108 रुपए के लिए 36 साल तक चला कोर्ट केस, अब आया HC का फैसला
Anjali Dwivedi | Jun 11, 2026, 15:20 IST
36 साल तक चला कोर्ट केस
हरियाणा रोडवेज के जींद डिपो के पूर्व कंडक्टर राम कुमार पर 1989 में 108 रुपए के राजस्व नुकसान का आरोप लगा था। 36 साल बाद पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी।
साल 1989 में हरियाणा रोडवेज के जींद डिपो के कंडक्टर राम कुमार पर आरोप लगा कि उन्होंने बस में बिना टिकट यात्रियों को सफर कराया था। इससे सरकार को 108 रुपए का नुकसान हुआ था। मार्च 1990 में विभाग ने उनकी एक वार्षिक वेतन वृद्धि रोक दी थी।
राम कुमार ने इस सजा को चुनौती दी और मामला अदालतों में खिंचता गया था। करीब 36 साल बाद जून 2026 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने उनकी अपील खारिज करते हुए विभाग की सजा को सही ठहराया।
बात 1989 की है, हरियाणा के जींद जिले में रोडवेज की एक बस मछरौली से सिवाह के बीच चल रही थी। उस बस के कंडक्टर राम कुमार थे। उस दिन विभागीय जांच में पाया गया कि बस में कुछ यात्री बिना टिकट सफर कर रहे थे। आरोप था कि कंडक्टर ने खुद उन्हें बिना किराया लिए चढ़ने दिया था।
जांच में हुए नुकसान का हिसाब लगाया गया तो कुल रकम निकली सिर्फ 108 रुपए। लेकिन नियम तो नियम होते हैं इसलिए विभाग ने कार्रवाई कर दी थी।
जांच पूरी होने के बाद मार्च 1990 में हरियाणा रोडवेज ने राम कुमार की एक सालाना वेतन वृद्धि (Annual Increment) को रोकने का फैसला किया था। यानी न सिर्फ उस साल की बढ़ोतरी रुकी, बल्कि आगे की तरक्की पर भी असर पड़ा था।
राम कुमार को यह सजा नाइंसाफी लगी। उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी। और यहीं से शुरू हुई एक लंबी कानूनी लड़ाई।
सजा के खिलाफ मामला जींद की ट्रायल कोर्ट में पहुंचा। करीब सात साल बाद 1996 में ट्रायल कोर्ट ने राम कुमार के पक्ष में फैसला सुनाया था। कोर्ट ने विभाग की सजा को रद्द कर दिया इस प्रकार कंडक्टर (conductor)को लगा कि वह लड़ाई जीत ली। लेकिन हरियाणा सरकार ने यह फैसला नहीं माना और इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दे दी। इस प्रकार यह मामला एक बार फिर अदालतों के चक्कर काटने लगा।
ऊपरी अदालत ने ट्रायल कोर्ट (trial court) का फैसला पलट दिया और विभागीय सजा बहाल कर दी। राम कुमार ने फिर इस फैसले को चुनौती दी और अदालतों का सिलसिला जारी रहा। दशक बीतते गए और कंडक्टर रिटायर हो गए, लेकिन 108 रुपए का यह मामला अदालत में जिंदा था।
जून 2026 में पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट में यह मामला आया। इस मामले की सुनवाई जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने की है। उन्होंने पूरे रिकॉर्ड और सबूतों को देखने के बाद स्पष्ट कहा कि विभागीय कार्रवाई में कोई गलती नहीं थी। नियमों का उल्लंघन साबित हुआ था, इसलिए विभाग द्वारा दी गई सजा पूरी तरह सही है।
हाई कोर्ट ने राम कुमार की अपील खारिज कर दी। 36 साल से चले आ रहे इस मामले पर आखिरकार पूर्ण विराम लग गया।
108 रुपए की रकम आज के दौर में बहुत छोटी लगती है। लेकिन यह मामला कई बड़े सवाल खड़े करता है। एक तरफ नियम का उल्लंघन था, चाहे रकम कितनी भी छोटी हो। दूसरी तरफ एक मामला 36 साल तक अदालतों में घूमता रहा। इसमें सरकारी खजाने का, वकीलों का, अदालती प्रक्रियाओं का कितना समय और पैसा खर्च हुआ होगा, यह सोचने वाली बात है।
भारत में लाखों ऐसे छोटे मामले अदालतों में लंबित हैं जो सालों से फैसले का इंतजार कर रहे हैं। इस मामले ने एक बार फिर न्यायिक व्यवस्था में तेजी लाने की जरूरत को रेखांकित किया है।
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राम कुमार ने इस सजा को चुनौती दी और मामला अदालतों में खिंचता गया था। करीब 36 साल बाद जून 2026 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने उनकी अपील खारिज करते हुए विभाग की सजा को सही ठहराया।
एक कंडक्टर, एक रूट, एक गलती
जांच में हुए नुकसान का हिसाब लगाया गया तो कुल रकम निकली सिर्फ 108 रुपए। लेकिन नियम तो नियम होते हैं इसलिए विभाग ने कार्रवाई कर दी थी।
मार्च 1990 में हुई सजा
राम कुमार को यह सजा नाइंसाफी लगी। उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी। और यहीं से शुरू हुई एक लंबी कानूनी लड़ाई।
जब ट्रायल कोर्ट ने दी राहत
फिर उलटा पड़ा पासा
हाई कोर्ट ने लगाया आखिरी मुहर
हाई कोर्ट ने राम कुमार की अपील खारिज कर दी। 36 साल से चले आ रहे इस मामले पर आखिरकार पूर्ण विराम लग गया।
यह मामला एक आईना है
भारत में लाखों ऐसे छोटे मामले अदालतों में लंबित हैं जो सालों से फैसले का इंतजार कर रहे हैं। इस मामले ने एक बार फिर न्यायिक व्यवस्था में तेजी लाने की जरूरत को रेखांकित किया है।
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