भारतीय अर्थव्यवस्था की 9 बड़ी चुनौतियां : सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, इन वजहों से डगमगा रहा है देश का बजट
Sanjay Dhiman | May 17, 2026, 24:14 IST
Photograph: (the sootr)
भारत की अर्थव्यवस्था पेट्रोल‑डीजल महंगाई, रुपया गिरावट, विदेशी निवेश निकासी और बढ़ती महंगाई जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बॉन्ड में टैक्स छूट और ग्रीन एनर्जी से आर्थिक स्थिरता हासिल की जा सकती है।
28 फरवरी को जब ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच जंग की शुरुआत हुई, तो किसी ने नहीं सोचा था कि इसका खामियाजा भारतीय रसोई और बाजार को भुगतना पड़ेगा। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से दुनिया भर में तेल और गैस की सप्लाई चेन पूरी तरह से ठप हो गई है। इसी वजह से आज देश की अर्थव्यवस्था को 'सप्लाई साइड शॉक' यानी जरूरी सामानों की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। आइए, बेहद आसान बोलचाल की भाषा में समझते हैं कि आखिर देश का आर्थिक भविष्य किस करवट बैठने वाला है।
अभी कुछ ही दिन पहले सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपए प्रति लीटर का इजाफा किया था। हालांकि, अगर हम दुनिया के बाकी देशों से तुलना करें, तो भारत में यह बढ़ोतरी बहुत मामूली दिखती है। यूक्रेन और मिडिल-ईस्ट संकट के बाद जहां मलेशिया में पेट्रोल 56%, हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में 55% और सुपरपावर अमेरिका में 45% तक महंगा हो गया, वहीं भारत में यह बढ़त सिर्फ 3.2% से 3.4% के बीच ही रही है।
लेकिन रुकिए, असली ट्विस्ट यहीं पर है। एक्सिस बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट नीलकंठ मिश्रा का कहना है कि यह 3 रुपए की बढ़ोतरी तो सिर्फ एक झांकी है, असली पिक्चर अभी बाकी है। तेल कंपनियों को हो रहे भयंकर घाटे से उबारने के लिए आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल के दामों में कम से कम 15 रुपए प्रति लीटर की और बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है। बाजार को इस नई वैश्विक कड़वी सच्चाई के साथ तालमेल बिठाना ही होगा।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं। इस वजह से हमारी सरकारी तेल कंपनियां—इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम-लागत से बहुत कम दाम पर ईंधन बेचने को मजबूर हैं। इसका नतीजा यह है कि इन कंपनियों को रोजाना करीब 1,000 से 1,600 करोड़ रुपए का भारी-भरकम नुकसान उठाना पड़ रहा है।
दिग्गज बाजार निवेशक समीर अरोड़ा ने इस पर दो टूक बात कही है। उन्होंने कहा कि यह सोचना पूरी तरह से गलत है कि सिर्फ ये कंपनियां डूब रही हैं, असल में यह सीधे-सीधे भारत का राष्ट्रीय नुकसान है। इस रोजाना के 1,000 करोड़ रुपए के घाटे को चार बराबर हिस्सों में बांटना होगा:
ईंधन और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों का सबसे पहला और सीधा हमला देश की थोक महंगाई दर पर हुआ है। अप्रैल के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित महंगाई दर अचानक से उछलकर 8.30% के डरावने स्तर पर पहुंच गई है। गौर करने वाली बात यह है कि पिछले कुछ महीनों से यह पूरी तरह नियंत्रण में थी।
आर्थिक एक्सपर्ट आशिमा गोयल ने इस स्थिति को समझाते हुए कहा कि थोक महंगाई दर में एक बहुत बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों का होता है, इसलिए क्रूड ऑयल महंगा होते ही यह दर तेजी से ऊपर भागती है। हालांकि, उन्होंने एक राहत की बात भी बताई कि आज के भारत की 'एनर्जी इंटेंसिटी' 1970 के दशक जैसी कमजोर नहीं है। सरकार की बेहतर पॉलिसियों की वजह से इसका पूरा झटका तुरंत सीधे उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचता है।
भले ही रिटेल या खुदरा महंगाई दर (CPI) अभी 3.40% से मामूली रूप से बढ़कर 3.48% पर ही टिकी हुई है, लेकिन थोक बाजार की यह आग बहुत जल्द आम आदमी की थाली और रोजमर्रा के सामानों तक पहुंचने वाली है। कच्चे तेल के महंगे होने का मतलब है कि प्लास्टिक पैकेजिंग से लेकर खाने वाले तेल (एडिबल ऑयल) की मालभाड़ा लागत बढ़ चुकी है, जिससे ये चीजें महंगी होने लगी हैं।
नीलकंठ मिश्रा के मुताबिक, अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पूरे साल औसतन 100 डॉलर प्रति बैरल के आस-पास जमी रहती हैं, तो वित्तीय वर्ष 2027 के लिए हमारा खुदरा महंगाई का अनुमान 4% से सीधे छलांग लगाकर 5.3% तक जा सकता है। यानी आने वाले दिनों में घर चलाना और महंगा होने वाला है।
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले हमारा भारतीय रुपया लगातार घुटने टेक रहा है। इसी साल फरवरी महीने में जो रुपया प्रति डॉलर 91 के स्तर पर कारोबार कर रहा था, वह अब गिरकर 95.93 के ऑल टाइम लो (ऐतिहासिक निचले स्तर) पर आ चुका है। रुपये के कमजोर होने का सीधा मतलब यह है कि हमारा इम्पोर्ट (आयात) बेहद महंगा हो जाएगा। भारत को विदेशों से कोई भी सामान खरीदने के लिए पहले के मुकाबले बहुत ज्यादा डॉलर चुकाने होंगे।
इस बड़े करेंसी संकट पर समीर अरोड़ा ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए सलाह दी है। उन्होंने कहा कि हमें रुपये को 100 के मनोवैज्ञानिक स्तर तक गिरने का इंतजार कतई नहीं करना चाहिए। चूंकि भारत हर साल करीब 180 बिलियन डॉलर का भारी-भरकम आयात करता है, इसलिए रुपये में महज 1% की गिरावट भी हमारे देश को अरबों रुपये का फटका लगाती है। सरकार को तुरंत NRI बॉन्ड्स जारी करने चाहिए ताकि देश में विदेशी डॉलर की एंट्री हो और हमारी करेंसी स्थिर हो सके।
भारतीय शेयर बाजार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FIIs) का भरोसा डगमगाता हुआ दिख रहा है और वे लगातार अपना पैसा देश से बाहर निकाल रहे हैं। जंग शुरू होने के बाद यानी मार्च से लेकर 13 मई तक के छोटे से अंतराल में विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से 23.44 बिलियन डॉलर की भारी-भरकम पूंजी समेटकर भाग चुके हैं।
मार्केट एक्सपर्ट राजीव मंत्री ने इस पर अपनी राय रखते हुए कहा कि ग्लोबल लेवल पर 'कॉस्ट ऑफ कैपिटल' यानी पूंजी की लागत पूरी तरह बदल चुकी है। दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरें बढ़ाए जाने के कारण विदेशी निवेशक हर इमर्जिंग मार्केट (उभरते बाजार) को अब बहुत ही फूंक-फूंक कर और कड़े नजरिए से देख रहे हैं। इन विदेशी निवेशकों को वापस बुलाने का एकमात्र तरीका यही है कि हम देश में 'सप्लाई-साइड रिफॉर्म्स' यानी आर्थिक सुधारों की रफ्तार को किसी भी कीमत पर थमने न दें।
वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और गैस की कीमतों में लगी इस आग का असर सिर्फ गाड़ियों के ईंधन पर ही नहीं, बल्कि व्यावसायिक रसोई गैस (LPG) और खेती-किसानी के लिए सबसे जरूरी फर्टिलाइजर (खाद) पर भी देखने को मिल रहा है। अगर सरकार इस बढ़ी हुई कीमत का पूरा बोझ देश के किसानों और जनता पर नहीं डालना चाहती, तो सरकार का राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़ना बिल्कुल तय है।
कमर्शियल गैस सिलेंडर के आंकड़ों पर नजर डालें तो दंग रह जाएंगे:
मार्च 2026: 1884.50 रुपये प्रति सिलेंडर
अप्रैल 2026: 2,078.50 रुपये प्रति सिलेंडर
मई 2026: 3071.50 रुपये प्रति सिलेंडर
नीलकंठ मिश्रा ने इस गणित को समझाते हुए कहा कि पिछले साल के औसत 70 डॉलर के मुकाबले तेल का महज 15 डॉलर प्रति बैरल महंगा होना ही भारत की जीडीपी (GDP) के 1% के बराबर का बड़ा झटका होता है। अभी तो तेल $100 के पार चल रहा है, जिसका सीधा मतलब है कि हमारी पूरी अर्थव्यवस्था पर देश की जीडीपी का लगभग 2% का भारी दबाव है। सरकार फर्टिलाइजर और एलपीजी पर भारी सब्सिडी देकर जनता को फौरी तौर पर तो बचा लेगी, लेकिन इससे देश के सरकारी खजाने की हालत खस्ता हो जाएगी।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव, लगातार टूटते रुपये और विदेशी संस्थागत निवेशकों की अंधाधुंध बिकवाली के चलते भारतीय शेयर बाजार के दोनों प्रमुख सूचकांकों में गिरावट का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। जंग शुरू होने से ठीक पहले यानी 27 फरवरी को जो सेंसेक्स 81,287 के ऐतिहासिक शिखर पर शान से बैठा था, वह लगातार लुढ़कते हुए 15 मई तक 75,238 के निचले स्तर पर आ गिरा है।
हालांकि, आशिमा गोयल ने इस निराशाजनक माहौल में भी एक सकारात्मक उम्मीद जताई है। उन्होंने कहा कि शॉर्ट टर्म (कम अवधि) में बाजार के अंदर थोड़ा पैनिक और डर का माहौल जरूर हो सकता है, लेकिन भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी आर्थिक विविधता (Diversity) है। आज वैश्विक स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर जो बड़ी-बड़ी चर्चाएं चल रही हैं, मुमकिन है कि वह महज एक आर्थिक बुलबुला (Bubble) हो जो कल को फूट जाए। ऐसे संकट के समय भारत अपनी कई आंतरिक रणनीतियों और प्लानिंग पर तेजी से काम कर रहा है, जो लॉन्ग टर्म में देश को बेहद शानदार नतीजे दे सकती हैं।
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1. पेट्रोल-डीजल के दाम: ये तो बस शुरुआत है!
लेकिन रुकिए, असली ट्विस्ट यहीं पर है। एक्सिस बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट नीलकंठ मिश्रा का कहना है कि यह 3 रुपए की बढ़ोतरी तो सिर्फ एक झांकी है, असली पिक्चर अभी बाकी है। तेल कंपनियों को हो रहे भयंकर घाटे से उबारने के लिए आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल के दामों में कम से कम 15 रुपए प्रति लीटर की और बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है। बाजार को इस नई वैश्विक कड़वी सच्चाई के साथ तालमेल बिठाना ही होगा।
तेल कंपनियों का भयंकर घाटा: देश की जेब पर भारी चोट
दिग्गज बाजार निवेशक समीर अरोड़ा ने इस पर दो टूक बात कही है। उन्होंने कहा कि यह सोचना पूरी तरह से गलत है कि सिर्फ ये कंपनियां डूब रही हैं, असल में यह सीधे-सीधे भारत का राष्ट्रीय नुकसान है। इस रोजाना के 1,000 करोड़ रुपए के घाटे को चार बराबर हिस्सों में बांटना होगा:
- पहला, ONGC जैसी सरकारी कच्चा तेल उत्पादक कंपनियां अपना मुनाफा थोड़ा कम करें।
- दूसरा, केंद्र और राज्य सरकारें तेल पर लगने वाले टैक्स में कटौती करें।
- तीसरा, तेल कंपनियां खुद थोड़ा नुकसान झेलने की आदत डालें।
- चौथा, थोड़ा सा बोझ आम जनता के कंधों पर भी डाला जाए।
थोक महंगाई दर (WPI) का आसमान छूना: फैक्ट्रियों में लगी आग
आर्थिक एक्सपर्ट आशिमा गोयल ने इस स्थिति को समझाते हुए कहा कि थोक महंगाई दर में एक बहुत बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों का होता है, इसलिए क्रूड ऑयल महंगा होते ही यह दर तेजी से ऊपर भागती है। हालांकि, उन्होंने एक राहत की बात भी बताई कि आज के भारत की 'एनर्जी इंटेंसिटी' 1970 के दशक जैसी कमजोर नहीं है। सरकार की बेहतर पॉलिसियों की वजह से इसका पूरा झटका तुरंत सीधे उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचता है।
खुदरा महंगाई दर (CPI) का बढ़ता प्रेशर: आपकी थाली पर संकट
नीलकंठ मिश्रा के मुताबिक, अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पूरे साल औसतन 100 डॉलर प्रति बैरल के आस-पास जमी रहती हैं, तो वित्तीय वर्ष 2027 के लिए हमारा खुदरा महंगाई का अनुमान 4% से सीधे छलांग लगाकर 5.3% तक जा सकता है। यानी आने वाले दिनों में घर चलाना और महंगा होने वाला है।
डॉलर के सामने पस्त होता रुपया: ऑल टाइम लो का नया रिकॉर्ड
इस बड़े करेंसी संकट पर समीर अरोड़ा ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए सलाह दी है। उन्होंने कहा कि हमें रुपये को 100 के मनोवैज्ञानिक स्तर तक गिरने का इंतजार कतई नहीं करना चाहिए। चूंकि भारत हर साल करीब 180 बिलियन डॉलर का भारी-भरकम आयात करता है, इसलिए रुपये में महज 1% की गिरावट भी हमारे देश को अरबों रुपये का फटका लगाती है। सरकार को तुरंत NRI बॉन्ड्स जारी करने चाहिए ताकि देश में विदेशी डॉलर की एंट्री हो और हमारी करेंसी स्थिर हो सके।
विदेशी निवेशकों की भगदड़: शेयर बाजार से पैसा गायब
मार्केट एक्सपर्ट राजीव मंत्री ने इस पर अपनी राय रखते हुए कहा कि ग्लोबल लेवल पर 'कॉस्ट ऑफ कैपिटल' यानी पूंजी की लागत पूरी तरह बदल चुकी है। दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरें बढ़ाए जाने के कारण विदेशी निवेशक हर इमर्जिंग मार्केट (उभरते बाजार) को अब बहुत ही फूंक-फूंक कर और कड़े नजरिए से देख रहे हैं। इन विदेशी निवेशकों को वापस बुलाने का एकमात्र तरीका यही है कि हम देश में 'सप्लाई-साइड रिफॉर्म्स' यानी आर्थिक सुधारों की रफ्तार को किसी भी कीमत पर थमने न दें।
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मार्च 2026: 1884.50 रुपये प्रति सिलेंडर
अप्रैल 2026: 2,078.50 रुपये प्रति सिलेंडर
मई 2026: 3071.50 रुपये प्रति सिलेंडर
नीलकंठ मिश्रा ने इस गणित को समझाते हुए कहा कि पिछले साल के औसत 70 डॉलर के मुकाबले तेल का महज 15 डॉलर प्रति बैरल महंगा होना ही भारत की जीडीपी (GDP) के 1% के बराबर का बड़ा झटका होता है। अभी तो तेल $100 के पार चल रहा है, जिसका सीधा मतलब है कि हमारी पूरी अर्थव्यवस्था पर देश की जीडीपी का लगभग 2% का भारी दबाव है। सरकार फर्टिलाइजर और एलपीजी पर भारी सब्सिडी देकर जनता को फौरी तौर पर तो बचा लेगी, लेकिन इससे देश के सरकारी खजाने की हालत खस्ता हो जाएगी।
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हालांकि, आशिमा गोयल ने इस निराशाजनक माहौल में भी एक सकारात्मक उम्मीद जताई है। उन्होंने कहा कि शॉर्ट टर्म (कम अवधि) में बाजार के अंदर थोड़ा पैनिक और डर का माहौल जरूर हो सकता है, लेकिन भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी आर्थिक विविधता (Diversity) है। आज वैश्विक स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर जो बड़ी-बड़ी चर्चाएं चल रही हैं, मुमकिन है कि वह महज एक आर्थिक बुलबुला (Bubble) हो जो कल को फूट जाए। ऐसे संकट के समय भारत अपनी कई आंतरिक रणनीतियों और प्लानिंग पर तेजी से काम कर रहा है, जो लॉन्ग टर्म में देश को बेहद शानदार नतीजे दे सकती हैं।
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