News Strike: GEN Z और जैन अल्फा की नाराजगी दूर करने में जुटी BJP! CM हाउस में बनी नई रणनीति
Harish Divekar | Aug 25, 2026, 07:00 IST
Photograph: (thesootr)
News Strike: मध्यप्रदेश में आदिवासी और Gen Z नाराजगी को लेकर बीजेपी सक्रिय हुई है। सीएम हाउस बैठक में आदिवासी वोट बैंक और नई रणनीति पर चर्चा हुई।
जेन जी और जेन अल्फा की नाराजगी का बीजेपी ने तोड़ ढूंढ निकाला है और उस तोड़ पर अब जोर शोर से काम भी शुरू कर दिया है। इस संबंध में मोहन यादव के निवास यानी सीएम हाउस में बड़ी बैठक भी हुई है। वो भी चाय के साथ।
जंतर मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के बाद बीजेपी को ये तो समझ में आ गया है कि डिजिटल दुनिया में चुनावी लड़ाई उतनी भी आसान नहीं है जितनी नजर आती है। पार्टी ने भले ही अपने डिजिटल प्रमुख को बदल दिया है। पर सोशल मीडिया की दुनिया में आए दिन हजारों नए चेहरे नजर आते हैं।
आईटी सेल भी इंफ्लूएंजर्स की लगाम कसेगी तो कितना कसेगी। ये भी तय है कि जितनी ज्यादा लगाम कसी जाएगी नाराजगी भी उतनी ही बढ़ जाएगी। क्या इसलिए बीजेपी अपना रुख अब उस तबके की तरफ कर रही है जिसका साथ मिला तो सत्ता में वापसी भी तय है।
बालाघाट में 24 आदिवासी बच्चों की मौत ने सरकार की नींद उड़ा दी है। खराब पानी और दूसरे कई कारणों से बच्चे मौत का शिकार हुए। जिसके बाद सरकारी सुविधाएं बालाघाट के आदिवासी गांवों तक पहुंचाने का वादे और दावे सब कुछ रिवाइव होने लगे हैं।
सरकार ने सख्त एक्शन लेने के नाम पर जिला टीकाकरण अधिकारी और जिला मलेरिया अधिकारी को हटाने के निर्देश भी दिए हैं। जिन बच्चों की मौत हुई, उनमें से अधिकांश बैगा जनजाति के बच्चे हैं। इस घटना के बाद से अब तक सिर्फ डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल के बालाघाट के दौरा करने की खबर आई है।
बीजेपी में आदिवासी नेताओं की कमी नहीं है। करीब 7 सांसद और चार विधायक इसी तबके से आते हैं। पूर्व राज्यसभा सांसद सुमेर सिंह सोलंकी भी इसी तबके से हैं और बड़ा आदिवासी चेहरा भी माने जाते हैं। उन्हें भी इतनी बड़ी घटना होने के बाद बालाघाट दौरा करने का वक्त नहीं मिला।
इस बात की नाराजगी बीजेपी के हलकों में भी है। खासतौर से स्थानीय आदिवासी नेता इस अनदेखी से खासे नाराज हैं। इससे पहले भी नजर डालें तो आदिवासियों के मामले पर बीजेपी सरकार बुरी तरह घिरती रही है। तकरीबन एक साल पहले की बात है।
जब देवास के पास खिवनी के जंगलों से आदिवासियों के अतिक्रमण के नाम पर हटाया गया था। तब भी जमकर बवाल हुआ था। कांग्रेस ने भी बीजेपी के आदिवासी नेताओं पर सवाल उठाए थे कि इतनी बड़ी घटना पर उनकी बोलती क्यों बंद है।
इस मुद्दे पर जयस भी खामोश नहीं थी। बीजेपी नेताओं के खिलाश जयस ने भी मोर्चा खोला था। मीडिया मैनेजमेंट में माहिर बीजेपी ऐसी खबरों पर काफी हद तक कंट्रोल कर लेती है, लेकिन इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि खबरों को कितना भी छुपा लो आग लगेगी तो धुएं पर रोक लगाना मुश्किल होगा और उबाल आएगा तो पानी बाहर बहेगा और दूसरों को भी जलन का अहसास करवाएगा।
बीजेपी को भी अब ये बात समझ में आ गई है और जैसा मैंने पहले कहा कि जेन जी और जेन अल्फा के लिए बीजेपी को नए सिरे से रणनीति तैयार करनी है। पर एक रणनीति तो क्लियर है। उसी पर क्यों न काम कर लिया जाए। बस यही सोच कर पार्टी ने आदिवासी वोट बैंक पर फोकस करना शुरू कर दिया है।
शुरूआत सीएम हाउस में हुई एक हाई टी बैठक से हुई। जिस देश में बड़े बड़े मुद्दे चाय पर चर्चा के साथ सुलझा लिए जाते हैं। वहां तो हाई टी पर तो कमाल होना ही चाहिए। बीजेपी को भी शायद यही उम्मीद है कि हाई टी पर आदिवासी नेताओं के साथ चर्चा से जीत का रास्ता निकलेगा जो शायद फिर बंद नहीं होगा।
इसी मंशा के साथ हाई टी पर सीएम और आदिवासी नेता आमने सामने बैठे। जाहिर है बड़ी घटना पर डैमेज कंट्रोल की बात तो हुई ही होगी। खबर है कि इस बैठक में आदिवासी नेताओं ने जमकर नाराजगी जाहिर की है।
नाराजगी इस बात पर है कि आदिवासी समाज से जुड़ी बड़ी-बड़ी घटनाओं पर भी पार्टी के आला नेता बेरूखी जाहिर करते हैं। वो नेता भी जो खुद इस समाज से आते हैं। मसलन बालाघाट में अब तक राजेंद्र शुक्ल के अलावा कोई नेता नहीं पहुंचा।
सालभर पहले जब खिवनी में आदिवासियों के खिलाफ घटना हुई तो बीजेपी के बड़े आदिवासी नेता और मंत्री कुंवर विजय शाह ने उनकी सुध ली। आदिवासी नेताओं की उदासीनता को देखते हुए कांग्रेस के इल्जाम को खारिज नहीं किया जा सकता।
आदिवासी वोट की कीमत कांग्रेस भी खूब समझती है। इसी वोटबैंक ने कांग्रेस को 2018 में सत्ता दिलाई थी। इसलिए तो कांग्रेस ने भी उमंग सिंगार को बड़ा पद सौंपा है ताकि इन वोटर्स में पैठ बनी रहे।
कांग्रेस आदिवासियों को ये यकीन दिलाती रहती है कि बीजेपी उन्हें वनवासी मानती है आदिवासी नहीं। ये तबका बीजेपी का कोर वोटर नहीं है। इसलिए बीजेपी को खासी मशक्कत भी करनी पड़ती है।
2013 के चुनाव में बीजेपी ने आदिवासी बहुल वाली 59 सीटें जीती। 84 सीटों में से इतनी सीट जीतना बड़ा आंकड़़ा था, लेकिन 2018 के चुनाव में बीजेपी को सिर्फ 34 सीटें मिलीं।
30 सीटों पर कांग्रेस काबिज हुई और सत्ता में आ गई। तब जाकर बीजेपी को आदिवासी वोटर्स की वैल्यू ज्यादा बेहतर तरीके से समझ आई। इसलिए अब आलाकमान ने निर्देश दिए हैं कि आदिवासी तबके पर खास फोकस किया जाए।
इसके बाद सरकार नाराजगी समेटने में जुट गई है। पर ये काम कहां-कहां तक होगा। क्योंकि नाराजगी की ढेरों वजह है। आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं का क्या हाल है ये बालाघाट के हालात देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है।
जमीन छिनने के खिवनी जैसे ही कई मामले हैं। जिसमें से एक बड़ा मामला केन बेतवा परियोजना का है। इस परियोजना के लिए जिनकी जमीन छिन रही है, उसमें से अधिकांश आदिवासी हैं। जिनका धरना प्रदर्शन जारी है।
ऐसे गंभीर मुद्दों के बीच सरकार की खिलाफत पर अमादा आदिवासियों को सरकार भला कैसे अपने पाले में लाएगी। ये बड़ी चुनौती होगी। शायद चुनाव से दो साल पहले ही दिल्ली ने ये टास्क दे दिया है। News Strike | न्यूज स्ट्राइक
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जंतर मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के बाद बीजेपी को ये तो समझ में आ गया है कि डिजिटल दुनिया में चुनावी लड़ाई उतनी भी आसान नहीं है जितनी नजर आती है। पार्टी ने भले ही अपने डिजिटल प्रमुख को बदल दिया है। पर सोशल मीडिया की दुनिया में आए दिन हजारों नए चेहरे नजर आते हैं।
आईटी सेल भी इंफ्लूएंजर्स की लगाम कसेगी तो कितना कसेगी। ये भी तय है कि जितनी ज्यादा लगाम कसी जाएगी नाराजगी भी उतनी ही बढ़ जाएगी। क्या इसलिए बीजेपी अपना रुख अब उस तबके की तरफ कर रही है जिसका साथ मिला तो सत्ता में वापसी भी तय है।
बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत पर सरकार अलर्ट
सरकार ने सख्त एक्शन लेने के नाम पर जिला टीकाकरण अधिकारी और जिला मलेरिया अधिकारी को हटाने के निर्देश भी दिए हैं। जिन बच्चों की मौत हुई, उनमें से अधिकांश बैगा जनजाति के बच्चे हैं। इस घटना के बाद से अब तक सिर्फ डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल के बालाघाट के दौरा करने की खबर आई है।
आदिवासी नेताओं की चुप्पी पर उठे सवाल
इस बात की नाराजगी बीजेपी के हलकों में भी है। खासतौर से स्थानीय आदिवासी नेता इस अनदेखी से खासे नाराज हैं। इससे पहले भी नजर डालें तो आदिवासियों के मामले पर बीजेपी सरकार बुरी तरह घिरती रही है। तकरीबन एक साल पहले की बात है।
जब देवास के पास खिवनी के जंगलों से आदिवासियों के अतिक्रमण के नाम पर हटाया गया था। तब भी जमकर बवाल हुआ था। कांग्रेस ने भी बीजेपी के आदिवासी नेताओं पर सवाल उठाए थे कि इतनी बड़ी घटना पर उनकी बोलती क्यों बंद है।
जयस के विरोध से बढ़ी सियासी हलचल
आदिवासी वोट बैंक पर बीजेपी का फोकस
शुरूआत सीएम हाउस में हुई एक हाई टी बैठक से हुई। जिस देश में बड़े बड़े मुद्दे चाय पर चर्चा के साथ सुलझा लिए जाते हैं। वहां तो हाई टी पर तो कमाल होना ही चाहिए। बीजेपी को भी शायद यही उम्मीद है कि हाई टी पर आदिवासी नेताओं के साथ चर्चा से जीत का रास्ता निकलेगा जो शायद फिर बंद नहीं होगा।
आदिवासी नेताओं की नाराजगी से बढ़ी चिंता
नाराजगी इस बात पर है कि आदिवासी समाज से जुड़ी बड़ी-बड़ी घटनाओं पर भी पार्टी के आला नेता बेरूखी जाहिर करते हैं। वो नेता भी जो खुद इस समाज से आते हैं। मसलन बालाघाट में अब तक राजेंद्र शुक्ल के अलावा कोई नेता नहीं पहुंचा।
सालभर पहले जब खिवनी में आदिवासियों के खिलाफ घटना हुई तो बीजेपी के बड़े आदिवासी नेता और मंत्री कुंवर विजय शाह ने उनकी सुध ली। आदिवासी नेताओं की उदासीनता को देखते हुए कांग्रेस के इल्जाम को खारिज नहीं किया जा सकता।
आदिवासी वोटों पर बीजेपी-कांग्रेस की नजर
कांग्रेस आदिवासियों को ये यकीन दिलाती रहती है कि बीजेपी उन्हें वनवासी मानती है आदिवासी नहीं। ये तबका बीजेपी का कोर वोटर नहीं है। इसलिए बीजेपी को खासी मशक्कत भी करनी पड़ती है।
2013 के चुनाव में बीजेपी ने आदिवासी बहुल वाली 59 सीटें जीती। 84 सीटों में से इतनी सीट जीतना बड़ा आंकड़़ा था, लेकिन 2018 के चुनाव में बीजेपी को सिर्फ 34 सीटें मिलीं।
30 सीटों पर कांग्रेस काबिज हुई और सत्ता में आ गई। तब जाकर बीजेपी को आदिवासी वोटर्स की वैल्यू ज्यादा बेहतर तरीके से समझ आई। इसलिए अब आलाकमान ने निर्देश दिए हैं कि आदिवासी तबके पर खास फोकस किया जाए।
आदिवासियों की नाराजगी दूर करना चुनौती
जमीन छिनने के खिवनी जैसे ही कई मामले हैं। जिसमें से एक बड़ा मामला केन बेतवा परियोजना का है। इस परियोजना के लिए जिनकी जमीन छिन रही है, उसमें से अधिकांश आदिवासी हैं। जिनका धरना प्रदर्शन जारी है।
ऐसे गंभीर मुद्दों के बीच सरकार की खिलाफत पर अमादा आदिवासियों को सरकार भला कैसे अपने पाले में लाएगी। ये बड़ी चुनौती होगी। शायद चुनाव से दो साल पहले ही दिल्ली ने ये टास्क दे दिया है। News Strike | न्यूज स्ट्राइक
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