राम, हनुमान, रावण का स्वरूप क्या था, हमारे महाकाव्य में साफतौर पर लिखा है, फिर ‘आदिपुरुष’ में सस्ता प्रयोग क्यों?

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रामायण में वाल्मीकि ने श्रीराम के बारे में छोटी-से छोटी बातें बताई हैं। उन्होंने श्रीराम के स्वभाव और गुण के बारे में तो बताया ही है, वहीं उन्होंने अपने ग्रंथ में श्रीराम के रंग,रुप और शारीरिक संरचना का भी वर्णन किया है।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम के बाल लंबे और चमकदार थे। चेहरा चंद्रमा के समान सौम्य, कांतिवाला कोमल और सुंदर था। उनकी आंखे बड़ी और कमल के समान थी यानी राम राजीवलोचन थे। उन्नत नाक यानी चेहरे के अनुरूप सुडौल और बड़ी नाक थी। उनके होठों का रंग उगते हुए सूर्य की तरह लाल था और दोनों होंठ समान थे। उनके कान बड़े थे। जिनमें कुंडल शोभा बढ़ाते थे। उनके हाथ लंबे थे जो घुटनों तक आते थे। इसलिए उन्हें आजानुबाहु कहा गया है। पेट भी उन्नत यानी शरीर के निचले हिस्से के अनुपात में ज्यादा बड़ा नहीं और ज्यादा छोटा भी नहीं था। उनका पेट तीन रेखाओं से युक्त था, जिसे अतिशुभ माना गया है। श्रीराम के पैरों की लंबाई शरीर के उपरी हिस्से के समानुपात में थी।

श्रीराम किसी के दोष नहीं देखते थे। वे सदा शांत रहते थे और सांत्वनापूर्वक मीठे वचन बोलते थे। उनसे कोई कठोर वचन भी बोलता तो श्रीराम उस बात का जवाब नहीं देते थे। कभी कोई एक बार भी उपकार कर देता तो वो उस एक उपकार से सदा संतुष्ट रहते थे। मन को वश में रखते थे। श्रीराम किसी के सैकड़ों अपराध को भी याद नहीं रखते थे। झूठी बातें उनके मुख से कभी नहीं निकलती थी। वो वृद्ध लोगों का सम्मान करते थे। प्रजा के प्रति उनका और उनके प्रति प्रजा का अनुराग था। श्रीराम दयालु, क्रोध को जीतने वाले और ब्राह्मणों की पूजा करते थे। दुखी लोगों के प्रति दया रखते थे

श्रीराम पराक्रमी थे। भूमंडल में उनके समान कोई नहीं था। वे विद्वान और बुद्धिमान थे। वो निरोगी थे। श्रीराम हमेशा युवा ही रहे। वे अच्छे वक्ता थे। श्रीराम देश-काल के तत्व को समझने वाले थे, इसके साथ ही संपूर्ण विद्याओं के विद्वान थे। वे वेदों के ज्ञाता और शस्त्र विद्या में अपने पिता से भी आगे थे। उनकी स्मरणशक्ति अद्भुत थी। समय-समय पर होने वाला उनका क्रोध या हर्ष कभी निष्फल नहीं होता, यानी उसका भी फल मिलता था। वो वस्तुओं के त्याग और संग्रह को अच्छी तरह जानते थे। अस्त्र-शस्त्रों के अभ्यास में समय देने के अलावा श्रीराम समय निकालकर ज्ञान, उत्तम चरित्र और महात्माओं के साथ बिताने की कोशिश करते और ज्ञानियों से कुछ ना कुछ सीखते रहते थे। और सदा ही मीठा बोलते थे। दूसरों से बात करते समय अच्छी बातें बोलते थे, जिससे सामने वाले का उत्साह और विश्वास बढ़े। श्रीराम पराक्रमी होने के बावजूद खुद की शक्तियों पर कभी घमंड नहीं करते थे।

अब बात हनुमान जी की....हनुमानजी हमारे बीच इस धरती पर सशरीर मौजूद हैं। किसी भी व्यक्ति को जीवन में श्रीराम की कृपा के बिना कोई भी सुख-सुविधा प्राप्त नहीं हो सकती। श्रीराम की कृपा प्राप्ति के लिए हमें हनुमानजी को प्रसन्न होगा। उनकी आज्ञा के बिना कोई भी श्रीराम तक पहुंच नहीं सकता। 

हनुमानजी इस कलयुग के अंत तक अपने शरीर में ही रहेंगे। वे आज भी धरती पर विचरण करते हैं। हनुमानजी को धर्म की रक्षा के लिए अमरता का वरदान मिला था। इस वरदान के कारण आज भी हनुमानजी जीवित हैं और वे भगवान के भक्तों तथा धर्म की रक्षा में लगे हुए हैं। अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और ऋषि मार्कंडेय ये आठ चिरंजीवी हैं यानी आठों अमर हैं।  जब कल्कि रूप में भगवान विष्णु अवतार लेंगे, ये सभी अपने रूप में प्रकट हो जाएंगे। हनुमान सिर्फ रामभक्त हैं। वे सिर्फ रामभक्तों को ही चाहते हैं। हनुमान सिर्फ रामभक्ति में ही लीन रहते हैं। राम काज करिबे को आतुर....राम सीता को उन्हें हृदय में बैठाकर रखा है।

अब रावण की बात....पद्मपुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकशिपु, दूसरे जन्म में रावण और कुम्भकर्ण के रूप में पैदा हुए। वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण पुलस्त्य मुनि का पौत्र था अर्थात् पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा का पुत्र था। विश्रवा की वरवर्णिनी, राका और कैकसी 3 पत्नियां थी। वरवर्णिनी से कुबेर को जन्म के बाद कैकसी से रावण , कुंभकर्ण और विभीषण पैदा हुए।  कैकसी से एक शूर्पणखा का भी जन्म हुआ। राका से अहिरावण और महिरावण जुड़वा पुत्रों का जन्म हुआ। रावण अपार बलशाली और तपोनिष्ठ था। रावण ने ब्रह्मा जी से नाभि कुंड मे अमृत पाया था। इससे उसकी मृत्यु सिर्फ भगवान नारायण के अतिरिक्त किसी और से नहीं हो सकती थी। और ऐसा ही हुआ। कहा जाता है कि रावण रोज लंका से पुष्पक विमान से कैलाश जाता था और शिव आराधना करता था। रावण ने तीनों लोकों को अपनी गति से चलाने वाले नौ ग्रहों को जब अपने अधीन कर लिया और दिगपालों से उसने अपने लंका के मार्गो मे जल छिड़काव के काम में लगा दिया। 

एक दिन रावण भक्ति और शक्ति के बल पर कैलाश समेत महादेव को लंका में ले जाने का प्रयास किया। जैसे ही उसने कैलाश पर्वत को अपने हाथों में उठाया तो शिव की पत्नी सती फिसलने लगीं। उन्होंने महादेव से पूछा कि भगवन ये कैलाश हिल क्यों रहा है। महादेव ने बताया, रावण हमें लंका ले जाने की कोशिश में है। रावण ने जब महादेव समेत कैलाश पर्वत को अपने हाथों में उठाया तो उसे बहुत घमंड भी आ गया कि अगर वो महादेव सहित कैलाश पर्वत को उठा सकता है तो अब उसके लिये कुछ भी नहीं। रावण जैसे ही एक कदम आगे रखा तो उसका संतुलन डगमगाया, लेकिन इसके बाद भी वो अपनी कोशिश में लगा रहा। इतने में सती एक बार फिर फिसल गई। उन्होंने क्रोध में रावण को श्राप दे दिया कि अभिमानी रावण तू आज से राक्षसों में गिना जाएगा, क्युँकि तेरी प्रकृति राक्षसों की जैसी हो गई है और तू अभिमानी हो गया है।

रावण ने सती के शब्दों पर फिर भी ध्यान नहीं दिया। तब भगवान शिव ने अपना भार बढ़ाना शुरू किया और उस भार से रावण ने कैलाश पर्वत को धीरे से उसी जगह पर रख दिया। भार से उसका एक हाथ दब गया और वो दर्द से चिल्लाया। उसके चिल्लाने की आवाज स्वर्ग तक सुनाई दी और वो कुछ देर तक बेहोश हो गया। होश आने पर उसने भगवान महादेव की स्तुति की

 जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले

गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।

डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं

चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥

भोलेनाथ ने स्तुति से प्रसन्न होकर उससे कहा कि रावण मैं नृत्य तभी करता हूं, जब क्रोध में होता हूं, इसलिये क्रोध में किए नृत्य को तांडव कहा जाता है, लेकिन आज तुमने अपनी इस सुंदर स्रोत से और सुंदर गायन से मेरा मन प्रसन्नतापूर्वक नृत्य करने का हो गया। भगवान शिव ने रावण को प्रसन्न होकर चंद्रहास तलवार दी, जिसके हाथ में रहने पर उसे तीन लोक में कोई यु्द्ध में नहीं हरा सकता था। देवी सती के श्राप के बाद से ही रावण की गिनती राक्षसों में होने लगी, राक्षसी संगति में अभिमान, गलत काम और भी बढ़ते चले गए।