अल नीनो से बिगड़ा मौसम का मिजाज, दिसंबर-जनवरी में भी सताएगी गर्मी, 2027 में पानी-अनाज की किल्लत का खतरा
Kaushiki | Nov 03, 2026, 09:22 IST
अल नीनो के कारण 2027 में गर्मी, पानी और अनाज का संकट बढ़ने की आशंका
El Nino Impact: सर्दी आने वाली है, लेकिन इस बार ठंड का इंतजार शायद लंबा होगा। प्रशांत महासागर से उठे अल नीनो ने भारत के मौसम का पूरा खेल बदल दिया है। पहले इसने मानसून को कमजोर किया, फिर खेतों पर असर डाला। अब आशंका है कि दिसंबर-जनवरी में भी पंखा चलाने की नौबत आ जाए।
अल नीनो के कारण मानसून कमजोर पड़ने के बाद अब सर्दियों में भी सामान्य से ज्यादा गर्मी रहने की आशंका जताई गई है। इसका असर खेती, पानी की उपलब्धता और खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर पड़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम (World Food Programme) की चेतावनी के मुताबिक, 2027 के अंत तक दुनिया के 45 देशों में गंभीर भोजन संकट का सामना करने वाले लोगों की संख्या 27.4 करोड़ तक पहुंच सकती है। यह असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं है। थाली, पानी और सेहत पर भी इसका सीधा असर दिख रहा है। आइए, समझते हैं कि सुपर अल नीनो भारत को किस तरह प्रभावित कर रहा है।
अल नीनो एक प्राकृतिक मौसमी घटना है। इसमें प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इससे दुनिया के कई देशों के मौसम में बदलाव देखने को मिलता है।
भारत में अल नीनो का असर मुख्य रूप से मानसून पर पड़ सकता है। बारिश कम होने से खेतों में पानी की कमी हो जाती है और फसलों की पैदावार प्रभावित होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, जून से सितंबर 2026 के बीच भारत में सामान्य से 12.6% कम बारिश हुई। इस दौरान 868.6 मिलीमीटर के औसत के मुकाबले केवल 759.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई।
कम बारिश का सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ सकता है। खेतों में पर्याप्त पानी नहीं मिलने से धान, दाल और मक्के जैसी फसलों के उत्पादन में गिरावट आने का खतरा है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि मक्के का उत्पादन 28 से 32 प्रतिशत, धान और चावल का उत्पादन 12 से 18 प्रतिशत तथा दालों का उत्पादन 14 से 17 प्रतिशत तक घट सकता है।
अब सर्दियों में भी तापमान ज्यादा रहने की आशंका है। इससे गेहूं, सरसों और चने जैसी रबी फसलों को नुकसान पहुंच सकता है। मिट्टी में पहले से नमी कम है। ऐसे में गर्मी बढ़ने से किसानों के लिए सिंचाई की जरूरत और बढ़ सकती है।
फसलों का उत्पादन कम होने पर बाजार में अनाज की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ने की आशंका है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में Food Inflation यानी खाद्य महंगाई में 3 से 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन, संघर्ष और खाद की कमी के कारण चावल की कीमतों में 50 प्रतिशत, गेहूं में 37 प्रतिशत और सोयाबीन में 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है।
अल नीनो का असर केवल बारिश तक सीमित नहीं है। नवंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच देश के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान रहने की आशंका जताई गई है। इसका मतलब है कि दिसंबर और जनवरी में भी लोगों को सामान्य से कम ठंड महसूस हो सकती है। उत्तर भारत के पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी कम होने का खतरा भी बताया गया है।
मौसम संबंधी अनुमानों के मुताबिक, फरवरी 2027 से ही गर्मियों जैसे हालात बनने की संभावना है। साल 2027 दुनिया के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हो सकता है।
कम बारिश से देश के कई जलाशयों में पानी का स्तर प्रभावित हुआ है। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक 8 अक्टूबर 2026 के 178 प्रमुख जलाशयों में पानी का स्टोरेज टोटल कैपेसिटी का 78.71 प्रतिशत था। जबकि सामान्य स्तर 87.08 प्रतिशत बताया गया है।
दक्षिण भारत की स्थिति ज्यादा चिंताजनक बताई गई है। यहां जलाशयों में पानी का स्तर 47.22 प्रतिशत और उत्तरी क्षेत्र में 58.63 प्रतिशत दर्ज किया गया। पानी की कमी का असर खेती के साथ पीने के पानी की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में सूखे की घोषणा की गई है। महाराष्ट्र के करीब 75 प्रतिशत हिस्से में सूखा घोषित किए जाने की जानकारी दी गई है। सूखे के कारण किसानों को फसलों के नुकसान, पशुओं के चारे की कमी और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
अल नीनो के कारण बढ़ने वाली गर्मी लोगों की सेहत पर भी असर डाल सकती है। तेज गर्मी से हीट स्ट्रोक, शरीर में पानी की कमी और थकावट जैसी परेशानियां बढ़ सकती हैं। इसके अलावा मौसम में बदलाव से डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया और जीका जैसी मच्छरजनित बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है।
Health Risk को लेकर सामने आए अनुमानों के मुताबिक, शिकागो विश्वविद्यालय की क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब ने सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच भारत में लगभग 15 हजार 800 अतिरिक्त मौतों की आशंका जताई है।
वहीं, लैंसेट काउंटडाउन के हवाले से मार्च 2027 तक भारत में 55 हजार और पूरी दुनिया में 8.57 लाख अतिरिक्त मौतों का अनुमान बताया गया है। ये केवल संभावित आंकड़े हैं, वास्तविक मौतों की संख्या नहीं।
जलवायु संकट का असर गरीब परिवारों, महिलाओं और बच्चों पर अधिक पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, सूखा, बाढ़ और भोजन की कमी से महिलाओं की परेशानियां बढ़ सकती हैं।
आर्थिक संकट के कारण लड़कियों की पढ़ाई प्रभावित होने, बाल विवाह और घरेलू हिंसा का खतरा बढ़ने की भी आशंका जताई गई है। गर्भवती महिलाओं के लिए अत्यधिक गर्मी स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ा सकती है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की रिपोर्ट के बताती है कि अल नीनो के फरवरी 2027 तक सक्रिय रहने की लगभग 100 प्रतिशत संभावना जताई हो सकती है। दिसंबर 2026 के आसपास इसके सबसे मजबूत स्थिति में पहुंचने का अनुमान है। इसके बाद भी फरवरी से जुलाई 2027 तक अधिक गर्मी का खतरा बना रह सकता है।
आमतौर पर अल नीनो 9 से 18 महीने तक सक्रिय रहता है और हर 2 से 7 साल में यह घटना दोबारा हो सकती है। भारत में इससे पहले 1982, 1987, 2002, 2009 और 2015 में अल नीनो के दौरान सूखे जैसी परिस्थितियां देखने को मिली थीं। हालांकि, हर बार अल नीनो आने का मतलब सूखा पड़ना नहीं होता। बारिश और तापमान पर कई दूसरे मौसमी कारकों का भी असर पड़ता है।
तो कुल मिलाकर, अल नीनो के कारण भारत में आने वाले महीनों में गर्मी, खेती और पानी से जुड़ी परेशानियां बढ़ने की आशंका है। यदि फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है तो आम लोगों को महंगाई का सामना भी करना पड़ सकता है। हालांकि, ये सभी भविष्य से जुड़े अनुमान हैं और वास्तविक स्थिति आने वाले मौसम पर निर्भर करेगी।
FAQs:
संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम (World Food Programme) की चेतावनी के मुताबिक, 2027 के अंत तक दुनिया के 45 देशों में गंभीर भोजन संकट का सामना करने वाले लोगों की संख्या 27.4 करोड़ तक पहुंच सकती है। यह असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं है। थाली, पानी और सेहत पर भी इसका सीधा असर दिख रहा है। आइए, समझते हैं कि सुपर अल नीनो भारत को किस तरह प्रभावित कर रहा है।
क्या है अल नीनो और क्यों बढ़ रही परेशानी?
भारत में अल नीनो का असर मुख्य रूप से मानसून पर पड़ सकता है। बारिश कम होने से खेतों में पानी की कमी हो जाती है और फसलों की पैदावार प्रभावित होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, जून से सितंबर 2026 के बीच भारत में सामान्य से 12.6% कम बारिश हुई। इस दौरान 868.6 मिलीमीटर के औसत के मुकाबले केवल 759.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई।
गेहूं, धान और दालों की पैदावार घटने की आशंका
अब सर्दियों में भी तापमान ज्यादा रहने की आशंका है। इससे गेहूं, सरसों और चने जैसी रबी फसलों को नुकसान पहुंच सकता है। मिट्टी में पहले से नमी कम है। ऐसे में गर्मी बढ़ने से किसानों के लिए सिंचाई की जरूरत और बढ़ सकती है।
खाने-पीने की चीजें हो सकती हैं महंगी
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन, संघर्ष और खाद की कमी के कारण चावल की कीमतों में 50 प्रतिशत, गेहूं में 37 प्रतिशत और सोयाबीन में 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है।
दिसंबर और जनवरी में भी कम पड़ सकती है ठंड
मौसम संबंधी अनुमानों के मुताबिक, फरवरी 2027 से ही गर्मियों जैसे हालात बनने की संभावना है। साल 2027 दुनिया के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हो सकता है।
देश के जलाशयों में भी घट रहा पानी
दक्षिण भारत की स्थिति ज्यादा चिंताजनक बताई गई है। यहां जलाशयों में पानी का स्तर 47.22 प्रतिशत और उत्तरी क्षेत्र में 58.63 प्रतिशत दर्ज किया गया। पानी की कमी का असर खेती के साथ पीने के पानी की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है।
पांच राज्यों में सूखे की घोषणा
बढ़ती गर्मी से स्वास्थ्य को भी खतरा
Health Risk को लेकर सामने आए अनुमानों के मुताबिक, शिकागो विश्वविद्यालय की क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब ने सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच भारत में लगभग 15 हजार 800 अतिरिक्त मौतों की आशंका जताई है।
वहीं, लैंसेट काउंटडाउन के हवाले से मार्च 2027 तक भारत में 55 हजार और पूरी दुनिया में 8.57 लाख अतिरिक्त मौतों का अनुमान बताया गया है। ये केवल संभावित आंकड़े हैं, वास्तविक मौतों की संख्या नहीं।
महिलाओं और बच्चों पर ज्यादा असर पड़ने की आशंका
आर्थिक संकट के कारण लड़कियों की पढ़ाई प्रभावित होने, बाल विवाह और घरेलू हिंसा का खतरा बढ़ने की भी आशंका जताई गई है। गर्भवती महिलाओं के लिए अत्यधिक गर्मी स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ा सकती है।
कब तक रहेगा अल नीनो का असर?
आमतौर पर अल नीनो 9 से 18 महीने तक सक्रिय रहता है और हर 2 से 7 साल में यह घटना दोबारा हो सकती है। भारत में इससे पहले 1982, 1987, 2002, 2009 और 2015 में अल नीनो के दौरान सूखे जैसी परिस्थितियां देखने को मिली थीं। हालांकि, हर बार अल नीनो आने का मतलब सूखा पड़ना नहीं होता। बारिश और तापमान पर कई दूसरे मौसमी कारकों का भी असर पड़ता है।
तो कुल मिलाकर, अल नीनो के कारण भारत में आने वाले महीनों में गर्मी, खेती और पानी से जुड़ी परेशानियां बढ़ने की आशंका है। यदि फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है तो आम लोगों को महंगाई का सामना भी करना पड़ सकता है। हालांकि, ये सभी भविष्य से जुड़े अनुमान हैं और वास्तविक स्थिति आने वाले मौसम पर निर्भर करेगी।
FAQs:
- अल नीनो का प्रभाव भारत में किस तरह से महसूस किया जा रहा है?
अल नीनो के कारण भारत में मानसून कमजोर पड़ा है, जिससे बारिश की मात्रा सामान्य से 12.6% कम हुई है। इसका सीधा असर कृषि उत्पादन, पानी की उपलब्धता और खाद्य महंगाई पर पड़ सकता है। - अल नीनो के चलते खाद्य महंगाई पर क्या असर पड़ेगा?
अल नीनो से फसलों के उत्पादन में गिरावट आने की आशंका है, जिससे खाद्य महंगाई 3 से 5 प्रतिशत बढ़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और खाद की कमी के चलते चावल, गेहूं और सोयाबीन की कीमतों में भी वृद्धि हुई है। - अल नीनो के कारण सर्दियों में भारत में तापमान में कैसे बदलाव आएगा?
अल नीनो के चलते नवंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच भारत के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान रहने की आशंका जताई गई है, जिससे दिसंबर और जनवरी में भी कम ठंड महसूस हो सकती है।
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