सिंहासन छत्तीसी : सर और मेडम के गठजोड़ से हो रहा जंगल में मंगल, माननीय को चाहिए चिट्ठी लिखने की फीस

Arun Tiwari | Feb 01, 2026, 11:25 IST
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छत्तीसगढ़ में इन दिनों एक डीएफओ और एक डीएसपी के बीच गठजोड़ की चर्चा हो रही है। साथ ही कुछ माननीयों द्वारा विकास योजनाओं की चिट्ठी लिखने के लिए शुल्क लिया जा रहा है, जो राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र पर सवाल उठाता है।

Raipur. छत्तीसगढ़ में फिर राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों का पारा बढ़ा हुआ है। एक डीएफओ और एक डीएसपी का गुट नए-नए कारनामें करने में लगा हुआ है। ये अफसर वही हैं जो आजकल खूब चर्चा में हैं। धौंस भी ऐसी है कि कोई बाल भी बांका नहीं कर पा रहा।



वहीं कुछ माननीय भी चर्चा में आ गए हैं। चर्चा में इसलिए क्योंकि सत्ताधारी दल से जो जुड़े हैं, उनको पत्र लिखने के लिए भी शुल्क चाहिए। छत्तीसगढ़ में जमीनों का खेल बदस्तूर जारी है। राजस्व विभाग के अधिकारी खूब फर्जीवाड़ा कर रहे हैं और कॉलर ऊंची कर घूम रहे हैं। छत्तीसगढ़ की राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों की ऐसी ही अनसुनी खबरों के लिए पढ़िए द सूत्र का साप्ताहिक कॉलम सिंहासन छत्तीसी।



सर और मेडम का जंगल में मंगल

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छत्तीसगढ़ में इन दिनों एक सर और एक मेडम की बहुत चर्चा है। रिश्ते भी निकटता के हैं, इसलिए चर्चा होना भी लाजिमी है। साहब फॉरेस्ट से हैं और मेडम पुलिस से। यानी यहां पर जंगल में मंगल की कहानी है। सर विवाहित हैं लेकिन सोशल मीडिया में सिंगल बताते हैं।



खुद को केंद्रीय मंत्रियों का करीबी बताकर धौंस भी जमाते हैं। उनके आचरण पर कई बार सवाल भी खड़े हो चुके हैं। जब वह दौरे पर होते हैं तो अधीनस्थ उनकी सेवा के सभी सामान जुटाने में लग जाते हैं। सभी मतलब सभी, यानी शराब, कबाब और साकी भी। इन साहब के संपर्क में जब मेडम आईं तो दोनों का गठजोड़ बन गया।



इस गठजोड़ ने कुछ ऐसा काम शुरू किया जिससे जमकर कमाई होने लगी। सर तो पहले से ही इस काम में मास्टर थे, मेडम भी उनको वैसी ही मिल गईं। अब चलने लगा है जंगल में मंगल। यह पूरा घटनाक्रम केवल व्यक्तिगत अनैतिकता का मामला नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। यदि सूत्रों के आरोप सही हैं, तो यह सत्ता, वर्दी और पद के दुरुपयोग का एक और घिनौना उदाहरण है।



माननीय को चाहिए चिट्ठी लिखने की फीस:

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बीजेपी की सरकार बने हुए दो साल से ज्यादा का समय हो गया है। कहने को छत्तीसगढ़ में सुशासन चल रहा है, लेकिन सुशासन वाली पार्टी के माननीय ही इसकी पोल खोल रहे हैं। कुछ माननीयों को अपने लेटरहेड पर चिट्ठी लिखने के लिए भी फीस चाहिए। फीस यानी विकास योजनाओं में हिस्सा।



कुछ विधायक स्थानीय स्तर पर तैयार होने वाली विकास योजनाओं के प्रस्ताव से जुड़ी चिट्ठी लिखने के लिए पैसा मांग रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि विधायक को जब यह समझाया गया कि यह तो सिर्फ प्रस्ताव है।



जमीन पर एक पैसे का काम नहीं हुआ है। होगा भी या नहीं, यह मालूम नहीं है। ऐसे में फिर पैसा मांगने का क्या तुक है। माननीय ने बोला, प्रस्ताव तो जा रहा है ना। स्याही की क़ीमत तो लगेगी ही। यह शिकायतें संगठन के पास पहुंची हैं। संगठन अब इस मामले में गंभीर हो चला है।



100 करोड़ की जमीन

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सहकारी समिति की जमीन का किस कदर फर्जीवाड़ा कर कमाई की गई इसका एक और उदाहरण हम आपको बताते हैं। इस जमीन में दलाल है, पटवारी है, आरआई है और तहसीलदार भी। लेकिन इसके बाद भी यह वाइट कॉलर अधिकारी कॉलर ऊंची कर घूम रहे हैं।



राजधानी रायपुर की बेशकीमती जमीन मूलतः बुनकर सहकारी समिति की थी। कुल साढ़े चार एकड़ इस जमीन का सौदा एक जमीन दलाल द्वारा लगभग 100 करोड़ रुपये में कराया गया। इस पूरे खेल में तत्कालीन आरआई, पटवारी और तहसीलदार की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है।



इस गैंग ने ऐसे खसरा नंबर गढ़े जो अस्तित्व में ही नहीं थे, और उन्हीं फर्जी खसरा नंबरों का सीमांकन व बटांकन किया गया। जब बुनकर सहकारी समिति ने इस घोटाले पर आपत्ति दर्ज कराई, तो केवल पटवारी को निलंबित कर मामले को रफा-दफा कर दिया गया, जबकि पूरा गिरोह सुरक्षित बचा लिया गया।



मामले की गंभीरता को देखते हुए एसआईटी गठित की गई, लेकिन दो वर्ष बीत जाने के बाद भी आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। विशेष बात यह है कि मामले का मास्टरमाइंड जमीन दलाल वही है जो भारत माला जमीन घोटाले का भी मास्टरमाइंड था।



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आखिर वह कौन सी चिट्ठी आई है, जिसने एक मंत्री को मुश्किल में डाल दिया है और क्यों पुलिस कमिश्नरी की चमक फीकी पड़ गई?



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