जितना डॉयल 100 का किराया दे रहे उतने में नई गाड़ियां आ जाती, ज्यादातर समय गायब

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जितना डॉयल 100 का किराया दे रहे उतने में नई गाड़ियां आ जाती, ज्यादातर समय गायब

ओपी नेमा, भोपाल. 100 नंबर घुमाओ और पुलिस बुलाओ। मप्र में 2015 में जब डॉयल 100 सेवा की शुरूआत हुई थी तब इस स्लोगन को बेहद प्रचारित किया गया था। कहा गया था कि 5 मिनट में पुलिस घटनास्थल पर पहुंचेगी। 100 नंबर घुमाने पर पुलिस आती तो है लेकिन रिस्पॉन्स टाइम बेहद लचर है। इसका खुलासा सीएजी यानी कैग की रिपोर्ट में हाल ही में हुआ है। एक और तथ्य ये है कि डॉयल 100 की ज्यादातर गाड़ियां कंडम हो चुकी है। जितना पैसा सरकार इस सेवा को संचालित करने वाली कंपनी को दे रही है उतने में तो नई गाड़ियां खरीदी जा सकती है। 



ज्यादातर समय गायब रही FRV: भारत विकास ग्रुप के साथ सरकार ने एफआरवी का अनुबंध किया था। उसमें शर्त थी कि 95 फीसदी फर्स्ट रिस्पांस व्हीकल (FRV) उपलब्ध कराया जाना जरूरी है यानी एक हजार गाड़ियां है तो 950 उपलब्ध रहेंगी। लेकिन कैग ने पाया कि 2018 से सितंबर 2020 के दौरान एक से आठ फीसदी एफआरवी ऑफ रोड थी। जबकि अनुबंध की शर्तों के मुताबिक 5 फीसदी मार्जिन के साथ 49 हजार 500 दिनों के मुकाबले 29 हजार 527 दिन एफआरवी गायब रही। इसे लेकर अधिकारियों की दलील है कि डिमांड बहुत ज्यादा हो गई है इसकी वजह से गाड़ियां बहुत ज्यादा चलती है और मेंटेनेंस का काम निकलता है। हालांकि सरकार ने ऑफ रोड की संख्या ज्यादा होने पर नोटिस जारी किए थे लेकिन कैग ने अपनी रिपोर्ट में ये भी लिखा कि इसका कोई खास असर कंपनी पर नहीं पड़ा और तो और जितना पैसा सरकार कंपनी को दे रही है उससे तो नई गाड़ी खरीदी जा सकती है। 



जितना किराया दे रहे उतने में नई आ जाती: जबलपुर में शहरी इलाके में 32 और ग्रामीण इलाके लिए 13 गाड़ियां तैनात है। एक गाड़ी पर हर महीने 60 हजार रु. की राशि खर्च की जा रही है। इस हिसाब से देखे तो 45 गाड़ियों पर साल भर में करीब 3 करोड़ रु. 24 लाख रु. कंपनी को भुगतान किया जा रहा है। प्रदेश में 1200 गाड़ियां है जिनका सालाना किराया करीब 86 करोड़ रु. होता है। पिछले 5 साल में सरकार इस सेवा पर 5 अरब 184 करोड़ रु. खर्च कर चुकी है। जाहिर है कि 2015 में आम जनता के फायदे के लिए ये सेवा शुरू की गई थी वैसा फायदा आम जनता को आज तक नहीं मिला। बल्कि आम जनता का पैसा बर्बाद ही हुआ है। कैग की रिपोर्ट से भी ये साफ हो रहा है और गाड़ियों को कंडम हालत को देखकर भी अब इसी साल नई कंपनी को ठेका दिया जाना है और पांच कंपनियों ने अप्लाई किया है। लेकिन पुरानी कंपनी के साथ ही अनुबंध की शर्तों का पालन नहीं हुआ ऐसे में कार्यप्रणाली पर सवाल उठता है। 



क्या है नियम ?




  • FRV को शहरी इलाके में 5 मिनट और ग्रामीण इलाके में 30 मिनट में घटनास्थल पर पहुंचना तय हुआ




कैग की रिपोर्ट-




  • शहरी इलाकों में FRV 24 मिनट में पहुंची और ग्रामीण इलाकों में 56 मिनट में


  • 2016 से 2019 के बीच इसमें कोई सुधार नहीं हुआ

  • इस प्रणाली को सुधारने के लिए सरकार ने खर्च किए 104 करोड़ रु.  



  • FRV की उपलब्धता पर भी सवाल-




    • भारत विकास ग्रुप के साथ अनुबंध में 95 फीसदी FRV उपलब्ध कराया जाना जरूरी 


  • 1 हजार गाड़ियां है तो 950 उपलब्ध रहेंगी



  • कैग की रिपोर्ट-




    • 2018 से सितंबर 2020 के दौरान एक से आठ फीसदी FRV ऑफ रोड थी


  • तीन सालों के 49 हजार 500 दिनों के मुकाबले 29 हजार 527 दिन FRV गायब रही 



  • जबलपुर का हाल-




    • शहरी इलाके में 32 और ग्रामीण इलाके लिए 13 गाड़ियां तैनात 


  • एक गाड़ी पर खर्च- 60 हजार रु.

  • 45 गाड़ियों पर सालाना करीब 3 करोड़ रु. 24 लाख रु. का खर्च



  • प्रदेश का हाल-




    • प्रदेश में 1200 गाड़ियां जिनका सालाना किराया करीब 86 करोड़ रु.


  • पिछले 5 साल में सरकार इस सेवा पर 5 अरब 184 करोड़ रु. खर्च कर चुकी


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