News Strike: Modi-Gandhi को ओपन बहस की सलाह,किन मुद्दों पर होगा सामना?

NewsStrike: 'द हिंदू' अखबार के पूर्व संपादक एन राम, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन लोकुर और दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एपी शाह ने दोनों नेताओं से ऐसे मंच पर सामने आने का निवेदन किया है जो गैर-व्यावसायिक और गैर-पक्षपातपूर्ण मंच हो।

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Jitendra Shrivastava
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BHOPAL. News Strikeप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ( Narendra Modi ) और राहुल गांधी ( Rahul Gandhi ) एक मंच पर आएंगे। जब ऐसा होगा तो दोनों किस मुद्दे पर सबसे ज्यादा बहस करेंगे। क्या दोनों के बीच सत्तर साल के कांग्रेस के शासन पर बहस होगी या फिर दोनों उन मुद्दों पर बात करेंगे। जिन पर बोलने के लिए राहुल गांधी हमेशा पीएम मोदी को उकसाते हैं। देश की तीन बड़ी हस्तियों ने दोनों राजनेताओं को एक मंच पर आकर खुली बहस ( open debate ) करने की सलाह दी है। ये तीन हस्तियां कौन हैं ये तो मैं आपको बताऊंगा ही। साथ में ये भी दो धुर विरोधी नेता किस मुद्दे पर बहस करेंगे। 

चुनाव में इस बार भाषण कम डिबेट ज्यादा नजर आ रही

राजनेताओं के चुनावी भाषण इस बार भाषण कम डिबेट ज्यादा नजर आ रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वाद विवाद के लिए आमतौर पर प्रत्याशी एक ही मंच पर दिखाई देते हैं, लेकिन इस बार डिबेट कुछ यूं है कि पीएम मोदी मंच पर कोई बयान देते हैं। मसलन मुसलमान, मंगलसूत्र या आरक्षण को लेकर उनका कोई बयान आता है। इसके बाद हर नेता उसी बयान पर डिबेट करता नजर आता है। इसके बाद राहुल गांधी कोई बयान देते हैं। हाल ही में पीएम मोदी ने भरे मंच से अडाणी और अंबानी का नाम लेकर राहुल गांधी से सवाल किया कि क्या आपको उनसे काला धन मिल गया। इसके जवाब में राहुल गांधी ने वीडियो रिलीज किया और पूछा कि क्या मोदी जी डर गए।

तीन दिग्गजों ने की राहुल-मोदी से ओपन बहस की मांग

इससे ये तो साफ हो रहा है कि दोनों नेता एक दूसरे को सुन रहे हैं और उस पर रिएक्ट भी कर रहे हैं, लेकिन आमने-सामने नहीं आ रहे। सोशल मीडिया पर भी चैनल इतने बंटे हुए दिखाई दे रहे हैं कि कोई हैंडल सिर्फ बीजेपी का पक्ष रखता है तो कोई हैंडल सिर्फ कांग्रेस की बात करता है और कुछ न्यूज चैनल्स का हाल तो आप देख ही सकते हैं। जिन्होंने न्यूज का वो हाल कर दिया है कि अब उन्हें सोशल मीडिया पर एक अलग नाम से ही पुकारा जाने लगा है। इन हालातों के बीच देश के तीन दिग्गज लोगों ने एक पत्र के जरिए दोनों नेताओं से ओपन बहस की मांग की है। 'द हिंदू' अखबार के पूर्व संपादक एन राम, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन लोकुर और दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एपी शाह ने दोनों नेताओं से ऐसे मंच पर आमने सामने आने का निवेदन किया है जो गैर-व्यावसायिक और गैर-पक्षपातपूर्ण मंच हो। पत्र में कहा गया है कि इस तरह की सार्वजनिक बहस न केवल जनता को शिक्षित करके, बल्कि एक स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र की सही छवि पेश करने के लिए भी एक बड़ी मिसाल कायम होगी। तीनों ने मोदी और राहुल गांधी से आग्रह किया है कि यदि उनमें से कोई भी भाग लेने के लिए उपलब्ध नहीं है तो बहस के लिए एक प्रतिनिधि को भी भेज सकते हैं। पत्र में कहा है कि रैलियों और सार्वजनिक संबोधनों के दौरान सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस दोनों के सदस्यों ने हमारे संवैधानिक लोकतंत्र के मूल से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे हैं। प्रधानमंत्री ने आरक्षण, आर्टिकल 370 और धन पुनर्वितरण पर कांग्रेस को सार्वजनिक रूप से चुनौती दी है।

खरगे भी दे चुके हैं मोदी को सार्वजनिक बहस की चुनौती

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने संविधान, चुनावी बॉन्ड योजना और चीन के प्रति सरकार की प्रतिक्रिया पर प्रधानमंत्री से सवाल किया है और उन्हें सार्वजनिक बहस की चुनौती भी दी है। उन्होंने कहा है कि जनता के सदस्य के रूप में हम चिंतित हैं कि हमने दोनों पक्षों से केवल आरोप और चुनौतियां सुनी हैं, लेकिन दोनों की और से कोई सार्थक प्रतिक्रिया नहीं मिली है। इसलिए दोनों को एक ओपन बहस करना चाहिए। जिसमें दोनों एक दूसरे के सामने हों। अब आपको ये बता दूं कि दो जज ये अपील कर रहे हैं वो कौन हैं। पहले बात करते हैं मदन भीम राओ लोकुर की। इस पद पर उनका सफर काफी लंबा है। सुप्रीम कोर्ट में वो 4 जून 2012 से जज रहे और 30 दिसंबर 2018 को बतौर सीनियर जज रिटायर हुए। इसके बाद वो फिजी के सुप्रीम कोर्ट के नोन रेसिडेंट जज पेनल का भी हिस्सा रहे। यहां ये भी बता दूं कि वो किसी फॉरेन कंट्री के जज रहने वाले पहले इंडियन हैं। पूर्व जज अजित प्रकाश शाह साल 2008 में दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बनाए गए। अपने रिटायरमेंट तक वो इसी पद पर रहे. इशके बाद वो ब्रॉडकास्टिंग कंटेंट कंप्लेंट काउंसिल के चेयरपर्सन भी रहे। 

कई बार कई नेताओं ने चुनौती दी है, लेकिन बहस हुई नहीं

अब ऐसी शख्सियतों की अपील अगर राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी स्वीकार करेंगे या नहीं ये तो कहा नहीं जा सकता, लेकिन इस पत्र कई मायनों में खास नजर आता है। आमने-सामने बहस का कॉन्सेप्ट पीएम पद के उम्मीदवार के लिए नया हो सकता है, लेकिन आम उम्मीदवारों के बीच अक्सर एक दूसरे को ऐसी चुनौती दी जाती रही है। हाल ही में स्मृति इरानी ने भी प्रियंका गांधी को ओपन बहस की चुनौती दी है। बमुश्किल दो से तीन दिन पहले उन्होंने कहा कि प्रियंका गांधी जिस चैनल में कहेंगी और जिस वक्त कहेंगी, वो उनके बताए मुद्दे पर बहस के लिए तैयार हैं। अप्रैल में बीजेपी के प्रत्याशी और केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने तिरुवंतपुरम के कांग्रेस उम्मीदवार शशि थरूर को ओपन बहस की चुनौती दी। जिसके जवाब में थरूर ने चैलेंज एक्सेप्ट किया बस शर्त ये रखी कि ये ओपन बहस पॉलीटिक्स, विकास, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और उनके क्षेत्र के विकास पर होगी। हालांकि, दोनों ही मामलों में बस चुनौती दी भर गई है या एक्सेप्ट की गई है। लेकिन बहस हुई नहीं है।

डिबेट की परंपरा अमेरिकी चुनाव में एक आम परंपरा है

आपको बता दूं कि ओपन डिबेट की बात भारत में नई लग सकती है। क्योंकि इससे पहले कभी कोई कैंडिडेट इस तरह खुलेआम ओपन मंच पर बहस करते नजर नहीं आया, लेकिन अमेरिकी चुनाव में ये एक बहुत आम परंपरा है। अमेरिका में जब भी प्रेसिडेंट का चुनाव होता है तब राष्ट्रपति पद के प्रत्याशियों को एक या उससे ज्यादा बार ओपन बहस करनी पड़ती है। ये अमेरिका की कोई संवैधानिक प्रक्रिया नहीं है। लेकिन इसका चलन अब इतना बढ़ चुका है कि ये इलेक्शन प्रोसेस का जरूरी हिस्सा बन चुकी है।  इस तरह की ओपन बहस प्रत्याशियों के तय होने के बाद होती है। जिसके लिए प्रत्याशी किसी यूनिवर्सिटी के मैदान में या किसी ऑडिटोरियम में आमने सामने होते हैं। ये माना जाता है कि इस तरह की डिबेट ऐसे वोटर्स को फैसला लेने में मदद करती है जो अपने वोट को लेकर कंफ्यूज है। पत्र लिखने वाली तीन हस्तियों का मानना है कि इस बार देश में भी यही हालात हैं इसलिए ओपन डिबेट होनी चाहिए।

डिबेट की तैयारी और कॉन्फिडेंस से तय होगा फायदा-नुकसान

इस ओपन डिबेट से होगा क्या। क्या आपको लगता है कि इससे चुनावी माहौल पर कुछ असर पड़ेगा। जी हां जनाब बिलकुल पड़ेगा। फायदा किसी होगा नुकसान किसे होगा ये तो डिबेट में दोनों की तैयारी और कॉन्फिडेंस से ही तय होगा, लेकिन इतना जरूर है कि राहुल गांधी अगर पीएम मोदी के सामने फुल कॉन्फिडेंस के साथ उतरते हैं तो वो अपनी सोशल मीडिया पर गढ़ी गई पप्पू वाली इमेज को बदल भी सकते हैं। पीएम मोदी पर जो आरोप लगते हैं कि सवालों से डरते हैं और टेली प्रोम्पटर से ही पढ़ते हैं। पीएम भी इन आरोपों को झूठा साबित कर सकते हैं। 

डिबेट से ये साफ हो जाएगा कि मुद्दों पर पकड़ किसकी मजबूत है

ये भी संभव है कि राहुल गांधी पीएम मोदी से उनके मुस्लिम, मंगलसूत्र, भैस और नस्लीय टिप्पणी जैसे आरोपों पर चर्चा कर सकें और पीएम मोदी कांग्रेस की ओर से हर बार हो रहे रोजगार और महंगाई के सवाल पर कोई ठोस जवाब दे सकें। फिलहाल बीजेपी राम मंदिर, धारा 370 और तुष्टिकरण के मुद्दे के इर्दगिर्द घूम रही है तो राहुल गांधी सिर्फ महंगाई और रोजगार के मुद्दे पर सवाल कर रहे हैं और भ्रष्टाचार को मुद्दा बना रहे हैं। एक डिबेट से ये साफ हो जाएगा कि किसी अपने मुद्दों पर पकड़ मजबूत है। बात सिर्फ दो पूर्व जज की नहीं है बहस होती है तो यकीनन मतदाता भी इसमें पूरी दिलचस्पी जरूर लेगा।

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