क्यों पिघल रहे हिमालय के ग्लेशियर? खतरे में 50 करोड़ जिंदगियां
Anjali Dwivedi | Apr 27, 2026, 12:14 IST
himalayan glaciers climate change crisis
ग्लोबल वॉर्मिंग से गंगोत्री समेत हिमालयी ग्लेशियर तेजी से सिमट रहे हैं। साल 2022 तक गंगोत्री 1700 मीटर पीछे हट चुका है। यह बदलाव 50 करोड़ लोगों के पानी और रोजगार के लिए बड़ा खतरा बन गया है।
News In Short
- साल 1935 से 2022 के बीच गंगोत्री ग्लेशियर 1700 मीटर पीछे खिसक चुका है।
- सदी के अंत तक हिमालय की 75% से 80% बर्फ खत्म होने की आशंका है।
- ग्लेशियर पिघलने से 50 करोड़ लोगों की आजीविका और पानी पर खतरा है।
- ग्लोबल वार्मिंग के कारण पिछले दो दशकों में बर्फ पिघलने की दर दोगुनी हुई।
- स्नो हार्वेस्टिंग और पर्यटन पर नियंत्रण से हिमालय को बचाया जा सकता है।
News In Detail
यहां से लकड़ी, खनिज और जल-विद्युत जैसे आवश्यक संसाधन मिलते हैं। पिछले कुछ दशकों में यहां मौसम का संकट गहरा गया है। जनसंख्या वृद्धि और जंगलों की कटाई ने स्थिति और बिगाड़ दी है। प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक इस्तेमाल भी इसकी एक बड़ी वजह है। अवैज्ञानिक कृषि पद्धति (Unscientific Farming) से पहाड़ों की सेहत खराब हो रही है।
himalayan glaciers climate change crisis
नदियों का सिमटता दायरा
किंतु 1950 के दशक से ही इनका दायरा घटने लगा है। अब ग्लेशियर हर तीन से चार मीटर तक घट रहे हैं। यह बदलाव भविष्य के लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी है। वैज्ञानिक अब इस स्थिति पर गहरी नजर रख रहे हैं। पानी की कमी का खतरा अब साफ दिखाई दे रहा है।
climate change Himalayas
गंगोत्री ग्लेशियर पर मंडराता गंभीर खतरा
पिछले दो दशकों में इसके पिघलने की दर दोगुनी हो गई है। यह उत्तर भारत की वाटर सिक्योरिटी के लिए संकट है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी ने कई चिंताजनक रिपोर्ट दी हैं। लद्दाख और सिक्किम के ग्लेशियरों पर भी गर्मी का बुरा असर है। कम हिमपात के कारण ग्लेशियरों को नया जीवन नहीं मिल रहा।
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हिंदूकुश हिमालय और 75% बर्फ खोने का डर
इनमें से 900 ग्लेशियर अकेले उत्तराखंड राज्य में आते हैं। अगर बर्फ पिघल गई तो करोड़ों लोगों का जीवन थम जाएगा। ये ग्लेशियर देश की 40% आबादी की आजीविका का आधार हैं। पानी के बिना कृषि और उद्योग पूरी तरह ठप हो जाएंगे। भविष्य में रोजगार का संकट खड़ा होना भी लगभग तय है।
ये है गंगोत्री ग्लेशियर गौमुख जहां से भागीरथी नदी निकलती है, जो आगे चलकर गंगा बनती है. (File Photo: Getty)
नेपाल की संवेदनशीलता और खेती पर असर
इससे स्थानीय समुदायों की खाद्य सुरक्षा दांव पर है। नेपाल पिछले दो दशकों से इससे निपटने का प्रयास कर रहा है। अनुकूलन और जोखिम कम करने के लिए नीतियां बनाई जा रही हैं। फिर भी प्रकृति का बदलता मिजाज काबू में नहीं आ रहा है। जैव विविधता को भी इससे अपूरणीय क्षति पहुंच रही है।
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ICIMOD की चेतावनी और तीसरा ध्रुव
एक अध्ययन के अनुसार एंपरर पेंग्विन की आबादी भी खतरे में है। 21वीं सदी तक उनकी 98% आबादी गायब हो सकती है। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन इसी तरह बढ़ा तो तबाही मचेगी। अल-नीनो और ला-नीना का प्रभाव भी मौसम को बिगाड़ रहा है। प्रचंड गर्मी ने इंसानों को अब बहुत कुछ सिखा दिया है।
स्नो हार्वेस्टिंग में पुरानी परंपरा से नई उम्मीद
इसे नमक और जैविक कचरे से ढक दिया जाता था। इस तकनीक से बर्फ लंबे समय तक जमी रहती थी। गर्मियों में इसी बर्फ से पानी की आपूर्ति होती थी। इसे आज की भाषा में स्नो हार्वेस्टिंग (Snow Harvesting) कह सकते हैं। पहाड़ों को दुनिया का वाटर टॉवर कहना बिल्कुल सही होगा।
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