सबरीमाला केस: हिंदू धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं, यह जीवन जीने का तरीका -सुप्रीम कोर्ट
Pawan Modiya | May 13, 2026, 18:20 IST
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सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला सुनवाई में कहा कि हिंदू धर्म जीवन जीने का तरीका है। मंदिर जाना या अनुष्ठान करना हिंदू बने रहने के लिए जरूरी नहीं, घर में दीपक जलाना भी आस्था का सबूत है।
समझें क्या है पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी
यह टिप्पणी उस वक्त आई जब देश की सबसे बड़ी अदालत में धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश से जुड़े मामलों की सुनवाई चल रही थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान पीठ ने यह बात कही। इस पीठ में जस्टिस बी वी नागरत्ना, एम एम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमल्या बागची भी शामिल हैं।
नौ जजों की पीठ क्यों?
उस फैसले के बाद केरल में बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। इसके बाद यह मामला नौ जजों की बड़ी पीठ को सौंपा गया। अब यह पीठ सबरीमाला के फैसले के साथ-साथ धार्मिक स्वतंत्रता और समानता से जुड़े व्यापक सवालों पर भी सुनवाई कर रही है।
1966 के फैसले का जिक्र, उठे नए सवाल
डॉ. गोपाल ने सवाल उठाया कि क्या आज हर वह व्यक्ति जो खुद को हिंदू मानता है, सच में वेदों को सर्वोच्च मानता है? उनका तर्क था कि समाज की असलियत इस परिभाषा से कहीं ज्यादा विस्तृत और अलग है। धार्मिक समुदायों के भीतर से भी सामाजिक न्याय की मांग लगातार उठ रही है।
जस्टिस नागरत्ना का जवाब
यह टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है। इससे यह साफ होता है कि धर्म के पालन का कोई एक तय तरीका नहीं होता।
'झोपड़ी में दीपक भी है आस्था का सबूत'
यह टिप्पणी उन लाखों गरीब और साधारण लोगों के लिए भी राहत की बात है जो महंगे अनुष्ठानों या तीर्थयात्रा का खर्च नहीं उठा सकते।
हर धार्मिक मामले पर याचिका नहीं
क्या है सबरीमाला विवाद
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धर्म और कानून का नाजुक संतुलन
नौ जजों की संविधान पीठ का यह फैसला आने वा ले समय में देश की धार्मिक-कानूनी व्यवस्था को एक नई दिशा दे सकता है।
यह खबर क्यों जरूरी है?
जरूरी FAQ
2018 में पांच जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को 4-1 के बहुमत से असंवैधानिक करार दिया था। उस फैसले के बाद विभिन्न पक्षों ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर कीं। इस पर विचार करते हुए पांच जजों की पीठ ने माना कि इस मामले में धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और संविधानिक नैतिकता जैसे बड़े और पेचीदे सवाल उठते हैं। इसलिए इसे नौ जजों की बड़ी संविधान पीठ को सौंपा गया ताकि इन सवालों पर व्यापक और अधिकृत राय आ सके।
क्या सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का मतलब है कि मंदिर जाना गलत है?
नहीं, बिल्कुल नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि मंदिर जाना गलत है या इसे बंद किया जाए। कोर्ट ने सिर्फ यह स्पष्ट किया है कि मंदिर जाना या कोई खास अनुष्ठान करना किसी व्यक्ति के हिंदू होने की अनिवार्य शर्त नहीं है। हिंदू धर्म की विविधता और व्यापकता ऐसी है कि हर व्यक्ति अपनी आस्था अपने तरीके से व्यक्त कर सकता है। जस्टिस नागरत्ना ने इसीलिए कहा कि इसे जीवन जीने का तरीका कहा जाता है।
सबरीमाला मंदिर विवाद क्या है और यह महिलाओं से कैसे जुड़ा है?
केरल का सबरीमाला मंदिर भगवान अयप्पा को समर्पित है। यहां पारंपरिक रूप से 10 से 50 साल की महिलाओं का प्रवेश वर्जित था। धार्मिक मान्यता थी कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं इसलिए इस आयु वर्ग की महिलाएं मंदिर नहीं जा सकतीं। 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने इस प्रतिबंध को महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए असंवैधानिक करार दिया। इसके बाद यह मामला बड़े पैमाने पर विवादित हो गया। अब नौ जजों की पीठ इस पर और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक सवालों की सुनवाई कर रही है।
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