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NEWS IN SHORT :
- GAD के आदेश से मैदानी कर्मचारी परेशान
- आधार बेस्ड अटेंडेंस सिस्टम के कारण शासन-कर्मचारी आमने सामने
- कर्मचारियों का डर आधार उपयोग से बैंक अकाउंट हो सकते हैं खाली
- स्वास्थ्यकर्मियों की सेवा आपातकालीन तर्क दे रहे कर्मचारी
- पुलिसकर्मियों को इस अटेंडेस से शासन ने दी है छूट
- आदेश के खिलाफ स्वास्थ्य संघ पहुंचा हाईकोर्ट
NEWS IN DETAIL :
छत्तीसगढ़ सरकार ने सामान्य प्रशासन विभाग के माध्यम से वर्ष 2023 के अंत और 2024 की शुरुआत में चरणबद्ध तरीके से आधार बेस्ड अटेंडेंस प्रणाली लागू करने के निर्देश जारी किए थे। इसका उद्देश्य सरकारी कार्यालयों में लेट लतीफी को दूर करना और जवाबदेही बढ़ाना बताया गया। शुरुआत में इसे मुख्यालय और जिला कार्यालयों में लागू किया गया, इसके बाद स्वास्थ्य, शिक्षा और मैदानी अमले वाले विभागों तक इसका विस्तार किया गया।
नई व्यवस्था के तहत कर्मचारियों को रोजाना कार्यालय में पहुंचकर आधार से लिंक बायोमेट्रिक मशीन पर फिंगरप्रिंट या फेस स्कैन के जरिए उपस्थिति दर्ज करानी अनिवार्य की गई। हालांकि पुलिस विभाग को इससे दूर रखा गया है। प्रदेश भर के कर्मचारी अब इस आदेश का विरोध कर रहे हैं। उनके अनुसार सामान्य प्रशासन का यह आदेश व केवल नियमविरुद्ध है बल्कि वास्तविकता से बहुत दूर है। स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों ने अपने आवेदन को इसे भी आधार बनाया है।
स्वास्थ्य कर्मचारियों ने किया कोर्ट का रुख
स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ और मैदानी कर्मचारी इस प्रणाली के सबसे बड़े विरोधी बनकर सामने आए हैं। उनका कहना है कि अस्पतालों में शिफ्ट ड्यूटी, आपातकालीन सेवाएं, फील्ड विजिट और आकस्मिक परिस्थितियां आम बात हैं। ऐसे में तय समय पर एक ही स्थान पर बायोमेट्रिक अटेंडेंस देना व्यवहारिक नहीं है। इसी को लेकर स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी संगठनों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि आधार आधारित अटेंडेंस को अनिवार्य करना सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन है। कर्मचारियों ने इसे निजता के अधिकार से भी जोड़ा है।
कर्मचारी क्या कर रहे हैं
कर्मचारी संगठनों ने जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। ज्ञापन सौंपने से बात नहीं बनी तो सोशल मीडिया के जरिए सरकार के फैसले के खिलाफ अभियान चलाया। संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि आदेश वापस नहीं लिया गया या इसमें संशोधन नहीं हुआ, तो राज्यव्यापी आंदोलन करेंगे। स्वास्थ्य विभाग के साथ-साथ शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल विकास और ग्रामीण क्षेत्रों में पदस्थ कर्मचारियों ने भी समर्थन देना शुरू कर दिया है।
SC की गाइडलाइन क्या कहती है
आधार कार्ड और उसके उपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आधार का उपयोग केवल उन्हीं योजनाओं और सेवाओं में अनिवार्य किया जा सकता है, जिन्हें कानून द्वारा मान्यता दी गई हो। कोर्ट ने यह भी कहा है कि आधार को हर सेवा जैसे किसी व्यक्ति को नौकरी, वेतन या सेवा शर्तों से वंचित करने अनिवार्य नहीं किया जा सकता। जब तक कि इसके लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान न हो। कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि आधार बेस्ड अटेंडेंस प्रणाली सेवा शर्तों में एकतरफा बदलाव है और इसके लिए न तो कोई अधिनियम है और न ही कर्मचारियों की सहमति।
क्यों हैं कर्मचारी नाराज?
छग राज्य अधिकारी कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष आलोक मिश्रा का कहना है कि स्वास्थ्य सेवा एक आपातकालीन सेवा है जिसमें 24 घंटे में से कभी भी उपस्थित होना पड़ सकता है। कई इलाकों में नेटवर्क की समस्या, बिजली कटौती और तकनीकी खराबी आम है। फिंगरप्रिंट न मिलने, मशीन खराब होने या सर्वर डाउन रहने की स्थिति में कर्मचारियों की उपस्थिति दर्ज नहीं हो पाती।
जिसका असर वेतन और सेवा रिकॉर्ड पर पड़ता है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में पदस्थ कर्मचारियों ने बताया कि वहां बायोमेट्रिक मशीनें शोपीस बनकर रह गई हैं, लेकिन गैरहाजिरी का डर बना रहता है। जिस तरह पुलिस को इससे दूर रखा गया है, स्वास्थ्यकर्मियों के लिए भी अनिवार्यता समाप्त हो।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ में आधार बेस्ड अटेंडेंस प्रणाली फिलहाल अनुशासन और निजता के बीच टकराव का मुद्दा बन चुकी है। एक तरफ सरकार इसे सुधार का औजार बता रही है, तो दूसरी ओर कर्मचारी इसे अव्यवहारिक और कानूनी रूप से संदिग्ध मान रहे हैं। अब सबकी निगाहें कोर्ट के फैसले और सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि यह व्यवस्था सख्ती से लागू होगी या संशोधन के रास्ते से गुजरेगी।
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