जस्टिस यशवंत वर्मा ने दिया इस्तीफा: जले नोटों से शुरू हुआ विवाद इस्तीफे पर खत्म! जानें पूरा मामला

Jitendra Shrivastava | Apr 10, 2026, 16:38 IST
Photograph: (THESOOTR)
NEW DELHI. कैश कांड में घिरे इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफा दे दिया। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद महाभियोग प्रक्रिया स्वतः समाप्त हो जाएगी। SC फैसला और इस्तीफे की पढ़ें पूरी टाइमलाइन...

News In Detail

  • जस्टिस वर्मा ने राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपा।
  • इस्तीफे से महाभियोग प्रक्रिया स्वतः खत्म होगी।
  • होली रात दिल्ली आवास से मिले थे जले नोट।
  • 145 लोकसभा सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव दिया।
  • SC ने वर्मा की याचिका को खारिज कर दिया था।

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देश की न्यायपालिका में एक ऐतिहासिक घटना सामने आई है। कैश कांड (Cash Scandal) में घिरे इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपा। इस्तीफे के मंजूर होते ही उनके खिलाफ चल रही महाभियोग प्रक्रिया (Impeachment Process) स्वतः समाप्त हो जाएगी।



जस्टिस वर्मा इस्तीफे में क्या लिखा?

9 अप्रैल 2026 को जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजा। इस्तीफे की एक प्रति उन्होंने CJI सूर्यकांत को भी भेजी।



कहां से हुई विवाद की शुरुआत

14 मार्च 2025 की रात देश की न्यायपालिका में एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। दिल्ली के चाणक्यपुरी में जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर आग लग गई। आग बुझाने के दौरान वहां भारी मात्रा में बेहिसाब नकदी (Unaccounted Cash) मिली।



500 रुपए के जले और अधजले नोटों का वीडियो देशभर में तेजी से वायरल हो गया। उस समय जस्टिस वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) के न्यायाधीश के रूप में कार्यरत थे। इस घटना ने न्यायपालिका की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।



justice yashwant varma


CJI ने शुरू की आंतरिक जांच

घटना के ठीक आठ दिन बाद, 22 मार्च 2025 को भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आंतरिक जांच (In-house Inquiry) शुरू की।



इसके लिए हाईकोर्ट के तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों का एक विशेष पैनल बनाया गया। इस पैनल को जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।



समानांतर में सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम (Supreme Court Collegium) ने जस्टिस वर्मा का तबादला दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट करने की सिफारिश की।



इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रांसफर

सरकार ने कोलेजियम की सिफारिश मानते हुए जस्टिस वर्मा के ट्रांसफर को मंजूरी दे दी। 5 अप्रैल 2025 को जस्टिस यशवंत वर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में शपथ ग्रहण की।



हालांकि, इलाहाबाद में भी उनका ट्रांसफर विवादमुक्त नहीं रहा। कानूनी हलकों में यह सवाल उठाया गया कि जांच के दौरान ट्रांसफर उचित है या नहीं। इस पूरे विवाद के बीच जस्टिस वर्मा के खिलाफ जांच प्रक्रिया लगातार जारी रही।



जांच रिपोर्ट में कदाचार साबित हुआ

3 मई 2025 को आंतरिक जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट में कहा गया कि बरामद नकदी (Cash Recovery) पर जस्टिस वर्मा का "गुप्त या सक्रिय नियंत्रण" था।



तत्कालीन CJI संजीव खन्ना ने इस रिपोर्ट के आधार पर जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश की। जस्टिस वर्मा ने इन आरोपों से इनकार किया था और मामले को एक साजिश बताया था। फिर भी जांच के निष्कर्षों के आधार पर आगे की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू हो गई।



संसद में महाभियोग प्रस्ताव- सत्ता और विपक्ष एकजुट

जुलाई 2025 में संसद के मानसून सत्र में यह मामला अपने चरम पर पहुंचा। लोकसभा के 145 और राज्यसभा के 63 सांसदों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव (Impeachment Motion) पर हस्ताक्षर किए।



इस प्रस्ताव में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सांसद शामिल थे। राहुल गांधी, अनुराग ठाकुर, रविशंकर प्रसाद और सुप्रिया सुले जैसे बड़े नाम भी हस्ताक्षरकर्ताओं में थे। यह कदम संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 218 के तहत उठाया गया था।



justice yashwant varma (2)


जांच समिति गठन को मिली संसदीय मंजूरी

12 अगस्त 2025 को लोकसभा अध्यक्ष ने जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत एक तीन सदस्यीय संसदीय जांच समिति का गठन किया। यह समिति जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की विस्तृत जांच के लिए बनाई गई थी। बाद में मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मनींदर मोहन श्रीवास्तव की सेवानिवृत्ति के बाद इस समिति की संरचना में बदलाव भी किया गया।



सुप्रीम कोर्ट ने वर्मा की याचिका खारिज की

7 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। जस्टिस वर्मा ने लोकसभा अध्यक्ष के जांच समिति गठन के निर्णय को प्रक्रियात्मक आधार पर चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि दोनों सदनों में एक साथ लाए गए प्रस्तावों के लिए लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति का संयुक्त परामर्श जरूरी था।



न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस याचिका को खारिज कर दिया। पीठ ने यह भी कहा कि आंतरिक जांच प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और न्यायसंगत थी।



महाभियोग और इस्तीफे का संवैधानिक पहलू

भारतीय संविधान के अनुसार किसी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया (Judicial Impeachment Process) तभी जारी रह सकती है जब वह अपने पद पर बना रहे।



जैसे ही जस्टिस वर्मा का इस्तीफा राष्ट्रपति द्वारा स्वीकार किया जाएगा, उनके खिलाफ चल रही सारी कार्यवाही स्वतः समाप्त हो जाएगी। यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक तथ्य है जो इस पूरे मामले को एक नया मोड़ देता है। ऐसे में कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस्तीफे ने संसदीय प्रक्रिया को अधूरा छोड़ दिया है।



न्यायपालिका की जवाबदेही पर उठे सवाल

जस्टिस यशवंत वर्मा के इस मामले ने भारतीय न्यायपालिका (Indian Judiciary) की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायिक भ्रष्टाचार (Judicial Corruption) जैसे संवेदनशील मामलों में आंतरिक निगरानी तंत्र को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है।



यह घटना इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका जैसे स्वतंत्र संस्थान में भी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए मजबूत और पारदर्शी ढाँचे की जरूरत है। इस मामले ने न्यायपालिका सुधार की बहस को एक बार फिर से केंद्र में ला दिया है।



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FAQ

  1. जस्टिस यशवंत वर्मा का कैश कांड क्या था और यह विवाद कब शुरू हुआ?
    जस्टिस यशवंत वर्मा का कैश कांड 14 मार्च 2025 को उस समय सामने आया जब दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित उनके सरकारी आवास पर आग लग गई। आग बुझाने के दौरान वहाँ भारी मात्रा में बेहिसाब नकदी, विशेष रूप से 500 रुपये के जले और अधजले नोट बरामद हुए। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। उस समय वह दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश थे। इस घटना ने न्यायिक भ्रष्टाचार को लेकर देशभर में बड़ी बहस छेड़ दी और इसी के साथ महाभियोग प्रक्रिया की नींव पड़ी। जस्टिस वर्मा ने आरोपों से इनकार करते हुए इसे साजिश बताया था, लेकिन आंतरिक जांच में उन्हें दोषी पाया गया।
  2. जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया क्या थी और इस्तीफे से यह कैसे समाप्त होगी?
    महाभियोग (Impeachment) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 218 के तहत किसी न्यायाधीश को पद से हटाने की संसदीय प्रक्रिया है। जुलाई 2025 में 145 लोकसभा और 63 राज्यसभा सांसदों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ इस प्रक्रिया को शुरू किया। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने जजेज इन्क्वायरी एक्ट 1968 के तहत जांच समिति बनाई। हालांकि भारतीय संविधान के अनुसार यह प्रक्रिया तभी जारी रह सकती है जब संबंधित व्यक्ति पद पर बना रहे। जस्टिस वर्मा के इस्तीफे और राष्ट्रपति द्वारा उसे स्वीकार करने के साथ ही यह संपूर्ण महाभियोग प्रक्रिया संवैधानिक रूप से स्वतः समाप्त हो जाएगी।
  3. जस्टिस यशवंत वर्मा के इस्तीफे के पत्र में क्या लिखा गया था और इसका क्या महत्व है?
    जस्टिस यशवंत वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा भेजा। उन्होंने त्यागपत्र में लिखा कि वे इस गरिमामय पद पर उन कारणों का बोझ नहीं डालना चाहते जिन्होंने उन्हें यह पत्र लिखने के लिए बाध्य किया। उन्होंने गहरे दुख के साथ पद छोड़ने की बात कही और यह भी स्वीकार किया कि इस पद पर सेवा करना उनके लिए सम्मान की बात रही है। इस्तीफे की एक प्रति CJI सूर्यकांत को भी भेजी गई। इस पत्र का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह स्वीकार होते ही न्यायिक इतिहास में एक बड़ा अध्याय बंद हो जाएगा और महाभियोग जैसी दुर्लभ प्रक्रिया इस्तीफे की वजह से अधूरी रह जाएगी।


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