समझें क्या है पूरा मामला
पुडुचेरी से शुरू हुआ ये बवाल
आपको बता दें कि, बीती 3 फरवरी को पुडुचेरी में कांट्रेक्ट टीचर्स ने विधानसभा की ओर मार्च किया। पुलिस ने उन्हें रोका, धक्का-मुक्की हुई। लेकिन शिक्षकों का सवाल वही था कि हमें नियमित कब किया जाएगा?
पिछले साल पुडुचेरी के मुख्यमंत्री एन. रंगासामी ने भरोसा दिया था कि 292 शिक्षकों की सेवाएं नियमित होंगी। लेकिन साल बीत गया और वादा अब भी फाइलों में अटका है। पुडुचेरी की ये कहानी उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली और झारखंड के शिक्षा मित्रों और गेस्ट टीचर्स की याद दिलाती है।
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क्या कहता है डेटा: 16 लाख शिक्षकों का अधूरा हक
लेटेस्ट UDISE (Unified District Information System for Education) डेटा के मुताबिक, भारत में कुल वर्कफोर्स का लगभग 10% हिस्सा संविदा और पार्ट-टाइम टीचर्स का है।
संख्या के हिसाब से देखें तो 16 लाख से ज्यादा शिक्षक ऐसे हैं जो रेगुलर टीचर्स जितना ही काम करते हैं। लेकिन उन्हें वेतन और सुविधाएं बहुत कम मिलती हैं।
क्या होता है UDISE डेटा
UDISE (Unified District Information System for Education) डेटा को शिक्षा के लिए एकीकृत जिला सूचना प्रणाली कहा जाता है। ये भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय (Ministry of Education) द्वारा संचालित एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है।
UDISE देश के सभी स्कूलों (सरकारी और प्राइवेट) का डेटा इकट्ठा करता है। इसी के आधार पर स्कूलों की रैंकिंग, शिक्षकों की स्थिति और छात्रों की सुविधाओं का आकलन किया जाता है।
कॉन्ट्रेक्ट टीचर्स के सिचुएशन का एनालिसिस
भारत के शिक्षा जगत (Indian Education system) में संविदा या कांट्रैक्ट शब्द आज एक ऐसी सच्चाई बन चुका है। ये शिक्षकों के शोषण और सिस्टम की मजबूरी को दर्शाता है। आइए इसे समझे...
समान काम, कम दाम
कहने को तो ये शिक्षक स्कूलों में वही सिलेबस पढ़ाते हैं। उतने ही घंटे काम करते हैं, जितने एक रेगुलर टीचर। लेकिन जब बात सैलरी की आती है, तो फर्क जमीन-आसमान का हो जाता है। वर्ल्ड बैंक की एक रिसर्च रिपोर्ट ने इस पर मुहर लगाई है कि संविदा शिक्षकों को नियमित शिक्षकों के मुकाबले केवल 25% या उससे भी कम वेतन मिलता है। सरल शब्दों में कहें तो अगर एक सरकारी टीचर को 60 हजार रुपए मिल रहे हैं, तो उसी काम के लिए एक संविदा शिक्षक को केवल 10 हजार से 15 हजार रुपए में गुजारा करना पड़ता है।
1.5 लाख स्कूलों का बोझ इन्हीं कंधों पर
आज देश के एजुकेशन सिस्टम की स्थिति ये है कि अगर कल ये कांट्रैक्ट टीचर्स काम करना बंद कर दें, तो लाखों स्कूलों में ताले लग जाएंगे। डेटा बताता है कि भारत के लगभग 1.5 लाख स्कूल पूरी तरह से संविदा कर्मियों के भरोसे चल रहे हैं। इन स्कूलों में 50% से ज्यादा स्टाफ केवल कांट्रैक्ट पर है। ये आंकड़ा डराने वाला है। ये दिखाता है कि हमारी आने वाली पीढ़ी की शिक्षा की नींव उन लोगों के हाथ में है, जिनका अपना भविष्य ही इन्सेक्युर और अनसर्टेन है।
प्राइवेट स्कूलों में कांट्रैक्ट का सबसे बड़ा जाल
अक्सर लोग सोचते हैं कि ये समस्या केवल सरकारी स्कूलों या शिक्षा मित्रों तक सीमित है। लेकिन हकीकत इसके उलट है। प्राइवेट स्कूलों में यह ट्रेंड सबसे ज्यादा खतरनाक है। रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 21% प्राइवेट स्कूलों में आधे से अधिक वर्कफोर्स कांट्रैक्ट या पार्ट-टाइम बेसिस पर काम कर रही है।
मुनाफा कमाने के चक्कर में कई बड़े शिक्षण संस्थान कम सैलरी पर टीचर्स रखते हैं। इससे न केवल शिक्षकों का आर्थिक नुकसान होता है, बल्कि पढ़ाई की क्वालिटी पर भी असर पड़ता है।
नार्थ-ईस्ट और अन्य राज्यों में हैवी डिपेंडेंसी
ये ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग सिर्फ रूरल एरियाज तक सीमित नहीं है। डेटा बताता है कि शहरी इलाकों में भी शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए संविदा का सहारा लिया जा रहा है।
मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय जैसे उत्तर-पूर्वी राज्यों में स्कूलों की निर्भरता इन शिक्षकों पर सबसे ज्यादा है। वहीं, मध्य प्रदेश झारखंड और हरियाणा में भी 30% से ज्यादा स्कूल इसी मॉडल पर चल रहे हैं।
उत्तर-पूर्वी राज्यों में शिक्षा का संकट
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य जैसे मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय इस समस्या के केंद्र में हैं। यहां के स्कूलों में नियमित शिक्षकों की इतनी कमी है कि पूरा ढांचा कॉन्ट्रेक्ट टीचर्स के भरोसे ही टिका है। कई जिलों में तो स्थिति ऐसी है कि बिना इन शिक्षकों के स्कूल खुलना भी मुमकिन नहीं है।
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मध्यप्रदेश का हाल भी बेहाल
अगर हम मध्यप्रदेश की बात करें, तो यहां अतिथि शिक्षक व्यवस्था शिक्षा विभाग की रीढ़ बन चुकी है। लेकिन उनकी भी अपनी स्थिति चिंताजनक है:
स्कूल शिक्षा विभाग:
एमपी के सरकारी स्कूलों में लगभग 75 हजार अतिथि शिक्षक (स्कूल एजुकेशन) अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ये शिक्षक वर्षों से स्कूलों में खाली पदों को भर रहे हैं। लेकिन आज भी अपने भविष्य के रेगुलराइजेशन के लिए स्ट्रगलिंग हैं।
हायर एजुकेशन (कॉलेज):
केवल स्कूल ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा में भी यही हाल है। मध्य प्रदेश के सरकारी कॉलेजों में लगभग 53 सौ अतिथि विद्वान कार्यरत हैं। उच्च शिक्षित होने के बावजूद ये स्कॉलर एक सुरक्षित और स्थाई करियर की तलाश में आंदोलन करने को मजबूर हैं।
मध्यप्रदेश में चाहे वो स्कूली अतिथि शिक्षक हों या अतिथि विद्वान। इन्हें विभाग की रीढ़ की हड्डी माना जाता है। लेकिन जब रीढ़ ही असुरक्षित और कमजोर महसूस करे, तो शिक्षा की इमारत को ग्लोबल स्टैंडर्ड का बनाना मुश्किल है।
सरकार को इन शिक्षकों के अनुभव को अटेंशन देते हुए एक परमानेंट पॉलिसी बनानी चाहिए। इससे इनके जीवन में अतिथि शब्द का अस्थाईपन खत्म हो सके और ये पूरे मन से भारत का भविष्य संवार सकें।
झारखंड और हरियाणा: 30% का खतरनाक आंकड़ा
मध्यप्रदेश की ही तरह झारखंड और हरियाणा में भी शिक्षा का बजट बचाने के लिए संविदा मॉडल को अपनाया गया है। इन राज्यों के 30% से ज्यादा स्कूल इसी शॉर्ट-कट मॉडल पर चल रहे हैं।
हरियाणा जैसे राज्य में भी जो आर्थिक रूप से संपन्न माना जाता है। शिक्षकों को पक्की नौकरी के बजाय कांट्रैक्ट पर रखना इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है।
कोर्ट का रुख और रेगुलराइजेशन की मांग
कॉन्ट्रेक्ट टीचर्स के लिए उम्मीद की एक किरण पिछले साल (2025) पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले से आई। कोर्ट ने चंडीगढ़ प्रशासन को फटकार लगाते हुए कहा कि प्रशासन कांट्रैक्ट शब्द का गलत इस्तेमाल नहीं कर सकता।
कोर्ट ने आदेश दिया कि सर्व शिक्षा अभियान के तहत जो शिक्षक 10 साल से ज्यादा काम कर चुके हैं, उन्हें नियमित किया जाए। हकीकत ये है कि 1990 के दशक में जब संविदा शिक्षकों की भर्ती शुरू हुई थी तब इसे एक अस्थाई कदम माना गया था।
लेकिन समय के साथ सरकारों ने इसे पैसा बचाने का एक सस्ता जरिया बना लिया। आज ये शिक्षक पेंशन, ग्रेच्युटी और मेडिकल लीव जैसे लाभों से कोसों दूर हैं।
कैसे खत्म हो सकता है ये सिस्टम
भारत के एजुकेशन सिस्टम की बैकबोन कहे जाने वाले शिक्षक आज खुद एक बड़े संकट से जूझ रहे हैं। UDISE डेटा के मुताबिक, देश के करीब 1.5 लाख स्कूलों का भविष्य 16 लाख कॉन्ट्रेक्ट टीचर्स के भरोसे टिका है। समान काम के बावजूद ये शिक्षक बेहद कम सैलरी और इन्सेक्युर फ्यूचर के बीच संघर्ष कर रहे हैं।
पॉलिसी फॉर रेगुलराइजेशन (Policy for Regularization):
सरकार को एक ऐसी Time-bound Policy बनानी चाहिए जिसमें 5 या 10 साल की संतोषजनक सेवा पूरी करने वाले संविदा शिक्षकों को सीधे रेगुलर कैडर में शामिल किया जाए।
समान काम-समान वेतन (Equal Pay for Equal Work):
जब तक पद स्थाई नहीं होते, तब तक संविदा शिक्षकों का मानदेय कम से कम रेगुलर टीचर की बेसिक सैलरी के बराबर होना चाहिए। ताकि वेज गैप को खत्म किया जा सके।
सोशल सिक्योरिटी बेनिफिट्स (Social Security Benefits):
कॉन्ट्रेक्ट पर होने के बावजूद इन शिक्षकों को PF (प्रोविडेंट फंड), हेल्थ इंश्योरेंस और पेड लीव्स जैसी सुविधाएं जरूरी रूप से दी जानी चाहिए।
एक्सपीरियंस को वेटेज (Weightage to Experience):
जब भी परमानेंट भर्ती के लिए विज्ञापन निकले, तो इन कार्यरत संविदा शिक्षकों को उनके अनुभव के आधार पर Bonus Marks या Age Relaxation में प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
बजट एलोकेशन में बढ़ोत्तरी (Increase in Budget Allocation):
सरकारों को शिक्षा पर होने वाले खर्च (GDP का हिस्सा) को बढ़ाना होगा। ताकि चीप लेबर मॉडल के बजाय क्वालिटी एजुकेशन के लिए फंड्स का सही इस्तेमाल हो सके।
डिजिटल ट्रांसपेरेंसी (Digital Transparency):
एक सेंट्रलाइज्ड पोर्टल के जरिए संविदा शिक्षकों का डेटा मैनेज होना चाहिए। इससे उनकी सैलरी का भुगतान समय पर हो और मिडिल-मैन या विभागों द्वारा उनका शोषण रोका जा सके।
कुल मिलाकर, भारत की शिक्षा व्यवस्था आज उन 16 लाख कंधों पर टिकी है जिन्हें समाज शिक्षक तो कहता है, लेकिन सिस्टम वर्कर्स समझता है।
संविदा और अतिथि शिक्षकों का ये संघर्ष केवल वेतन की लड़ाई नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान और भविष्य की सुरक्षा का सवाल है। अगर हमें वाकई भारत को विश्व गुरु बनाना है, तो शिक्षा के बजट में कटौती के बजाय शिक्षकों के भविष्य में निवेश करना होगा।
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