भारतमाला परियोजना के दायरे में न आने वाली जमीन का 74 करोड़ मुआवजा
NEWS IN SHORT
- भारतमाला प्रोजेक्ट में फर्जीवाड़ा
- प्रोजेक्ट में न आने वाली ज़मीन पर मुआवजा
- 50 एकड़ जमीन का बांटा मुआवजा
- ईडी की कार्रवाई के बाद हो रहे खुलासे
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RAIPUR : छत्तीसगढ़ में भारतमाला परियोजना के तहत जमीन अधिग्रहण और मुआवजा वितरण में ईडी की कार्रवाई के बाद गड़बड़ियों का मामला लगातार बढ़ता जा रहा है। अब राजनांदगांव और दुर्ग जिले के गांवों की ज़मीन से जुड़ा एक नया मामला सामने आया है, जिसमें सड़क की सीमा से काफी दूर स्थित जमीनों को भी अधिग्रहण में शामिल कर करोड़ों रुपए का मुआवजा बांटने के आरोप लगे हैं। मामले के सामने आने के बाद प्रशासनिक और राजस्व अमले में हड़कंप मच गया है।
अफसरों की मिलीभगत:
जानकारी के मुताबिक भारतमाला सड़क परियोजना के लिए जिन जमीनों का अधिग्रहण किया जाना था, उनकी सीमा तय थी। लेकिन जांच में सामने आया कि कई ऐसी जमीनों को भी अधिग्रहण सूची में शामिल कर लिया गया, जहां से प्रस्तावित सड़क गुजरती ही नहीं है। आरोप है कि एनएचएआई के इंजीनियरों, राजस्व अधिकारियों और स्थानीय स्तर पर जुड़े कुछ लोगों की मिलीभगत से यह पूरा खेल किया गया।
3 किलोमीटर दूर की ज़मीन का मुआवजा:
बताया जा रहा है कि राजनांदगांव के देवदा क्षेत्र में करीब 77 खसरों को अधिग्रहण के दायरे में लिया गया। इनमें कई खसरे सड़क की वास्तविक सीमा से 100 मीटर से लेकर तीन किलोमीटर तक दूर बताए जा रहे हैं।
इसके बावजूद इन जमीनों को सड़क परियोजना से प्रभावित बताते हुए मुआवजा जारी कर दिया गया। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार करीब 33 करोड़ रुपये का मुआवजा ऐसी जमीनों के नाम पर वितरित किया गया, जिनका सड़क निर्माण से सीधा संबंध नहीं था।
यहां बंटा 29 करोड़ का मुआवजा:
इसी तरह राजनांदगांव के टेडेसरा गांव में भी गड़बड़ी का एक बड़ा मामला सामने आया है। यहां करीब 42 खसरों को अधिग्रहण सूची में शामिल किया गया, जबकि इनमें से कई जमीनें प्रस्तावित सड़क से काफी दूरी पर स्थित थीं।
बताया जा रहा है कि कुछ मामलों में सड़क से 50 मीटर से लेकर एक किलोमीटर दूर तक की जमीनों को भी प्रभावित श्रेणी में डाल दिया गया। यहां लगभग 29 करोड़ रुपये के मुआवजे के वितरण की बात सामने आई है।
दुर्ग जिले में भी गड़बड़ी:
दुर्ग जिले की पतन तहसील में भी कुछ इन तरह का मामला सामने आया है। यह गड़बड़ी फूंडा गांव में हुई। यहां दायरे से बाहर के खसरों को अधिग्रहण में शामिल कर 12 करोड़ का मुआवजा बना दिया गया।
कई स्तर पर अनदेखी:
जांच से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि अधिग्रहण की प्रक्रिया में कई स्तरों पर नियमों की अनदेखी की गई। सामान्य रूप से सड़क निर्माण के लिए तय चौड़ाई और सीमा के भीतर की जमीनों का ही अधिग्रहण किया जाता है, लेकिन इस मामले में सीमांकन और रिकॉर्ड में हेरफेर कर अतिरिक्त जमीनें जोड़ दी गईं। इससे वास्तविक प्रभावित किसानों के बजाय अन्य लोगों को भी लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई।
रिकॉर्ड की पड़ताल:
मामले के उजागर होने के बाद अब रिकॉर्ड खंगालने का काम शुरू हो गया है। राजस्व विभाग, तहसील कार्यालय और एनएचएआई से जुड़े दस्तावेजों की जांच की जा रही है। कई नक्शों और रिकॉर्ड में अंतर भी सामने आया है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि अधिग्रहण की स्वीकृति किन अधिकारियों की अनुशंसा पर दी गई और मुआवजा जारी करने की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई।
ईडी के पास पहुंचे दस्तावेज़:
सूत्रों के अनुसार शिकायतकर्ता ने मामले से जुड़े दस्तावेज जांच एजेंसियों को उपलब्ध कराए हैं। शिकायत के बाद ईडी की टीम ने भी कुछ मामलों में जानकारी जुटानी शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि शिकायतकर्ता को पूछताछ और दस्तावेज सत्यापन के लिए बुलाया गया था, जहां उन्होंने जमीन अधिग्रहण और मुआवजा वितरण से जुड़े कई अहम तथ्य रखे।
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर बात यह मानी जा रही है कि सड़क निर्माण के नाम पर सरकारी धन का बड़ा हिस्सा संदिग्ध तरीके से बांटा गया। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो कई अधिकारियों और संबंधित लोगों पर कार्रवाई हो सकती है। फिलहाल प्रशासन पूरे मामले की तह तक जाने की बात कह रहा है।
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