सरकारी कागज में नहीं अबूझमाड़ जंगल का वजूद, नक्सल खात्मे के बाद खनिज का खजाना तलाशने की तैयारी, जंगल में हैं रेयर मिनरल
Raipur. नक्सल खात्मे का दावा करने वाली सरकार अब अबूझमाड़ को बूझने में लगी है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि रेड कॉरिडोर का नाभिकेंद्र बना अबूझमाड़ का सरकारी दस्तावेजों में कोई वजूद ही नहीं है। यह भी तय नहीं है कि यह फॉरेस्ट की मिल्कियत है, राजस्व की या फिर किसी उद्योगपति की।
सरकार को यह नहीं पता है कि आखिर अबूझमाड़ के जंगल में क्या-क्या और कितना-कितना खजाना छिपा हुआ है। सूत्र बताते हैं कि यहां पर रेयर मिनरल हैं जो बहुत कम देशों के पास हैं।
यही कारण है कि अब अबूझमाड़ रेड कॉरिडोर से माइनिंग कॉरिडोर बनने की तैयारी में है। जिस इलाके में हवा मुश्किल से गुजरती थी, अब वहां सड़क भी होगी और पटरी भी होगी। अबूझमाड़ को सरकारी रिकॉर्ड में लाया जा रहा है। यहां का सर्वे भी शुरू हो गया है।
रेड कॉरिडोर से माइनिंग कॉरिडोर तक :
नक्सल खात्मे के बाद अब सरकार और उद्योगपतियों की नजर अबूझमाड़ पर है। अब तक अबूझमाड़ सरकारी रिकॉर्ड में है ही नहीं। इसीलिए यह पता ही नहीं है कि इसके अंदर क्या है। है तो पूरा जंगल, पर क्या है इस जंगल में क्या है। सूत्र बताते हैं कि यहां पर सैकड़ों सालों की लंबी प्लानिंग चल रही है। यहां पर बस भी चलेगी और ट्रेन का ट्रैक भी चलेगा।
सवाल यही है कि अबूझमाड़ में ऐसा क्या है जिसके लिए छत्तीसगढ़ को माइनिंग कॉरिडोर बना दिया गया है। कोयला या लोहा ये सब कुछ बहुत मायने नहीं रखते। सूत्र बताते हैं कि अबूझमाड़ को खनन के लिए तैयार किया जा रहा है। इसका जिम्मा खास कंपनी को मिल सकता है। सूत्र कहते हैं कि अबूझमाड़ में रेयर मिनरल हैं जो बहुत कम देशों के पास हैं यानी ये लड़ाई लोहा और कोयले को लेकर नहीं है।
अबूझमाड़ 60 बाय 60 वर्ग किलोमीटर का जंगल है और 30 हजार लोग जंगल में रहते हैं, उनको विस्थापित करेंगे और फिर यहां का खनिज निकाला जाएगा। ये देश का सबसे बड़ा खजाना हो सकता है। सरकार ने यहां ड्रोन से खजाना ढूंढना शुरू कर दिया है लेकिन आगे यहां पर सैटेलाइट से सर्वे ही मुमकिन हो पाएगा।
ये है अबूझमाड़ :
अबूझमाड़ का जंगल भारत के सबसे बड़े और घने जंगलों में से एक माना जाता है। यह लगभग 4,000 से 6,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ के नारायणपुर, बीजापुर और दंतेवाड़ा जिलों में फैला है। यह इलाका इतना घना और दुर्गम है कि लंबे समय तक यहां का पूरा सर्वे भी नहीं हो पाया।
अबूझमाड़ का मतलब ही होता है जिसे समझना मुश्किल हो। यहां बड़े हिस्से में आज भी घने जंगल, पहाड़ और आदिवासी बस्तियां हैं। यह क्षेत्र जैव विविधता के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। अगर तुलना करें, तो यह क्षेत्र कई छोटे जिलों या शहरों से भी बड़ा है और भारत के अनछुए इलाकों में गिना जाता है।
अबूझमाड़ (Abujhmad) लंबे समय से नक्सल प्रभावित क्षेत्र रहा है जिससे यहां विकास कार्य और सर्वे प्रभावित हुए। इसी वजह से यह इलाका लंबे समय तक आम लोगों और प्रशासन से दूर रहा। यह क्षेत्र खनिज और वन संपदा से समृद्ध माना जाता है लेकिन अभी भी इसका बड़ा हिस्सा अछूता है।
क्या कहते हैं सीएम :
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ में सरगुजा से लेकर बस्तर तक पर्यटन की अपार संभावना है। राज्य में डबल इंजन की सरकार के प्रभावी कदमों से बस्तर में नक्सलवाद का खात्मा हो गया है। नक्सलवाद के खात्मे के बाद वहां पर्यटन के नए द्वार खुलेंगे। अबूझमाड़ भी अबूझ नहीं रहेगा। वहां भी विकास की रोशनी पहुंचेगी। पर्यटन के क्षेत्र में राज्य का भविष्य उज्ज्वल है। इसमें रोजगार की भी बहुत संभावना है।
शांति और संसाधनों की नई जंग :
सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों के बाद यह दावा कर दिया गया है कि बस्तर समेत सभी आदिवासी इलाकों में माओवादी आंदोलन खत्म हो गया है। सरकार का दावा है कि अब बस्तर में शांति आएगी और विकास की रफ्तार तेज होगी। गांव-गांव में सड़क, बिजली, स्कूल, अस्पताल और मोबाइल नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचेंगी।
लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। आदिवासी समाज का एक बड़ा वर्ग इस बदलाव को लेकर चिंतित हो सकता है। उनके मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि माओवाद के बाद उनके जल, जंगल और जमीन का क्या होगा। क्या वाकई में अब जल, जंगल, जमीन आदिवासियों के हो जाएंगे।
नक्सल उन्मूलन अभियान के तहत बस्तर के दूर-दराज इलाकों में हर 3-5 किलोमीटर पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों के कैंप स्थापित किए गए हैं। एक साल तक यह कैंप यहां से नहीं हटेंगे। ऐसे में स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या लोग अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से आवाज उठा पाएंगे।
कार्पोरेट की बढ़ती दिलचस्पी :
बस्तर क्षेत्रफल में कई राज्यों से बड़ा है। खनिज संपदाओं से भरपूर है। यहां लौह अयस्क, बॉक्साइट, टिन, कोयला, चूना पत्थर और ग्रेनाइट जैसे बहुमूल्य संसाधन बड़ी मात्रा में मौजूद हैं। लंबे समय से बड़े कॉरपोरेट घरानों की नजर इन संसाधनों पर रही है।
हाल के वर्षों में खदानों के खुलने और प्रस्तावित परियोजनाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है। रावघाट और आमदाई जैसे क्षेत्रों में खनन गतिविधियों के कारण स्थानीय लोगों को पहले से ही परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले का उदाहरण अक्सर सामने रखा जाता है।
जहां माओवादी प्रभाव कम होने के साथ ही खनन और औद्योगिक परियोजनाओं को तेजी से बढ़ाया गया। स्थानीय लोगों के मुताबिक इससे पर्यावरण को गंभीर नुकसान हुआ है। बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई, पहाड़ों का क्षरण और खनन से निकलने वाले प्रदूषण ने हवा और पानी दोनों को प्रभावित किया है।
क्या होगा बस्तर का भविष्य:
नक्सलवाद के खात्मे के दावे के साथ बस्तर एक नए मोड़ पर खड़ा है। एक ओर विकास, निवेश और बुनियादी ढांचे के विस्तार की उम्मीद है। तो दूसरी ओर आदिवासी समुदाय अपने अस्तित्व, अधिकार और पहचान को लेकर आशंकित है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विकास और सुरक्षा के नाम पर आदिवासियों के अधिकारों की अनदेखी होगी या फिर उन्हें इस प्रक्रिया में बराबरी से शामिल किया जाएगा। यह साफ है कि बस्तर में माओवाद का अध्याय खत्म हुआ है लेकिन इसके बाद शुरू होने वाली कहानी विकास बनाम अधिकार कहीं ज्यादा जटिल और निर्णायक हो सकती है।
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