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गुरु- शिष्य के रिश्ते को लेकर यह बहुत ही मार्मिक कहानी है। पाकिस्तान के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. अब्दुल सलाम, जिन्हें 1979 में पार्टिकल फिजिक्स में नोबेल प्राइज दिया गया था। जब उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला तो उन्होंने भारत सरकार से अनुरोध किया कि वे उन्हें उनके गणित के टीचर डॉ. अनिलेंद्र गांगुली को ढूंढने में मदद करें। दरअसल, हुआ कुछ यूं कि 1947 में विभाजन के दौरान डॉ. अनिलेंद्र गांगुली और डॉ. अब्दुल सलाम अलग हो गए। विभाजन के पहले डॉ. अनिलेंद्र गांगुली लाहौर के सनातन धर्म कॉलेज में पढ़ाया करते थे और विभाजन के बाद वे भारत में तबके कलकत्ता— अब कोलकाता, आकर बस गए। ये डॉ. गांगुली की ही पढ़ाई मैथ्स ही थी, जिसने डॉ. अब्दुल सलाम के अंदर वैज्ञानिक बनने का जुनून भरा। और आगे चलकर वे पाकिस्तान का नाम दुनियभार में कर सके।
गुरु के नाम किया नोबेल प्राइज
भारत सरकार को डॉ. गांगुली को खोजने में 2 साल लग गए। और आखिरकार 19 जनवरी 1981 को डॉ. सलाम भारत आए तो कलकत्ता में अपने गुरु के घर उनसे मिलने के लिए पहुंचे। काफी समय बीत चुका था और इतने समय में डॉ. गांगुली बहुत बुजुर्ग और बीमार हो गए थे। वे इतने बूढ़े और बीमार हो चुके थे अपने शिष्य से उठकर मिल भी नहीं पाए। वो क्षण इतना भावुक हो गया, जब शिष्य डॉ. सलाम ने अपना नोबेल प्राइज अपने गुरु डॉ. गांगुली के हाथ में रखा और कहा कि -"ये नोबल आपका है सर, मेरा नहीं। आपकी ही दी शिक्षा के कारण मैं ये सब हासिल कर पाया।”
फिर घर के बाहर ही किया गया सम्मान
गुरु और शिष्य के बीच एक और बड़ी यादगार घटना जुड़ी हुई है। 1981 में यूनिवर्सिटी ऑफ कोलकात्ता ने डॉ सलाम को द देवप्रसाद सर्वाधिकारी गोल्ड मेडल से सम्मानित करने का फैसला लिया। डॉ. सलाम ने बड़ी ही विनम्रता के साथ इस मेडल को लेने से मना कर दिया। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने ये पुरस्कार लेने से मना क्यों कर दिया तो उन्होंने बताया कि इस पुरस्कार के असली हकदार उनके गुरु डॉ. अनिलेंद्र गांगुली हैं। पर डॉ. गांगुली इतने बूढ़े हो चुके थे कि वे किसी भी कार्यक्रम में जाने की अवस्था में नहीं थे। तब यूनिवर्सिटी ने डॉ. गांगुली के घर के बाहर ही एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित किया ताकि डॉ. गांगुली उसमें शामिल हो सकें। डॉ. गांगुली न सिर्फ उस कार्यक्रम में शामिल हुए, बल्कि वे उन्हें सम्मानित भी किया गया। और अंततः डॉ. सलाम का सपना सच हुआ, उनके गुरु को गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया। कुछ समय बाद, 1982 में डॉ. अनिलेंद्र गांगुली की मृत्यु हो गई।