सियासी युद्ध: 362 के मिशन पर NDA, शिवसेना तो शुरुआत है, आगे-आगे देखिए होता है क्या?

Ravi Kant Dixit | Jun 17, 2026, 19:03 IST
362 के मिशन पर NDA, शिवसेना तो शुरुआत है
NDA का 362 सांसदों का लक्ष्य अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। विपक्षी दलों में बढ़ती हलचल और टूट इस रणनीति को और मजबूत संकेत दे रही है। शिवसेना से शुरू हुआ घटनाक्रम अब कई राज्यों तक फैलता दिख रहा है।

राजनीति में इन दिनों सबसे दिलचस्प सवाल क्या है? कौन-किसके खिलाफ बयान दे रहा है या किस राज्य में चुनाव होने वाले हैं। जी नहीं, यह चर्चा नहीं हो रही है। असली सवाल तो यह है कि आखिर विपक्षी दलों में अचानक हलचल क्यों मच गई है? नेताओं की भगदड़ क्यों चल रही है? उद्धव ठाकरे की शिवसेना में बगावत क्यों हो गई है? ममता बनर्जी की टीएमसी के सांसदों ने अलग राह क्यों पकड़ ली? दक्षिण भारत में डीएमके के भीतर बेचैनी की खबरें क्यों आ रही हैं? मध्यप्रदेश की एक राज्यसभा सीट के लिए बीजेपी ने इतनी ताकत क्यों झोंक दी थी?



इन तमाम मामलों को अलग-अलग देखने पर ये सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम लगते हैं, लेकिन जब इन्हें एक धागे में पिरोकर देखा जाता है तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। दरअसल, इन सबके पीछे पूरी कहानी संख्या बल की है। भाजपा और एनडीए का पूरा ध्यान सिर्फ सरकार चलाने पर नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में संसद में बड़े संवैधानिक बदलावों का रास्ता साफ करने पर भी है। यही वजह है कि अब गठबंधन का दायरा बढ़ाने की लगातार कोशिशें की जा रही हैं।राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि अभी तो यह शुरुआत भर है। आगे-आगे देखते जाइए, एनडीए बिल पास कराने के लिए बहुमत के करीब तक पहुंच सकता है।



कैसे शुरू हुई यह कहानी

इस खबर को समझने के लिए आपको थोड़ा पीछे चलना पड़ेगा। दरअसल, मोदी सरकार के एजेंडे में महिला आरक्षण प्रमुख है। इसे पूरी तरह लागू करने के लिए जरूरी परिसीमन प्रक्रिया सबसे अहम है। महिला आरक्षण कानून पहले ही पारित हो चुका है, पर इसके लागू होने की शर्त परिसीमन और नई जनगणना से जुड़ी हुई है। परिसीमन से संबंधित किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। यही वह गणित है, जिसने भाजपा और एनडीए को अपने राजनीतिक कुनबे को लगातार बढ़ाने के मिशन पर लगा दिया है।



पहले नहीं मिली थी सफलता

अप्रैल 2026 में जब मोदी सरकार ने संविधान संशोधन के लिए कदम बढ़ाने की कोशिश की थी, तब उसे पर्याप्त समर्थन नहीं मिला था। संविधान संशोधन के लिए लोकसभा की कुल 543 सीटों के दो तिहाई आंकड़े यानी 362 सांसदों का समर्थन जरूरी है, जबकि एनडीए का आंकड़ा उससे काफी नीचे यानी 293 था। यहीं से शुरू हुआ संख्या बल बढ़ाने का अभियान।



अब हालिया घटनाक्रम महाराष्ट्र में देखने को मिल रहा है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के नौ सांसदों में से छह सांसदों ने बगावत का रास्ता चुन लिया है। सूत्रों के अनुसार, इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भेजकर एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली शिवसेना में विलय की इच्छा जताई है। यदि यह प्रक्रिया पूरी होती है तो इसका सीधा फायदा एनडीए को मिलेगा, क्योंकि शिंदे गुट पहले से ही सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है।



पश्चिम बंगाल में सियासी हलचल तेज

पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी बड़ा बदलाव हो रहा है। विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की बड़ी हार के बाद पार्टी में बगावत हो गई है। अब टीएमसी के 28 सांसदों में से करीब 20 सांसद पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं। इन सांसदों ने एनडीए के प्रति नरम रुख अपनाते हुए समर्थन देने का ऐलान कर दिया है।



डीएमके की इंडिया गठबंधन से दूरी

तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस और डीएमके के बीच राजनीतिक विवाद गहरा गया है। डीएमके ने इंडिया गठबंधन से दूरी बना ली है। कांग्रेस द्वारा डीएमके का साथ छोड़कर सी. जोसेफ विजय की पार्टी 'टीवीके' के साथ सरकार में शामिल होने के फैसले को डीएमके ने 'विश्वासघात' करार दिया है। अब डीएमके के 22 सांसद एनडीए को समर्थन दे सकते हैं।



आप के सांसद बीजेपी में पहुंचे

पिछले तीन महीनों के राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर डालें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। विपक्षी खेमे के सांसद लगातार एनडीए का रुख कर रहे हैं। इनमें आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसद भी शामिल हैं। भाजपा और एनडीए की रणनीति सिर्फ लोकसभा तक सीमित नहीं है। राज्यसभा में भी संख्या बल मजबूत करने की कोशिशें लगातार जारी हैं, क्योंकि किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए दोनों सदनों में मजबूत समर्थन अनिवार्य होता है।



मध्यप्रदेश का चुनाव बड़ा उदाहरण

मध्यप्रदेश का हालिया राज्यसभा चुनाव इस रणनीति का सबसे चर्चित उदाहरण बन गया है। राजनीतिक अंकगणित के हिसाब से भाजपा दो सीटें आसानी से जीत सकती थी, लेकिन तीसरी सीट उसके लिए चुनौतीपूर्ण मानी जा रही थी। कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन को मैदान में उतारा था। इसके बाद जो घटनाक्रम हुआ, उसने सबको चौंका दिया।



कांग्रेस उम्मीदवार का नामांकन निरस्त हो गया और तीनों सीटें भाजपा के खाते में चली गईं। राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि भाजपा ने इस चुनाव के लिए इतनी व्यापक तैयारी कर रखी थी कि यदि नामांकन रद्द नहीं भी होता, तब भी क्रॉस वोटिंग के जरिए परिणाम अपने पक्ष में करने की रणनीति तैयार थी।



यही वजह है कि भाजपा के हर छोटे-बड़े राजनीतिक कदम को अब सिर्फ तत्काल चुनावी लाभ के नजरिए से नहीं देखा जा रहा। पार्टी की नजर उन बड़े विधेयकों पर है, जिनके लिए साधारण बहुमत नहीं बल्कि व्यापक समर्थन की जरूरत होगी। महिला आरक्षण को लागू करने से जुड़ी परिसीमन प्रक्रिया, संविधान संशोधन और अन्य बड़े विधायी एजेंडे इसी श्रेणी में आते हैं।



क्या है अभी अंकगणित

लोकसभा में वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो पिछले बिल पर हुई वोटिंग के हिसाब से एनडीए को 293 सांसदों का समर्थन है, जबकि इंडिया गठबंधन के 233 सांसद हैं। संविधान संशोधन के लिए अभी भी एनडीए को काफी दूरी तय करनी बाकी है। इसलिए भाजपा और एनडीए हर उस राजनीतिक अवसर को भुनाने की कोशिश में हैं, जिससे उनका संख्या बल बढ़ सके।



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