News Strike: नई पारी की तैयारी में Scindia, इस सीट से मिलेगा टिकट?

सिंधिया इस बार चुनाव में उतरते हैं तो केपी यादव की नाराजगी के बावजूद उनकी जीत तकरीबन तय ही होगी। इसकी दो बड़ी वजह हैं पहली तो ये कि सिंधिया इस क्षेत्र का जाना माना और दमदार चेहरा हैं। वो पिछला चुनाव अपनी किसी गलती या असक्रियता की वजर से नहीं हारे।

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Jitendra Shrivastava
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BHOPAL. मध्यप्रदेश में दो नेताओं के सियासी भविष्य पर राजनीति से जुड़े लोगों समेत आम लोगों की नजरें भी जमी हैं। एक सियासी भविष्य जिस आब और ताब के साथ चमक रहा था वो अब फीका पड़ता नजर आ रहा है। या यू कहें कि पड़ ही चुका है। एक नेता का सियासी भविष्य पहले फुल स्टॉप पर पहुंचा, लेकिन एक कोशिश से चिराग की लो फिर जल उठी। अब इंतजार है कि क्या ये चिराग बड़े झूमर सा झिलमिलता है या नहीं।

ज्योतिरादित्य की संभावनाएं प्रबल 

दोनों नेताओं में एक बात और कॉमन है। एक नेता का जुमला फेमस हुआ जिसमें उन्होंने खुद को फीनिक्स पक्षी बताया मतलब साफ है कि वो राख से जिंदा होने का हुनर जानते हैं और एक नेता ने खुद के लिए कहा कि जिंदा हो तो जिंदा नजर आना जरूरी है। अब ये तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं किस नेता का बात कर रहा हूं। मैं बात कर रहा हूं शिवराज सिंह चौहान की और ज्योतिरादित्य सिंधिया की। लोकसभा चुनाव के दौरान क्या मध्यप्रदेश में उन्हें किसी सीट से मौका मिलेगा। इस बात की संभावनाएं बहुत कम ही नजर आती हैं, लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के बदले हुए तेवर देखकर लगता है कि उनकी लोकसभा चुनाव की नई पारी शुरू होने की संभावनाएं प्रबल हैं। क्योंकि वो अपने जुमले के मुताबिक अपने लोकसभा सीट में जिंदा नजर आने लगे हैं। जिंदा यानी कि एक्टिव नजर आने लगे हैं। जिसके बाद से पूरी गुना शिवपुरी लोकसभा सीट पर ये अटकलें तेज हैं कि सिंधिया एक बार फिर इस सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। सिंधिया लगातार तीन दिन अलग-अलग कार्यक्रमों के सिलसिले में क्षेत्र में टिके हुए हैं।

सिंधिया के दलबदल प्रदेश में बड़ा सियासी भूचाल आया

गुना-शिवपुरी संसदीय क्षेत्र से ही ज्योतिरादित्य सिंधिया चार बार सांसद रहे हैं। साल 2019 में कांग्रेस प्रत्याशी रहते हुए उन्हें भाजपा के प्रत्याशी केपी यादव से सवा लाख वोटों से शिकस्त मिली थी। इस हार के बाद कांग्रेस में हालात ऐसे बनें कि ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोडकर भाजपा में आ गए थे। उनके दलबदल से प्रदेश में बड़ा सियासी भूचाल आया और प्रदेश के इतिहास में अब तक के सबसे बड़ा उपचुनाव हुआ। जिसके बाद प्रदेश में एक बार फिर बीजेपी की सत्ता काबिज हो गई। इसके लिए सिंधिया एहतराम कुछ यूं हुआ कि उन्हें राज्यसभा से सांसद बनाकर भेजा गया और उसके बाद मंत्री पद से भी नवाजा गया।

सिंधिया क्या गुना-शिवपुरी से ही चुनाव लड़ेंगे

अब सिंधिया एक बार फिर चुनावी मैदान में डटने की तैयारी में नजर आ रहे हैं। जिसे देखकर कई सवाल मेरे जहन में उठ रहे हैं। शायद आप भी और खासतौर से ग्वालियर चंबल की राजनीति से जुड़े लोग जरूर इन सवालों के जवाब जानना चाहेंगे... 

पहला सवालः सिंधिया अगर दोबारा चुनाव लड़ने आते हैं तो क्या गुना-शिवपुरी से ही वो चुनाव लड़ेंगे। क्योंकि बीच में सिंधिया के महल से ग्वालियर संसदीय सीट से चुनाव लड़ने की सुगबुगाहटें भी उड़ रही थीं, लेकिन गुना-शिवपुरी में सिंधिया की सक्रियता इस सवाल का जवाब माना जा सकता है।

दूसरा सवालः अगर सिंधिया अपनी ही सीट से फिर चुनाव लड़ते हैं तो उन्हें मात देने वाले केपी यादव का क्या होगा। क्या उन्हें किसी और सीट से चुनाव लड़ाया जाएगा या पिछला लोकसभा चुनाव केपी यादव का आखिरी लोकसभा चुनाव साबित होगा।

तीसरा सवालः अगर सिंधिया इसी सीट से चुनाव लड़ते हैं और केपी यादव कांग्रेस का रुख कर लेते हैं तो क्या नतीजे सामने आएंगे। क्या इस क्षेत्र का यादव समाज सिंधिया के लिए वोट करेगा। ये सवाल बाद की बात है कि अगर लोकसभा में टिकट नहीं मिलता है तो सिंधिया क्या करेंगे। क्या वो दोबारा राज्यसभा ही भेजे जाएंगे?

आंधी का रुख अब सिंधिया के हक में है!

एक बात और गौर करने वाली होगी कि सिंधिया इस बार चुनाव में उतरते हैं तो केपी यादव की लाख नाराजगी के बावजूद उनकी जीत तकरीबन तय ही होगी। इसकी दो बड़ी वजह आपको बताता हूं। पहली तो ये कि सिंधिया इस क्षेत्र का जाना माना और दमदार चेहरा हैं। वो पिछला चुनाव अपनी किसी गलती या असक्रियता की वजर से नहीं हारे। बल्कि, पिछले चुनाव में हार की वजह थी मोदी की आंधी, लेकिन ये दूसरा बड़ा फैक्टर है जो अब सिंधिया के साथ है। बीते लोकसभा चुनाव में जिस मोदी की आंधी ने सिंधिया का किला धराशायी कर दिया। उसी आंधी का रुख अब सिंधिया के हक में है। तो हार की संभावनाएं बेहद कम होना या न के बराबर होना लाजमी है। अब बस इंतजार है तो आलाकमान के इशारे का। अगर टिकट मिल जाता है तो सिंधिया राज्यसभा के जरिए नहीं बल्कि, लोकसभा के जरिए ही संसद पहुंच जाएंगे। 

सिंधिया ने प्राण प्रतिष्ठा में न जाकर शिवपुरी में कार्यक्रम देखा

वैसे इन चार सालों में सिंधिया भी बीजेपी के तौर तरीके अच्छी तरह सीख चुके हैं। लिहाजा पार्टी लाइन को फॉलो करते हुए इस मुद्दे पर फिलहाल खामोश हैं। न तो उन्होंने अटकलों को नकारा है न उन्हें माना है। सिंधिया ने अभी इस बारे में खुलकर किसी भी तरह की कोई बात नहीं कही है, जबकि कुछ दिन पहले भी वो इस क्षेत्र में एक्टिव नजर आए थे। बीते दिनों केंद्र सरकार की विकसित भारत संकल्प यात्रा के दौरान भी ज्योतिरादित्य सिंधिया ने गुना, शिवपुरी और अशोकनगर जिले में अलग-अलग कार्यक्रमों में भाग लिया था। इन यात्राओं के दौरान केंद्र की मोदी सरकार की उपलब्धियां को जनता की बीच जमकर गुणगान किया था। 22 जनवरी को अयोध्या में भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम हुआ था। इस कार्यक्रम में अयोध्या जाने की जगह सिंधिया ने अपने पुराने लोकसभा क्षेत्र को तरजीह दी। शिवपुरी के प्रसिद्ध हनुमान मंदिर में आम लोगों के बीच बैठकर उन्होंने ये पूरा कार्यक्रम देखा था। इस कार्यक्रम में सिंधिया तीन घंटे तक वहीं पर मौजूद रहे थे।

खैर... सिंधिया कुछ न कहें पर उनकी सक्रियता तो कुछ ओर ही कह रही है

सिंधिया कुछ कहें या न कहें उनकी सक्रियता ये साफ जाहिर करती है कि वो दोबारा चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। अब उनका एक एक कदम आलाकमान को कोई इशारा है या फिर आलाकमान के इशारे या इजाजत के बाद ही वो लोकसभा सीट पर एक्टिव हुए हैं। ये फिलहाल कहना जल्दबाजी होगा, लेकिन बीजेपी की लिस्ट और लिस्ट में गुना-शिवपुरी के प्रत्याशी का नाम ये साफ कर देगा कि सिंधिया क्या वाकई आलाकमान की नजरों में जिंदा नजर आए। या मेहनत में कोई कमी रह गई।

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