रामकाज के लिए 210 साल पहले शुरू हुआ था कारवां...
BP Shrivastava | Jan 02, 2024, 24:00 IST
रामकाज के लिए 210 साल पहले शुरू हुआ था कारवां...
'द सूत्र' की इस खास सीरीज में हम आपको बताने जा रहे हैं अयोध्या का 210 वर्ष का संपूर्ण वैभव...संघर्ष...असत्य की हार और अंत में सत्य की जीत की दास्तां...।
रविकांत दीक्षित @ BHOPAL.
अयोध्या मथुरा माया, काशी कांची अवंतिका,
पुरी द्वारावती चैव सप्तैया: मोक्षदायिका...।
यानी...अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवंतिका (उज्जैन) और द्वारका यह सात नगर मोक्ष प्रदान करने वाले हैं।
अयोध्या का वैभव तब और बढ़ जाएगा, जब यहां 22 जनवरी 2024 को अभिजीत मुहूर्त में रामलला पुन: मंदिर में विराजमान होंगे।
'द सूत्र' की इस खास सीरीज में हम आपको बताने जा रहे हैं अयोध्या का 210 वर्ष का संपूर्ण वैभव...संघर्ष...असत्य की हार और अंत में सत्य की जीत की दास्तां...।
अयोध्या...यानी अजेय।
अयोध्या यानी रामलला की जन्मभूमि, कर्मभूमि।
यही गौरव है भगवान विष्णु के मष्तक स्वरूप इस नगरी का।
प्रभु श्रीराम की प्राणों से प्यारी अयोध्या के दिन अब बहुर रहे हैं। सप्त पुरिया में अग्रणी यह नगर संवर रहा है।
आज की अयोध्या 210 वर्ष पहले ऐसी नहीं थी। अंग्रेजों का राज था। नवाबी दौर भी। ब्रिटिश हुकूमत के वक्त वर्ष 1813 में सबसे पहले श्रीराम जन्मभूमि का मामला उठा। कुछ हिंदू सामने आए। हालांकि इस समूह में कौन लोग थे, इतिहास में कहीं स्पष्ट रूप से उनका उल्लेख नहीं मिलता, पर दिखता है उनका उत्साह, साहस और संघर्ष।
मंदिर किसने तोड़ा, इसे लेकर लिखित इतिहास में अलग-अलग दावे हैं। यह बहस लंबी है।
हम आते हैं हिंदू संगठनों के दावे पर...
1813 में हिंदुओं के दावे के बाद हल्के-फुल्के विरोध सामने आए। इससे ब्रिटिश हुकुमत की नींद टूटी। कागजी कार्रवाई शुरू हुई। फैजाबाद के अंग्रेज अफसरों ने रिपोर्ट बनाकर लिखा, 'मस्जिद में हिंदू मंदिर जैसी कलाकृतियां हैं।' मामला ज्यादा तूल न पकड़े, इसलिए अंग्रेज अफसरों ने विवादित स्थल पर हिंदुओं को पूजा की अनुमति दे दी। जय श्रीराम के नारे गूंजने लगे। इन सबके बीच होनी को कुछ और ही मंजूर था।
3000 हिंदुओं का कत्लेआम
वरिष्ठ लेखक माधव भंडारी अपनी किताब 'अयोध्या: जो कभी पराजित नहीं हुई' में लिखते हैं, वर्ष 1827 में नसीरुद्दीन हैदर शाहजहां नवाबी सत्ता में आया। उसके एक गलत कदम से अयोध्या में विवाद हो गया। उसने कत्लेआम मचा दिया। चारों तरफ चीत्कार। फिर उसने अपनी सेना के 3000 हिंदुओं को मार डाला। महिलाओं को नहीं छोड़ा। एक ही दिन में 47 मंदिर तोड़ डाले।
क्या उदार था वाजिद अली?
सन् 1842 में अमजद अली शाह सत्ता में आया। उसने पांच वर्ष के अपने राज में धर्मांतरण का कहर बरपा दिया। इसके चलते संघर्ष की कई छोटी बड़ी घटनाएं हुई। इसके बाद अवध की सत्ता में आया वाजिद अली शाह काफी हद तक उदार था। हिंदू त्योहारों पर वह खुद उनमें शामिल होता था। हिंदू-मुस्लिम तनाव ना हो, इसके लिए उसने कई कोशिशें कीं, पर उसी के दौर में राम जन्मभूमि के मामले में कड़ा संघर्ष हुआ।
हनुमान गढ़ी का मानो वो 'युद्ध'
फरवरी 1855 में एक सुन्नी अगुआ शाह गुलाम हुसैन ने अफवाह फैला दी कि हनुमान गढ़ी का मंदिर एक मस्जिद को तोड़कर बनाया गया है। इसी के बाद उसने हमला बोल दिया। हनुमान गढ़ी के बैरागियों ने जवाबी हमले में उसे खदेड़ दिया था। तब उस लड़ाई में 75 मुस्लिम और 12 हिंदू मारे गए थे।
1853 के बाद के वो साल
फिर वर्ष 1853 में वाजिद अली के समय अयोध्या में पहली बार साम्प्रदायिक हिंसा भड़की। थोड़े दिन बाद मामला शांत हुआ। पर रह-रहकर दो साल तक विरोध की आग भड़कती रही।
वर्ष 1855 तक दोनों पक्ष एक ही स्थान पर पूजा और नमाज अदा करते रहे। 1855 के मध्य में मुस्लिमों को मस्जिद में प्रवेश की इजाजत मिली, लेकिन हिंदुओं को अंदर नहीं जाने दिया जाता था। जब बात नहीं बनी तो हिंदुओं ने मस्जिद की मुख्य गुम्बद से 150 फीट दूर बनाए राम चबूतरे पर पूजा शुरू कर दी।
चार वर्ष फिर यही क्रम चलता रहा। समय का पहिया आगे बढ़ा। हिंदू संगठन अयोध्या का सनातन वैभव लौटाने को मानो बेताब थे। वे ग्रंथों की व्याख्या करते। इतिहास के पन्ने पलटते।
पता चलता है कि वेदकालीन प्राचीन ग्रंथों में भी अयोध्या का वर्णन है। अथर्ववेद में लिखा है...
अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।
तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः।।
यानी...आठ चक्र और नौ द्वारों से सजी अयोध्या साक्षात् देवों की नगरी है। इसके राजकोष में सोने का भंडार जैसे दीप्तिमान स्वर्ग ही है।
अयोध्या में कुल मिलाकर तब तीन हजार से भी अधिक मंदिर एवं मठ हुआ करते थे। लिहाजा, इसे संतों की नगरी होने का भी गौरव प्राप्त है।
साधु-संतों की संख्या देख तब विष्णुभट्ट गोडसे वरसईकर ने अपनी पुस्तक 'माझा प्रवास' में लिखा था, दुनियाभर के साधु यहां एकत्रित हुए हैं।
ब्रिटिश सरकार ने लगवाई बाड़
चलिए फिर मुद्दे पर आते हैं...। हिंदुओं के दावे के बाद जब कोई हल नहीं निकला तो 1859 में अंग्रेजी सरकार ने विवादित स्थान के आसपास बाड़ लगवा दी। मुस्लिमों को ढांचे के अंदर और हिंदुओं को बाहर चबूतरे पर पूजा करने की मंजूरी मिली। 1855 से 1885 तक फैजाबाद के अफसरों के लिखित दस्तावेजों में मुस्लिमों की ओर से विवादित जमीन पर हिंदुओं की गतिविधियां बढ़ने की कई शिकायतें मिलती हैं।
इतिहास का नया अध्याय
सन् 1857 में हुए पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बाद और ईस्ट इंडिया कंपनी के कामकाज को लेकर शिकायतें बढ़ती जा रही थीं। यह देख ब्रिटेन की महारानी ने कड़ा फैसला लिया। आखिरकार ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकार खारिज कर 1858 में भारत पर अपनी सत्ता काबिज कर ली। केवल अयोध्या का ही नहीं, तब भारत के इतिहास का भी एक नया अध्याय यहां से शुरू हुआ।
जब कांग्रेस का गठन हुआ
इस बीच चबूतरे पर भगवान की पूजा होती रही। 1885 में पहली बार यह केस अदालत की चौखट तक पहुंचा। महंत रघुबर दास ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने रामलला के चबूतरे पर छतरी लगाने की अर्जी लगाई। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि वे मंदिर बनवाना चाहते थे, पर दोनों में से कोई काम नहीं हो सका। अदालत ने महंत की अपील ठुकरा दी। इसी साल देश में राजनीतिक उठापटक का क्रम शुरू हुआ और साल के आखिर में 28 दिसंबर को बंबई (मुंबई) में बड़ी बैठक हुई। यहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ। ब्रिटिश सरकार ने लॉर्ड रैंडोल्फ चर्चिल को भारत का सचिव बनाया।
इस भाग में आपने जाना कि कब पहली बार सामने आया था अयोध्या विवाद। कैसे 1813 से 1885 तक के वर्षों में गतिविधियां चलीं। अंग्रेजों ने क्या किया। नवाबी दौर में क्या खास था।
अयोध्या नामा के अगले भाग में जानिए वर्ष 1885 से 1934 तक की दास्तां।
अयोध्या मथुरा माया, काशी कांची अवंतिका,
पुरी द्वारावती चैव सप्तैया: मोक्षदायिका...।
यानी...अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवंतिका (उज्जैन) और द्वारका यह सात नगर मोक्ष प्रदान करने वाले हैं।
अयोध्या का वैभव तब और बढ़ जाएगा, जब यहां 22 जनवरी 2024 को अभिजीत मुहूर्त में रामलला पुन: मंदिर में विराजमान होंगे।
'द सूत्र' की इस खास सीरीज में हम आपको बताने जा रहे हैं अयोध्या का 210 वर्ष का संपूर्ण वैभव...संघर्ष...असत्य की हार और अंत में सत्य की जीत की दास्तां...।
अयोध्या...यानी अजेय।
अयोध्या यानी रामलला की जन्मभूमि, कर्मभूमि।
यही गौरव है भगवान विष्णु के मष्तक स्वरूप इस नगरी का।
प्रभु श्रीराम की प्राणों से प्यारी अयोध्या के दिन अब बहुर रहे हैं। सप्त पुरिया में अग्रणी यह नगर संवर रहा है।
आज की अयोध्या 210 वर्ष पहले ऐसी नहीं थी। अंग्रेजों का राज था। नवाबी दौर भी। ब्रिटिश हुकूमत के वक्त वर्ष 1813 में सबसे पहले श्रीराम जन्मभूमि का मामला उठा। कुछ हिंदू सामने आए। हालांकि इस समूह में कौन लोग थे, इतिहास में कहीं स्पष्ट रूप से उनका उल्लेख नहीं मिलता, पर दिखता है उनका उत्साह, साहस और संघर्ष।
मंदिर किसने तोड़ा, इसे लेकर लिखित इतिहास में अलग-अलग दावे हैं। यह बहस लंबी है।
हम आते हैं हिंदू संगठनों के दावे पर...
1813 में हिंदुओं के दावे के बाद हल्के-फुल्के विरोध सामने आए। इससे ब्रिटिश हुकुमत की नींद टूटी। कागजी कार्रवाई शुरू हुई। फैजाबाद के अंग्रेज अफसरों ने रिपोर्ट बनाकर लिखा, 'मस्जिद में हिंदू मंदिर जैसी कलाकृतियां हैं।' मामला ज्यादा तूल न पकड़े, इसलिए अंग्रेज अफसरों ने विवादित स्थल पर हिंदुओं को पूजा की अनुमति दे दी। जय श्रीराम के नारे गूंजने लगे। इन सबके बीच होनी को कुछ और ही मंजूर था।
3000 हिंदुओं का कत्लेआम
वरिष्ठ लेखक माधव भंडारी अपनी किताब 'अयोध्या: जो कभी पराजित नहीं हुई' में लिखते हैं, वर्ष 1827 में नसीरुद्दीन हैदर शाहजहां नवाबी सत्ता में आया। उसके एक गलत कदम से अयोध्या में विवाद हो गया। उसने कत्लेआम मचा दिया। चारों तरफ चीत्कार। फिर उसने अपनी सेना के 3000 हिंदुओं को मार डाला। महिलाओं को नहीं छोड़ा। एक ही दिन में 47 मंदिर तोड़ डाले।
क्या उदार था वाजिद अली?
सन् 1842 में अमजद अली शाह सत्ता में आया। उसने पांच वर्ष के अपने राज में धर्मांतरण का कहर बरपा दिया। इसके चलते संघर्ष की कई छोटी बड़ी घटनाएं हुई। इसके बाद अवध की सत्ता में आया वाजिद अली शाह काफी हद तक उदार था। हिंदू त्योहारों पर वह खुद उनमें शामिल होता था। हिंदू-मुस्लिम तनाव ना हो, इसके लिए उसने कई कोशिशें कीं, पर उसी के दौर में राम जन्मभूमि के मामले में कड़ा संघर्ष हुआ।
हनुमान गढ़ी का मानो वो 'युद्ध'
फरवरी 1855 में एक सुन्नी अगुआ शाह गुलाम हुसैन ने अफवाह फैला दी कि हनुमान गढ़ी का मंदिर एक मस्जिद को तोड़कर बनाया गया है। इसी के बाद उसने हमला बोल दिया। हनुमान गढ़ी के बैरागियों ने जवाबी हमले में उसे खदेड़ दिया था। तब उस लड़ाई में 75 मुस्लिम और 12 हिंदू मारे गए थे।
1853 के बाद के वो साल
फिर वर्ष 1853 में वाजिद अली के समय अयोध्या में पहली बार साम्प्रदायिक हिंसा भड़की। थोड़े दिन बाद मामला शांत हुआ। पर रह-रहकर दो साल तक विरोध की आग भड़कती रही।
वर्ष 1855 तक दोनों पक्ष एक ही स्थान पर पूजा और नमाज अदा करते रहे। 1855 के मध्य में मुस्लिमों को मस्जिद में प्रवेश की इजाजत मिली, लेकिन हिंदुओं को अंदर नहीं जाने दिया जाता था। जब बात नहीं बनी तो हिंदुओं ने मस्जिद की मुख्य गुम्बद से 150 फीट दूर बनाए राम चबूतरे पर पूजा शुरू कर दी।
चार वर्ष फिर यही क्रम चलता रहा। समय का पहिया आगे बढ़ा। हिंदू संगठन अयोध्या का सनातन वैभव लौटाने को मानो बेताब थे। वे ग्रंथों की व्याख्या करते। इतिहास के पन्ने पलटते।
पता चलता है कि वेदकालीन प्राचीन ग्रंथों में भी अयोध्या का वर्णन है। अथर्ववेद में लिखा है...
अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।
तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः।।
यानी...आठ चक्र और नौ द्वारों से सजी अयोध्या साक्षात् देवों की नगरी है। इसके राजकोष में सोने का भंडार जैसे दीप्तिमान स्वर्ग ही है।
अयोध्या में कुल मिलाकर तब तीन हजार से भी अधिक मंदिर एवं मठ हुआ करते थे। लिहाजा, इसे संतों की नगरी होने का भी गौरव प्राप्त है।
साधु-संतों की संख्या देख तब विष्णुभट्ट गोडसे वरसईकर ने अपनी पुस्तक 'माझा प्रवास' में लिखा था, दुनियाभर के साधु यहां एकत्रित हुए हैं।
ब्रिटिश सरकार ने लगवाई बाड़
चलिए फिर मुद्दे पर आते हैं...। हिंदुओं के दावे के बाद जब कोई हल नहीं निकला तो 1859 में अंग्रेजी सरकार ने विवादित स्थान के आसपास बाड़ लगवा दी। मुस्लिमों को ढांचे के अंदर और हिंदुओं को बाहर चबूतरे पर पूजा करने की मंजूरी मिली। 1855 से 1885 तक फैजाबाद के अफसरों के लिखित दस्तावेजों में मुस्लिमों की ओर से विवादित जमीन पर हिंदुओं की गतिविधियां बढ़ने की कई शिकायतें मिलती हैं।
इतिहास का नया अध्याय
सन् 1857 में हुए पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बाद और ईस्ट इंडिया कंपनी के कामकाज को लेकर शिकायतें बढ़ती जा रही थीं। यह देख ब्रिटेन की महारानी ने कड़ा फैसला लिया। आखिरकार ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकार खारिज कर 1858 में भारत पर अपनी सत्ता काबिज कर ली। केवल अयोध्या का ही नहीं, तब भारत के इतिहास का भी एक नया अध्याय यहां से शुरू हुआ।
जब कांग्रेस का गठन हुआ
इस बीच चबूतरे पर भगवान की पूजा होती रही। 1885 में पहली बार यह केस अदालत की चौखट तक पहुंचा। महंत रघुबर दास ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने रामलला के चबूतरे पर छतरी लगाने की अर्जी लगाई। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि वे मंदिर बनवाना चाहते थे, पर दोनों में से कोई काम नहीं हो सका। अदालत ने महंत की अपील ठुकरा दी। इसी साल देश में राजनीतिक उठापटक का क्रम शुरू हुआ और साल के आखिर में 28 दिसंबर को बंबई (मुंबई) में बड़ी बैठक हुई। यहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ। ब्रिटिश सरकार ने लॉर्ड रैंडोल्फ चर्चिल को भारत का सचिव बनाया।
इस भाग में आपने जाना कि कब पहली बार सामने आया था अयोध्या विवाद। कैसे 1813 से 1885 तक के वर्षों में गतिविधियां चलीं। अंग्रेजों ने क्या किया। नवाबी दौर में क्या खास था।
अयोध्या नामा के अगले भाग में जानिए वर्ष 1885 से 1934 तक की दास्तां।
- शिलालेखों का रहस्य।
- वो दंगों का दर्द।
- बाबरी का विध्वंस।
अयोध्या के 210 सालों का इतिहास अयोध्यानामा भाग - 1
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.#rammandir #ramlala #ramidol #ayodhya #ayodhyarammandir #ayodhyadham #pramprathistha #sanctumsanctorum pic.twitter.com/99Jy2kpslU
— TheSootr (@TheSootr) January 2, 2024
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