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मीरा देवी राजस्थान के जयपुर जिले के एक गांव की रहने वाली हैं। मीरा देवी के पति की मौत कई साल पहले हो चुकी है। पति ही घर में कमाने वाले इकलौते सदस्य थे। उनकी मौत के बाद परिवार के सामने अजीविका का संकट खड़ा हो गया। घर में खाने तक की दिक्कत होने लगी। ऊपर से तीन बेटियों कमला, गीता, ममता और बेटे राम सिंह की पढ़ाई का खर्च अलग। परिवार की बिगड़ती माली हालत को देखते हुए मीरा देवी ने मजदूरी करनी शुरू कर दी।
पति की अंतिम इच्छा का सम्मान
उनके पति की इच्छा थी कि तीनों बेटियों को पढ़ा लिखाकर वह अफसर बनाएं। वह अपने पति की अंतिम इच्छा को हर हाल में पूरा करना चाहती थीं। पति के सपने को उन्होंने अपना सपना बना लिया। बेटियों की पढ़ाई न छूटे इसलिए मीरा ने सुबह से देर शाम तक मजदूरी की। इस काम में उनके बेटे राम सिंह ने भी सहयोग दिया। अभाव के बावजूद मीरा ने बेटियों की पढ़ाई कभी रुकने नहीं दी।
भाई ने भी दिया बलिदान
बहनों को अफसर बनाने के लिए दिन-रात मेहनत-मजदूरी करती अपनी मां को देख बेटे राम सिंह ने भी उनका हाथ बंटाने का फैसला किया। बहनों की पढ़ाई में गरीबी आड़े न आए इसलिए राम सिंह ने खुद पढ़ाई छोड़ दी और मां के साथ खेतों में मजदूरी करने लगा। मां और बेटे की मेहनत का ही नतीजा था कि तीनों बहनों को कभी पैसों के कारण पढ़ाई से समझौता नहीं करना पड़ा।
तीनों बहनें एकसाथ सफल हुई
कमला, ममता और गीता ने एकसाथ UPSC का एग्जाम दिया, लेकिन कुछ नंबरों से तीनों का सिलेक्शन नहीं हो सका। इसके बाद तीनों बहनों ने एकसाथ राजस्थान प्रशासनिक सेवा की परीक्षा दी और उसमें तीनों का चयन हो गया। तीनों बहनों में सबसे बड़ी कमला चौधरी को ओबीसी रैंक में 32वां स्थान मिला, जबकि गीता को 64वां और ममता को 128वां स्थान मिला। बेटियों की इस सफलता के साथ ही मीरा देवी का संघर्ष भी खत्म हुआ और उनके दिवंगत पति का सपना भी पूरा हुआ।
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