मप्र के बाजार में गेहूं के दाम हुए धड़ाम, माली हालत ठीक नहीं होने से बोनस देना आसान नहीं, इधर किसान रेट बढ़ाने की कर रहे मांग 

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Rahul Sharma
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मप्र के बाजार में गेहूं के दाम हुए धड़ाम, माली हालत ठीक नहीं होने से बोनस देना आसान नहीं, इधर किसान रेट बढ़ाने की कर रहे मांग 

BHOPAL. केंद्र सरकार के एक फैसले ने राज्य सरकार की टेंशन बढ़ा दी है। दरअसल मार्केट में आटे के बढ़ते दाम को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने जनवरी में खुले बाजार में गेहूं की बिक्री का फैसला लिया। अब तक 50 लाख मीट्रिक टन गेहूं को खुला बाजार बिक्री योजना (घरेलू) 2023 के तहत बाजार में उतारने का फैसला किया जा चुका है। केंद्र सरकार द्वारा थोक उपभोक्ताओं (wholesale consumers) के लिए FCI गेहूं का आरक्षित मूल्य (Reserve Price ) घटाने के बाद इसकी कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई। जो गेहूं मंडियों में 3000 रुपए प्रति क्विंटल तक बिक रहा था, वह अब 1900 से 2200 रुपए प्रति क्विंटल तक के भाव पर आ गया है। एमपी किसान प्रधान प्रदेश है। ऐसे में मध्यप्रदेश में किसान ही तय करता है कि वल्लभ भवन के पांचवें माले पर कौन बैठेगा। मध्यप्रदेश में यह साल चुनावी साल है, ऐसे में गेहूं के गिरते दामों ने किसानों के साथ-साथ प्रदेश सरकार को चिंता में डाल दिया है। 



दो महीने में 500 से 800 तक गिरे दाम



केंद्र सरकार के खुले बाजार में गेहूं की बिक्री के फैसले से पहले तक मंडियों में गेंहूं के रेट 2600 से 3000 रुपए प्रति क्विंटल तक थे। 1 जनवरी 2023 को इसी रेट पर प्रदेश की मंडियों में गेहूं बिका। 1 फरवरी 2023 को यह घटकर 2500 से 2800 रुपए तक आ गया। वहीं 1 मार्च 2023 को दाम गिरकर 1900 से 2200 रुपए तक आ गए। करोंद ग्रेन मर्चेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष हरीश ज्ञानचंदानी ने कहा कि खुले बाजार में गेहूं की बिक्री से गेहूं के दाम गिरे हैं। मार्केट में नया गेहूं आने लगा है, इसलिए अब गेहूं के रेट बढ़ने की उम्मीद नहीं है।    



सरकार के पास क्या है विकल्प



सरकारी खरीदी में समर्थन मूल्य का निर्धारण केंद्र सरकार करती है। इस सीजन गेंहूं का समर्थन मूल्य 2125 रुपए निर्धारित हो चुका है, जिसमें अब परिवर्तन नहीं होगा। राज्य सरकार अपने हितों को साधने के लिए समर्थन मूल्य के साथ बोनस के रूपए में अतिरिक्त राशि देती आई है, लेकिन इस बार के बजट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया गया है। सरकार के लिए किसी अन्य मद से बोनस देना भी इतना आसान नहीं है, क्योंकि प्रदेश सरकार यदि 160 रुपए का भी बोनस देती है तो सरकार पर हजारों करोड़ का वित्तीय भार आ जाएगा। प्रदेश की माली हालत पहले से ही खराब है। इधर कृषि मंत्री कमल पटेल ने बाजार में गिरते दाम को लेकर कहा कि हम किसानों का गेहूं समर्थन मूल्य पर खरीदेंगे, इससे यह बात स्पष्ट हो गई कि फिलहाल बोनस देने की किसी योजना पर विचार नहीं चल रहा है। 



चुनाव से पहले बोनस देने के बाद भी गंवा दी थी सत्ता



मध्यप्रदेश में किसानों को गेहूं खरीदी में बोनस दिए जाने की परंपरा काफी पुरानी है। शिवराज सरकार में इसकी शुरूआत 2008 से शुरू हुई। हालांकि, केंद्र में बीजेपी की सरकार के आते ही वर्ष 2014 में एक सर्कुलर जारी किया गया, जिसमें ऐसे प्रदेश जो समर्थन मूल्य के साथ-साथ किसान को बोनस भी देते हैं, वहां एफसीआई गेंहूं खरीदी नहीं करेगी। इसके बाद मध्यप्रदेश में बोनस देना बंद कर दिया गया। 2018 मध्यप्रदेश में चुनावी वर्ष था, इसलिए अप्रैल-मई 2018 में हुई खरीदी में प्रदेश सरकार ने दो साल का इकट्ठा किसानों को बोनस दे दिया। हालांकि, इसके बाद भी प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो गया और कमलनाथ सरकार प्रदेश में काबिज हो गई। कमलनाथ सरकार ने भी 160 रुपए किसानों को प्रति क्विंटल बोनस दिया। लेकिन उसके बाद किसानों को फिर बोनस नहीं मिला। 



बीते 5 सालों में पिछले साल सबसे कम खरीदी



बीते 5 सालों की बात करें तो सबसे कम खरीदी पिछले साल हुई। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण गेंहूं के एक्सपोर्ट में आई तेजी से किसानों का गेंहूं 3500 रुपए तक बिका। नतीजा यह रहा कि 2022-23 में किसानों ने 2015 रुपए प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य पर सरकार को अपना गेहूं नहीं बेचा, जिससे एफसीआई खरीदी का अपना टारगेट भी पूरा नहीं कर पाई। एफसीआई ने मध्यप्रदेश में 2017-18 में 67.25 लाख मीट्रिक टन, 2018-19 में 73.13 लाख मीट्रिक टन, 2019-20 में 67.25 LMT, 2020-21 में 129 LMT और 2021-22 में 128.16 LMT गेहूं की खरीदी हुई। 2022-23 में 128 लाख मीट्रिक टन लक्ष्य के विरुद्ध मात्र 46.03 लाख मीट्रिक टन ही खरीदी हो सकी। इधर भारतीय किसान संघ के नर्मदापुरम संभाग के मीडिया प्रभारी शिवमोहन सिंह ने कहा कि किसान आटे के दाम को कम करने का विरोधी नहीं है, लेकिन इसके लिए मार्केट में जो गेंहूं के दाम गिरे वे ठीक नहीं, इससे किसानों को काफी नुकसान होगा। सरकार को कोई और रास्ता निकालना चाहिए था।



कांग्रेस 13 मार्च को करेगी राजभवन का घेराव



किसानों के मुद्दों पर कांग्रेस एक्शन मोड में आ गई है। दरअसल 2018 में जब कांग्रेस सत्ता में आई थी तो उसके पीछे किसान कर्जमाफी योजना एक बड़ा कारण बताया जाता रहा है। ऐसे में गेहूं के दाम 3 हजार रुपए किए जाने के मुद्दे को कांग्रेस भुना पाती है तो हो सकता है 2018 की किसान कर्ज माफी जैसा गेम चेंजर कांग्रेस के हाथ लग जाए। जीतू पटवारी ने हाल ही में अपने एक सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट किया है, जिसमें वह कह रहे हैं कि कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कमलनाथ ने सभी कांग्रेस कार्यकर्ताओं से 13 मार्च को राजभवन घेराव करने के लिए भोपाल आने की अपील की है। जीतू पटवारी ने कहा कि सदन के अंदर कांग्रेस ने गेहूं 3 हजार रुपए में बिकने के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकृत करने की मांग की थी तो इन्होंने निलंबित कर दिया।



ऐसे समझे किसान को होने वाले नुकसान को



मान लीजिए कोई किसान है जिसका नाम मोहन है। मोहन के पास 5 एकड़ जमीन है, जिस पर वह गेहूं की बोवनी करता है। 1 एकड़ में 15 से 20 क्विंटल गेहूं की पैदावार होती है। ऐसे में 5 एकड़ में 75 से 100 क्विंटल की पैदावार होगी। खुले बाजार में गेहूं बेचने के केंद्र सरकार के फैसले से पहले तक 3 हजार प्रति क्विंटल तक गेहूं बिका। यही मार्केट में यही रेट रहते तो मोहन को 2.25 लाख से 3 लाख रुपए तक मिल जाते। गेहूं का समर्थन मूल्य इस सीजन 2125 रुपए प्रति क्विंटल है। बाजार के रेट गिरने पर मोहन के पास अब सिर्फ समर्थन मूल्य पर गेहूं बेचने का विकल्प बचा है। समर्थन मूल्य पर गेहूं बेचने पर मोहन को सिर्फ 1.59 लाख से 2.12 लाख तक ही मिलेंगे। मतलब मोहन को अब नुकसान 66 हजार रुपए से लेकर 88 हजार रुपए तक होगा।


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