वृंदावन के निधि वन में विराजे थे ठाकुरजी, औरंगजेब के हमले से बचाने राजस्थान ले गए थे पुजारी
वृंदावन की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों में गूंजती भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं की स्मृति आज एक विवाद की परछाई में घिर गई है। उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना बांके बिहारी मंदिर कॉरिडोर अब सिर्फ एक विकास परियोजना नहीं, बल्कि धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक टकराव का प्रतीक बनती जा रही है।
अब इस आधुनिकीकरण को गोस्वामी समाज सीधे तौर पर वृंदावन की आत्मा पर हमला बता रहा है। गोस्वामियों का कहना है कि मंदिर वृंदावन की जीवंत परंपरा है। उन्होंने प्रशासन को स्पष्ट कर दिया है कि यदि सरकार जबरदस्ती करेगी तो वे ठाकुरजी को लेकर यहां से पलायन कर जाएंगे।
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ठाकुरजी की 7 बार स्थापना
इस विरोध के पीछे सिर्फ वर्तमान भावनाएं नहीं, पांच शताब्दियों की परंपरा भी खड़ी है। बांके बिहारी जी की मूर्ति का वर्तमान मंदिर 1864 में स्थापित हुआ था, लेकिन इससे पहले ठाकुरजी कई बार अलग-अलग स्थानों पर विराजमान रहे।
कुल मिलाकर सात स्थानों पर ठाकुरजी की स्थापना हुई। हर बार संकट में उनके सेवायत पुजारियों ने मूर्ति को सुरक्षित स्थान पर विराजमान कराया। गोस्वामी समाज इसी परंपरा का हवाला देते हुए कह रहा है कि अगर वृंदावन में व्यवस्था नहीं रही, तो इतिहास की पुनरावृत्ति होगी।
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सेवायतों की चेतावनी, हम पलायन को तैयार
मथुरा जिला प्रशासन के साथ हालिया बातचीत में गोस्वामी समाज ने विरोध दर्ज कराया है। इधर, सरकार की ओर से कहा गया है कि कॉरिडोर से श्रद्धालुओं को राहत मिलेगी। मंदिर तक पहुंचने वाले संकरे रास्तों में अक्सर भारी भीड़ के कारण हादसे होते हैं। रंग भरनी एकादशी, होली, जन्माष्टमी जैसे पर्वों पर यहां लाखों भक्त उमड़ते हैं। ऐसे में सुव्यवस्थित कॉरिडोर जरूरी कदम है।
सरकार यह भी कह रही है कि दुकानदारों और मकान मालिकों को मुआवजा दिया जाएगा। दुकान के बदले दुकान भी दी जाएगी, लेकिन सेवायतों को ट्रस्ट के गठन पर ऐतराज है।
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