कर्नाटक के चुनाव नतीजे के आफ्टर इफेक्ट एमपी-छत्तीसगढ़ में दिख सकते हैं, कांग्रेस को मिला बूस्ट तो बीजेपी के लिए समझने का वक्त

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Rajeev Khandelwal
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कर्नाटक के चुनाव नतीजे के आफ्टर इफेक्ट एमपी-छत्तीसगढ़ में दिख सकते हैं, कांग्रेस को मिला बूस्ट तो बीजेपी के लिए समझने का वक्त

BHOPAL. साल 2023 में होने वाले मध्य प्रदेश विधानसभा के चुनाव परिणाम का आकलन शुरू किए हुए 3 महीने गुजर हो चुके हैं। धीरे-धीरे चुनाव का समय नजदीक आते जा रहा हैं। प्रमुख राजनैतिक पार्टियों की गतिविधियां बढ़ गई हैं। बीते इन पंद्रह दिनों में राजनीतिक पटल पर जितने प्रभावी बदलाव हुये है, आइये! उन सबका का चुनावी परिणाम की दृष्टि से आकलन करते हैं।





जैसा कि पूर्व में ही लिखा जा चुका है कि बीजेपी से कांग्रेस में आने का सिलसिला जो शुरू हुआ वह अभी भी जारी है। नंद कुमार साय छत्तीसगढ़ बीजेपी के अध्यक्ष रहे थे। कई बार सांसद व विधायक रहे। उनका बीजेपी से इस्तीफा देकर कांग्रेस में शामिल होना राजनीति में एक बड़ा धमाका है। यद्यपि यह "भूचाल" छत्तीसगढ़ में आया है, जो एक समय अविभाजित मध्य प्रदेश का अंग हुआ करता था। चूंकि नंद कुमार साय अविभाजित मध्य-प्रदेश जिसमें छत्तीसगढ़ शामिल था, के बीजेपी के अध्यक्ष रह चुके हैं। जनसंघ के जमाने से भाजपा से जुड़े हुए थे। अतः नंद कुमार साय का इस्तीफा मध्य-प्रदेश की राजनीति में असंतुष्टों  के लिए कितना प्रेरक, उत्प्रेरक होगा, यह देखना दिलचस्प होगा। मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री दीपक जोशी भी बीजेपी से इस्तीफा देकर कांग्रेस में दाखिल हो गए हैं। दीपक जोशी संत पुरुष, मध्य प्रदेश के कद्दावर नेता रहे पूर्व मुख्यमंत्री और जनसंघ के करीब स्थापना काल के समय से ही पार्टी से जुड़े रहे कैलाश जोशी के सुपुत्र व पूर्व मंत्री हैं। दोनों के इस्तीफे में एक समान बात यह रही है कि दोनों ने आत्मसम्मान की रक्षार्थ और पार्टियों में स्वयं को दरकिनार किए जाने के कारण पार्टी छोड़ी। पूर्व विधायक राधेलाल बघेल भी दीपक जोशी के साथ बीजेपी छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। इसी दिशा में अनूप मिश्रा, भंवर सिंह शेखावत, श्रीमती कुसुम सिंह महदेले का नाम भी काफी चर्चा में है। "दिशाहीन" होंगे या "नई दिशा" देंगे? परिणाम भविष्य के गर्भ में है। 





कर्नाटक के नतीजे क्या असर डालेंगे?





परिणाम आ गये है। आशा से कुछ ज्यादा ही "आशातीत" परिणाम आए हैं। कर्नाटक की जनता ने स्पष्ट दिशा देते हुए स्पष्ट जनादेश दिया गया है। निश्चित रूप से वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के साथ मध्य प्रदेश में भी वर्ष के अंत में होने वाले चुनाव में प्रदेश की राजनीति में कर्नाटक चुनाव के परिणामों का प्रभाव पड़ना लाजिमी है। अतः पहले   कर्नाटक प्रदेश के आये चुनाव परिणामों का गहन विचार मंथन कर राजनैतिक निष्कर्ष  निकालने का प्रयास करते हैं। तभी कर्नाटक चुनाव के आए परिणामों का मध्य प्रदेश की राजनीति पर होने वाले प्रभाव का सही आकलन कर पाएंगे। चुनाव परिणाम ने कर्नाटक में भाजपा के हिंदुत्व, "संप्रभुता" व "गाली" के मुद्दे की एक तरह से हवा ही निकाल दी है। उलट इसके ‘‘हिंदू-मुस्लिम’’ से कांग्रेस को मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में फायदा ही मिला है। "मोदी है तो मुमकिन है" व "डबल इंजन की सरकार" के नारे व नीति को भी एक धक्का अवश्य लगा है। 





कर्नाटक के साथ ही उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकायों के आय चुनाव परिणामों ने डबल इंजन की सरकार को और मजबूती देते हुए "ट्रिपल इंजन" की सरकार स्थापित कर दी है। भ्रष्टाचार का मुद्दा हमेशा से कांग्रेस के लिए गले की हड्डी बन कर इसके दुष्परिणामों से कांग्रेस को हमेशा दो-चार होना पड़ता रहा है। पहली बार भाजपा के भ्रष्टाचार का उक्त मुद्दा का दाँव उलट पड़ गया यानी पासा पलट गया। उल्टे कांग्रेस ने उक्त मुद्दे को लपक कर, झेल कर 40 प्रतिशत कमीशन के भ्रष्टाचार को भारी व प्रमुख मुद्दा बनाया, भ्रष्टाचार की रेट लिस्ट के होर्डिंग तक लगा दिए गए। इस प्रकार भ्रष्टाचार के मुद्दे का भारी प्रचार किए जाने के कारण प्राप्त सफलता में  यह मुद्दा शायद अन्य मुद्दों पर भारी पड़ गया, ऐसा प्रतीत होता है। अंदरूनी कलह व एकता की कमी भी चुनाव हार के कारणों में जुड़ गई। येदुरप्पा की बेज्जती को दूर करने के पार्टी के प्रयासों को शायद जनता ने गंभीरता से नहीं लिया, हार का एक कारक यह भी है।





बीजेपी के हक में भी कुछ बातें





चुनाव परिणामों से निकले उक्त विपरीत संदेशों के बावजूद उक्त परिणाम से बीजेपी के हक में भी तीन निष्कर्ष अवश्य निकाले जा सकते हैं। प्रथम, समस्त विपरीत परिस्थितियों और सत्ता विरोधी कारक (एंटी इनकंबेंसी फैक्टर) होने के बावजूद वह अपने वोट बैंक प्रतिशत 34% को बनाए रखने में सफल रही है, जो पिछले आम चुनाव में मिले कुल प्रतिशत के लगभग बराबर का ही है। मात्र .04 पर्सेंट की कमी आई है। कर्नाटक में हुए पिछले 14 आम चुनावों में से 8 चुनावों में पिछले चुनाव की तुलना में मतदान का प्रतिशत बढ़ने के कारण 8 में से7 बार सत्ता पर बैठी सरकार बदली है। इसी प्रकार पिछले आम चुनाव की तुलना में इस बार कुल मतदान में 0.77% की वृद्धि (73.19-72.36=0.77) होने के कारण परिपाटी स्वरूप सत्ता पर विराजमान सरकार को  बदलने के बावजूद भाजपा अपने वोट बैंक को बनाए रखने में "सफल" रही है। तीसरा यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ही कमाल था और उनकी "मैराथन दौड़" का ही यह परिणाम रहा कि कोस्टल एरिया में बीजेपी की हार जैसे अन्य क्षेत्रों में हुई, वैसे होने से प्रधानमंत्री की रैली और सभाओं ने रोका बल्कि बेंगलुरु में तो पिछले चुनाव की तुलना में भाजपा के पक्ष में मतदान का प्रतिशत बढ़ा भी।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ कमजोर जरूर हुए हैं, परंतु आज भी उनकी मतदाताओं के बीच प्रभावी पहुंच व पेंठ से इनकार नहीं किया जा सकता है। मतलब "ब्रांड मोदी" कमोबेश बरकरार है। वैसे भी अनेकों जीतों के बीच एक या दो हार से विपरीत निष्कर्ष निकालना खतरे से खाली नहीं होगा।





हिंदुत्व कहां कारगर होगा, बीजेपी को ये समझना होगा





उक्त निर्णायक हार से यह अंतिम निष्कर्ष निकालना भी गलत होगा कि बीजेपी का हिंदुत्व (बजरंग बली) का मुद्दा खत्म हो गया। वास्तव में कर्नाटक में हिंदुत्व का मुद्दा कृत्रिम रूप से बनाया गया, यह कहकर कि बजरंग दल पर प्रतिबंध का मतलब ‘‘बजरंगबली’’ है। इसी प्रकार "सम्प्रभुता" का भी मुद्दा कृत्रिम रूप से बनाया गया। इन दोनों मुद्दों के कृत्रिम रूप से निर्मित होने के कारण ही जनता ने इन मुद्दों को अस्वीकार कर दिया। इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि हिंदुत्व का मुद्दा जहां वास्तविक होकर धरातल पर होगा, जैसे गुजरात, उत्तर-प्रदेश में, तो वह मुद्दा ‘‘प्राकृतिक’’ होने के कारण जो पूर्व में बीजेपी के लिए संजीवनी सिद्ध हो चुका है, वह फिर से भविष्य में भी संजीवनी सिद्ध हो सकती है। 





कर्नाटक की जनता ने इस जनादेश के द्वारा एक और संदेश यह भी दिया है कि वोटों का बंटवारा न होने की स्थिति में "अपराजित, अजेय परसेप्शन" ली हुई बीजेपी को हराया जा सकता है, जैसा कि कर्नाटक की जनता ने बहुत ही बुद्धिपूर्वक किया। कैसे! कांग्रेस, बीजेपी और जेडीएस तीन प्रमुख दल के "चुनावी पिच" पर होने के बावजूद जनता ने त्रिकोणीय संघर्ष लगभग नहीं होने दिया। मतलब किसी भी सीट पर तीनों पार्टी के उम्मीदवारों को परस्पर प्रतिस्पर्धात्मकपूर्ण वोट नहीं मिले। यानी जनता ने बीजेपी के विरुद्ध कांग्रेस और जेडीएस के उम्मीदवार जहां-तहां मजबूत थे और जीतने की स्थिति में लग रहे थे, वहां त्रिकोणीय संघर्ष ना होने देकर सीधे-सीधे जिताऊ उम्मीदवारों को वोट देकर जिताया। यह महत्वपूर्ण संदेश कर्नाटक से ज्यादा 2024 में देश के लोकसभा के होने वाले आम चुनाव के लिए ज्यादा महत्व रखता है। हां, ऐसा होने के लिए इस बात का होना बहुत जरूरी है कि चुनावी मैदान में उतरी सत्ता की आकांक्षी मुख्य विपक्षी पार्टी जनता को पूर्ण रूप से यह विश्वास दिला सके कि जनता की परिवर्तन की इच्छाओं की पूर्ति को वह पूर्ण करने में सक्षम होकर संजीदगी से गंभीर है।





मप्र में कर्नाटक के नतीजे प्रभाव डालेंगे?





अब मध्य प्रदेश की राजनीति में उक्त चुनाव परिणाम से उभरे समीकरण का आगामी होने वाले चुनाव पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इसका अध्ययन कर लेते हैं। "हिंदुत्व के मुद्दे के मामले में कमलनाथ खुद "हार्ड हिंदुत्व" की बजाय "सॉफ्ट हिंदुत्व" को अपनाते हुए दिख रहे हैं। इसलिए वे मध्य प्रदेश की "चुनावी पिच" पर इस मुद्दे पर बीजेपी को "गुगली" फेंकने का कोई मौका शायद ही देंगे। कर्नाटक में बीजेपी ने करीब 75 अपने पुराने उम्मीदवारों को बदला, लेकिन वहां पर महज 17 उम्मीदवारों ही विजय प्राप्त कर पाए। 





मध्य प्रदेश की राजनीति में इसका यह प्रभाव जरूर पड़ेगा कि जहां-तहां बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं में असंतोष है। और जो एक-एक करके पार्टी छोड़ते जा रहे हैं, ऐसी स्थिति में अब वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी, अवहेलना करना और उन्हें टिकट से वंचित करना पार्टी के लिए एक मुश्किल कार्य होगा। परिणामस्वरूप ऐसा लगता है कि अनुभव और युवा दोनों का बेहतर कॉन्बिनेशन के साथ बीजेपी आगामी होने वाले चुनाव में टिकट देने की नीति अपनाएगी। बीजेपी एक नई नीति, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को टिकट देने के बजाय उनके पुत्र/पुत्री को टिकट देने की नीति बना कर वरिष्ठ नेताओं की टिकट काटे जाने की स्थिति में उत्पन्न असंतोष को रोक सकती है। इसमें शिवराज सिंह चौहान, जयंत मलैया, गोपाल भार्गव, नरोत्तम मिश्रा, नरेंद्र सिंह तोमर, प्रभात झा, गौरीशंकर बिसेन के बेटे/बेटी शामिल हो सकते है। 





बीजेपी ये तर्क देकर विद्रोह को रोक सकती है





साथ ही प्रदेश बीजेपी नेतृत्व असंतुष्ट को जगदीश शेट्टार की हुई दुर्दशा का चेहरा कांग्रेस झंडे के साथ बार-बार दिखा कर विद्रोह को रोकने का प्रयास कर सकता है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री व लिंगायत समुदाय के बड़े नेता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खाटी स्वयंसेवक, जगदीश शेट्टार बीजेपी छोड़कर अपनी परंपरागत सीट जहां से वे 6 बार से लगातार चुने जा रहे थे, से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़े। बीजेपी के उम्मीदवार जो अपने को जगदीश शेट्टार का चेला कहते रहे, ने जगदीश शेट्टार को बुरी तरह से 35000 से अधिक वोटों से पछाड़ दिया। कर्नाटक के चुनाव में सोनिया गांधी की एकमात्र चुनावी सभा जगदीश शेट्टार की विधानसभा क्षेत्र में ही हुई थी। 





उक्त हार मध्यप्रदेश में बीजेपी के उन नेताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि यदि पार्टी छोड़कर वे कांग्रेस में जाकर चुनाव लड़ते हैं तो उनको भी एक बड़ा खतरा उठाना पड़ सकता है, क्योंकि तब भाजपा ऐसे "भाजपाई कांग्रेसी उम्मीदवारों" को हराने के लिए पूरी ताकत से जुड़ जाएगी, जैसा कि कर्नाटक में पूर्व मुख्यमंत्री शेट्टार के मामले में हुआ। इस प्रकार जगदीश शेट्टार की हार मध्य प्रदेश में बीजेपी के लिए एक संजीवनी होकर ढाल सिद्ध हो सकती है, जो पार्टी छोड़कर जाने की सोच रहे हैं। अंतिम निष्कर्ष स्पष्ट है। कांग्रेस की कुछ बढ़त अभी भी बीजेपी के ऊपर विद्यमान है। कर्नाटक चुनाव परिणाम का पूरा प्रभाव अगले 15 दिनों में देखने को मिल सकता है, तभी ज्यादा अच्छी समीक्षा हो पाएगी।



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