बेअसर होगी हर मौसम की मार! गेहूं की नई किस्में गर्मी-सूखे को भी देंगी मात
Aman Vaishnav | Aug 05, 2026, 13:11 IST
गेहूं की नई किस्में
ICAR ने गेहूं की दो नई किस्में विकसित की हैं। इससे कम पानी और देर से बुवाई के बावजूद अच्छी पैदावार मिलने से किसानों की आय बढ़ेगी। इस किस्म में 12.3 प्रतिशत प्रोटीन कंटेंट पाया जाता है, जिससे गेहूं और रोटी की क्वालिटी काफी अच्छी होती है।
समझें क्या है पूरा मामला...
- ICAR के करनाल संस्थान ने गेहूं की नई किस्म DBW 425 तैयार की है।
- यह किस्म देर से बोई गई सिंचित फसलों के लिए है।
- यह गर्मी और सूखे को झेलने में सक्षम है।
- इसकी औसत उपज 47.9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
- इसमें 12.3 फीसदी प्रोटीन भी पाया जाता है।
यह किस्म खासतौर पर उन इलाकों के लिए तैयार की गई है, जहां गेहूं की बुवाई देर से होती है। सिंचित खेती वाले किसानों के लिए यह किस्म बेहद फायदेमंद मानी जा रही है। खासकर केंद्रीय क्षेत्र के किसानों को इससे बड़ा लाभ मिल सकता है।
गर्मी और सूखे में भी टिकेगी फसल
संस्थान का दावा है कि यह क्लाइमेट रेजिलिएंट किस्म है। यानी प्रतिकूल मौसम में भी इसका उत्पादन स्थिर बना रहता है। इससे किसानों को मौसम की मार से कुछ राहत मिल सकती है।
उपज और प्रोटीन में भी आगे
बेहतर दाना क्वालिटी और पोषण मूल्य इस किस्म को और खास बनाते हैं। इससे किसानों के साथ-साथ उपभोक्ताओं को भी फायदा होगा। संस्थान को उम्मीद है कि यह किस्म आने वाले सालों में खाद्य सुरक्षा मजबूत करेगी।
कम पानी वाली अन्य किस्में भी उपलब्ध
एक और नई किस्म एचआई 1683 पर भी काम चल रहा है। हालांकि यह किस्म अभी बाजार में लॉन्च नहीं हुई है। इसे भी जलवायु के अनुकूल बनाने की कोशिश की जा रही है।
HD 3388 भी किसानों की पसंद
यह फसल महज 125 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसमें गर्मी के तनाव को झेलने की खास क्षमता है। इसका HSI स्कोर 0.89 दर्ज किया गया है।
इस किस्म से बनने वाली रोटी की क्वालिटी भी काफी बेहतर होती है। वैज्ञानिकों ने इसे पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के लिए अनुशंसित किया है। इसके अलावा ओडिशा और असम के किसान भी इसे अपना सकते हैं।
इस किस्म का बीज लेने के लिए किसान ICAR-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली से संपर्क कर सकते हैं।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी नई किस्में किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएंगी। आने वाले समय में इनका असर खेतों में देखने को मिल सकता है।
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