रामायणनामा : हनुमान जी के वजन से पाताल में जा धंसा था विशाल पर्वत, गर्जना से गिर गए राक्ष​सों की पत्नियों के गर्भ

लंकिनी बोली, हनुमान जी! अयोध्या के राजा श्री रघुनाथजी को हृदय में बसाकर लंका में प्रवेश कीजिए और अपना काम कीजिए। इसके बाद हनुमान जी ने बहुत छोटा रूप बनाया और लंका के भीतर दाखिल हो गए। 

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Sandeep Kumar
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रविकांत दीक्षित @.सुंदरकाण्ड: लंका पहुंचकर हनुमान जी सीता जी से ​मिले, अशोक वन उजाड़ा, रावण के पुत्र को मारा और लंका जलाई 

रामायण नामा: भाग 5

श्री रामचरित मानस का सुंदरकाण्ड मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का 'कंठ' स्वरूप है। मानस में वर्णित पांचवें सौपान 'सुंदरकाण्ड' में हम आपको बताने जा रहे हैं हनुमान जी का लंका जाना, उनकी सुरसा से भेंट, छाया पकड़ने वाली राक्षसी का वध। फिर लंकिनी का वध करके हनुमान जी का लंका में प्रवेश करना और उनकी विभीषण से मुलाकात से लेकर सीता जी से संवाद और अंत में लंका दहन तक की दास्तां...।

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्‌।

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।। 

यानी

अतुलित बल के धाम, सुमेरु पर्वत के समान विशाल, ज्ञानियों में अग्रगण्य, सभी गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्री रघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्री हनुमान जी महाराज को मैं प्रणाम करता हूं। 



अब सुंदरकाण्ड...



जामवंत के बचन सुहाए, सुनि हनुमंत हृदय अति भाए। 

तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई, सहि दुख कंद मूल फल खाई॥ 

यानी...हनुमान जी को जाम्बवान जी की बात अच्छी लगी। उन्होंने कहा, हे भाई! तुम दुःख सहकर, कन्द-मूल-फल खाकर मेरी राह देखना। मैं जल्द ही सीता जी से भेंट करके लौट आऊंगा। 

यहां से प्रभु श्रीराम का नाम लेकर हनुमान जी लंका के लिए रवाना हो गए। हनुमान जी एक पर्वत पर पैर रखकर उछले। उनके बल से वह पर्वत पाताल में जा धंसा। समुद्र ने हनुमान जी को श्री रघुनाथ जी का दूत समझकर मैनाक पर्वत से कहा कि हे मैनाक! तू इन्हें ​थोड़ा आराम करने दे। 

रामायणनामा : सुंदरकांड भाग 5

हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहां बिश्राम॥ 



यानी हनुमान जी ने उसे हाथ से छुआ और बोले, भाई! श्री रामचंद्र जी का काम किए बिना मुझे विश्राम कहां? यह कहकर हनुमान जी आगे बढ़ गए। रास्ते में देवताओं ने उनकी परीक्षा लेने के लिए सांपों की मां सुरसा को भेज दिया। सुरसा बोली, आज देवताओं ने मुझे भोजन दिया है। यह सुनकर हनुमान जी ने कहा, मैं रामकाज के लिए जा रहा हूं, लौटकर आऊं तो मुझे खा लेना। अभी मुझे जाने दो। जब सुरसा नहीं मानी तो हनुमान जी ने कहा, ठीक है मुझे खा लो। सुरसा ने योजनभर (चार कोस में) मुंह फैलाया। तब हनुमान जी ने अपने शरीर को उससे दोगुना बड़ा कर लिया। उसने सोलह योजन का मुख किया। हनुमान जी तुरंत बत्तीस योजन के हो गए। जैसे—जैसे सुरसा मुंह बढ़ाती, हनुमान जी उससे दोगुना बड़े होते जाते। अंत में सुरसा ने सौ योजन (चार सौ कोस) में मुंह फैला लिया। तब हनुमान जी ने छोटा रूप धारण किया। वे उसके मुंह में घुसकर तुरंत बाहर निकल आए। यह देखकर सुरसा ने कहा कि मैंने तुम्हारे बुद्धि-बल का भेद पा लिया, इसी परीक्षा के लिए देवताओं ने मुझे भेजा था। इसके बाद हनुमान जी आगे बढ़ गए। रास्ते में उन्हें परछाईं को पकड़ लेने वाली राक्षसी मिली। उसने हनुमान जी के साथ भी छल किया, पर राम भक्त हनुमान जी सब समझ गए और उन्होंने राक्षसी को मार दिया। 

राक्षसों के घर में मंदिर देख चौंके हनुमान जी 

अब हनुमान जी लंका से ठीक पहले पहुंच गए थे। उन्होंने एक पर्वत पर चढ़कर लंका को देखा। भयंकर शरीर वाले करोड़ों योद्धा लंका की सुरक्षा में मुस्तैद थे। यह देखकर हनुमान जी ने रात में लंका में प्रवेश करने की योजना बनाई। लंका के दरवाजे पर लंकिनी नाम की राक्षसी मिली। उसने कहा, मुझसे बिना पूछे कहां जा रहे हो? हनुमान जी ने उसे एक मुक्का मारा तो वह जमीन पर गिर पड़ी। फिर उस राक्षसी ने कहा...

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा, हृदयं राखि कोसलपुर राजा।

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई, गोपद सिंधु अनल सितलाई॥ 

अर्थात् लंकिनी बोली— हनुमान जी! अयोध्या के राजा श्री रघुनाथजी को हृदय में बसाकर लंका में प्रवेश कीजिए और अपना काम कीजिए।  

इसके बाद हनुमान जी ने बहुत छोटा रूप बनाया और लंका के भीतर दाखिल हो गए। उन्होंने एक-एक कर सारे महल देखे। फिर वे रावण के महल में पहुंचे। थोड़े आगे बढ़े तो उन्हें एक मंदिर नजर आया। हनुमान जी सोच में पड़ गए। उन्होंने देखा कि लंका राक्षसों का घर है। यहां साधु का निवास क्यों है? हनुमान जी यह सब सोच ही रहे थे, उसी वक्त विभीषण नींद से जाग गए। विभीषण ने राम नाम का स्मरण किया। यहां हनुमान जी ने ब्राह्मण का रूप बनाया और विभीषण से मिले। हनुमान जी ने विभीषण को पूरी क​था सुनाई। इस पर विभीषण ने सीता जी की जानकारी दी, तब हनुमान जी विदा लेकर अशोक वाटिका पहुंचे। वहां उन्होंने छिपकर सीता जी को देखा। इस बीच रावण ने आकर सीता जी को धमकाया, पर वे अडिग रहीं। रावण अब चला गया था। सीता जी हाथ जोड़कर त्रिजटा से बोलीं- हे माता! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर, जिससे मैं शरीर छोड़ सकूं। अब यह सहा नहीं जाता। त्रिजटा ने उन्हें समझाया। हनुमान जी यह सब देख रहे थे। 

अक्षय कुमार सहित कई राक्षस मारे गए 

त्रिजटा के जाने के बाद हनुमान जी ने राम जी की दी हुई अंगूठी सीता जी के सामने फेंक दी। सीता जी ने अंगूठी को तुरंत पहचान लिया। इसी बीच हनुमान जी ने प्रभु श्रीराम का गुणगान शुरू कर दिया और सीता जी के सामने प्रकट हो गए। 

अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई, प्रभु आयुस नहिं राम दोहाई।

कछुक दिवस जननी धरु धीरा, कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥

हनुमान जी ने कहा, हे माता! मैं आपको अभी यहां से ले चलुं पर राम जी की आज्ञा नहीं है। आप कुछ दिन और विश्वास रखिए, राम जी वानरों के साथ यहां आएंगे और राक्षसों को मारकर आपको ले जाएंगे। हनुमान जी का छोटा रूप देखकर सीता जी को आश्चर्य हुआ। यह जानकर हनुमान जी ने पर्वत के समान रूप बना लिया। उन्होंने पूछा, हे माता! आपकी आज्ञा हो तो मैं फल खा लूं। सीता जी के हां कहते ही हनुमान जी बाग में घुस गए। फल खाए और वृक्षों को तोड़ने लगे। राक्षस पहुंचे तो उन्हें मार दिया। यहां से कुछ राक्षसों ने हनुमान जी के आने की खबर रावण को दी। रावण ने कई योद्धा भेजे, लेकिन हनुमान जी से सबको मार दिया। फिर रावण ने अक्षय कुमार को भेजा, पर वह भी हनुमान जी के हाथ से मार गया। पुत्र के वध से रावण क्रोध से भर गया। उसने मेघनाद को भेजा। मेघनाद इससे पहले देवराज इंद्र को भी हरा चुका था। मेघनाद की सेना को हनुमान जी ने खत्म कर दिया। इस पर उसने ब्रह्मास्त्र चलाया। ब्रह्मास्त्र देखकर हनुमान जी ने कुछ नहीं किया। बाण लगने पर वे र गए। इसके बाद राक्षसों ने नागपाश से बांध दिया और रावण की सभा में ले आए।  

चूड़ामणि लेकर लौटे हनुमान जी 

हनुमान जी को देखकर रावण खूब हंसा। फिर हनुमान जी से परिचय पूछा। इस पर उन्होंने बताया कि जिन राम जी की प्रिय पत्नी को तुम हर लाए हो, मैं उन्हीं का दूत हूं। यह सुनते ही राक्षस हनुमान जी को मारने दौड़े। उसी वक्त विभीषण सभा में आए। उन्होंने कहा दूत को मारना ठीक नहीं है। यह सुनते ही रावण हंसकर बोला- अच्छा तो, बंदर को अंग-भंग करके भेज दो। बंदर को अपनी पूंछ बहुत प्यारी होती है, इसीलिए उसमें आग लगा दी जाए। रावण की बात सुनकर राक्षसों ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगा दी। इस पर हनुमान जी ने राम नाम का उद्घोष किया और पूरी लंका में आग लगा दी। यहां से वे छोटा रूप धारण कर अशोक वन पहुंचे और सीता जी से विदा मांगी। 

हनुमान जी ने कहा, हे माता! मुझे कोई चिह्न (पहचान) दे दीजिए, तब सीता जी ने चूड़ामणि उतारकर उन्हें दी। इसके बाद हनुमान जी ने भयंकर गर्जना की, जिसे सुनकर राक्षसों की स्त्रियों के गर्भ गिरने लगे। समुद्र लांघकर वे इस पार आए और उन्होंने राम जी को लंका के सब घटनाक्रम बताए। तब रघुनाथ जी ने कपिराज सुग्रीव को बुलाया और कहा कि लंका चलने की तैयारी करो।  सुग्रीव ने सेना तैयार की और सब चल पड़े। हाथी चिंग्घाड़ने लगे। पृथ्वी डोलने लगी। पर्वत कांप उठे। समुद्र खलबलाने लगे। गंधर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सब के सब मन हर्षित हुए। करोड़ों वानर योद्धा दौड़ते जा रहे थे। इस तरह राम जी समुद्र तट पर जा पहुंचे। 

लंकेश ने नहीं मानी मंदोदरी की बात 

इधर, लंका दहन के बाद मंदोदरी ने रावण को खूब समझाया कि राम जी से बैर मत करिए, लेकिन अहंकारी रावण नहीं माना। लंका में फिर सभा लगी। विभीषण ने भी लंकेश को समझाने की कोशिश की, पर बात नहीं बनी। उलटा रावण ने कहा— हे विभीषण! तुम मेरे नगर में रहकर तपस्वियों से प्रेम करते हो। यह कहते हुए रावण ने विभीषण को लात मार दी। अपना अपमान सहकर विभीषण राम जी से जा मिले। उन्होंने राम जी को सारी कथा कह सुनाई। अब राम जी ने वानरराज सुग्रीव और विभीषण से समुद्र पार करने को लेकर चर्चा की। तय हुआ कि समुद्र से ही विनती कर रास्ता मांगा जाए, लेकिन लक्ष्मण जी को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने कहा, राम जी एक बाण से समुद्र को सुखा दीजिए, पर राम जी ने समुद्र से विनती की। इधर, रावण ने विभीषण के पीछे कुछ राक्षस दूत भेजे थे, उन्होंने यहां आकर वानर का रूप धारण कर लिया था। जब पता लगा तो वानरों ने उन्हें खूब पीटा। बाद में राम जी की ​भक्ति देखकर वे भी राममय हो गए और लक्ष्मण जी का पत्र लेकर लंका लौट गए। लंका पहुंचकर दूत ने लक्ष्मण जी का पत्र रावण को दिया, जिसमें लिखा था कि अरे मूर्ख! केवल बातों से मन को रिझाकर अपने कुल को नष्ट-भ्रष्ट मत कर। राम जी से विरोध करके तू विष्णु, ब्रह्मा और महेश की शरण जाने पर भी नहीं बचेगा। यह सुनकर रावण क्रोध से भर गया। 



बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।

बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।। 

यानी इधर तीन दिन बीत गए, लेकिन समुद्र ने राम जी की विनती नहीं सुनी। तब क्रोध में वे बोले कि बिना भय के प्रीति नहीं होती। मैं अग्निबाण से समुद्र को सुखा देता हूं। राम जी बाण चलाने ही वाले थे, तभी अभिमान छोड़कर समुद्र ब्राह्मण के रूप में आया। उसने कहा— हे नाथ! मेरी गलती क्षमा कीजिए। समुद्र की विनती सुनकर राम जी ने कहा, वानरों की सेना समुद्र के पार कैसे जाएगी, वह उपाय बताओ। समुद्र ने कहा— हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं। उन्होंने बचपन में ऋषि से आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श कर लेने से ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जाएंगे। इस तरह आप समुद्र को बांध दीजिए। यह कहते हुए समुद्र अपने घर चला गया। रघुनाथ जी को यह बात अच्छी लगी।

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।

सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ 

यानी श्री रघुनाथ जी का गुणगान सुंदर मंगलों का देने वाला है। जो इसे आदर सहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज के भवसागर को तर जाएंगे।

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पंचमः सोपानः समाप्तः।

कलियुग के समस्त पापों का नाश करने वाले श्री रामचरित मानस का यह पांचवां सोपान समाप्त हुआ।

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अगले भाग में पढ़िए लंकाकाण्ड का सार...। 

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