CGPMT-2011 के आरोपी बने डॉक्टर, सिस्टम ने 15 साल से दबाए रखा है घोटाला, आज तक किसी को सजा नहीं
VINAY VERMA | May 13, 2026, 14:49 IST
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2011 में छत्तीसगढ़ पीएमटी पेपर लीक कांड में 76 अभ्यर्थियों को आरोपी बनाया गया था, लेकिन 15 साल बाद भी किसी को सजा नहीं हुई। जांच में विरोधाभास और गवाह की गवाही न होने के कारण केस कमजोर हुआ। आरोपी जमानत पर छूटकर विदेश चले गए और कई डॉक्टर बन गए।
मेडिकल एट्रेंस एग्जाम नीट 2026 के पेपर लीक होते ही परीक्षा रद्द कर दी गई है। दावा है कि दोषियों को बक्शा नहीं जाएगा। ऐसा ही एक दावा छग में 15 साल पहले तब किया गया था, जब साल 2011 में छत्तीसगढ़ का बहुचर्चित पीएमटी पेपर लीक कांड सामने आया था। पेपर लीक करवाने वालों के अलावा 76 अभ्यर्थियों को भी आरोपी बनाया गया था। मामला उजागर हुए 15 साल बीत चुके हैं। लेकिन अभी तक एक भी आरोपी को सजा नहीं हुई है। जो हिरासत मे लिए भी गए थे, उन्हें पुलिस की संदेह वाली रिपोर्ट के आधार पर जमानत मिल गई। सबसे बड़ी बात यह है कि इन 15 सालो में मुख्य गवाह की गवाही तक नहीं शुरु की गई हैं।
76 अभ्यर्थियों की गिरफ्तारी के बाद भी आज तक सजा क्यों नहीं?
दो जांच अधिकारियों की रिपोर्ट अलग-अलग कैसे हुई?
मुख्य गवाह की गवाही 15 साल में भी क्यों नहीं हो सकी?
जमानत के बाद आरोपी विदेश कैसे चले गए?
क्या सिस्टम ने जानबूझकर केस को कमजोर किया?
मेडिकल सीट के बदले 13 लाख की डील में और कौन-कौन शामिल था?
क्या अब भी पूरे नेटवर्क का सच सामने आना बाकी है?
साल 2011 में मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम में लिए राज्य स्तरीय सीजी पीएमटी देनी होती थी। खुलासा हुआ था कि बिलासपुर जिले के एक संगठित गैंग परीक्षार्थियों को बैठाकर पेपर सॉल्व करवा रहा था। जिसे कानपुर के प्रिटिंग प्रेेस के निकाला गया था। प्रति अभ्यर्थी 13 लाख रुपये की डील तय हुई थी। रातभर प्रश्नपत्र हल करवाने के बाद सुबह छात्रों को परीक्षा केंद्रों तक छोड़ने की तैयारी थी। यह सिर्फ नकल नहीं बल्कि मेडिकल शिक्षा में पैसे के दम पर घुसपैठ कराने का सुनियोजित कारोबार था।
पूरे मामले का खुलासा एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद हुआ। सूचना मिलने पर पुलिस ने तखतपुर में रेड मारी और 76 अभ्यर्थियों को हिरासत में लिया गया। जांच में सामने आया कि उत्तर प्रदेश और बिहार का गैंग इस पूरे नेटवर्क को चला रहा था। हालांकि गिरोह का कथित सरगना मौके से फरार हो गया। पुलिस ने उस समय दावा किया था कि पेपर आगरा प्रिंटिंग प्रेस से लीक हुआ था और नेटवर्क कई राज्यों तक फैला हुआ था। मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन व्यापम परीक्षा नियंत्रक पर भी कार्रवाई की गई थी।
मामले में सबसे बड़ा सवाल पुलिस जांच पर खड़ा हुआ। सूत्रों के अनुसार दो अलग-अलग जांच अधिकारियों से जांच करवाई गई, लेकिन दोनों की अंतिम रिपोर्ट एक-दूसरे से मेल नहीं खा सकी। जांच में विरोधाभास और तकनीकी खामियों ने पूरे केस को कमजोर कर दिया। आरोप है कि इसी का फायदा आरोपियों और गैंग के सदस्यों को मिला। बाद में कई आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए रायपुर कोर्ट से जमानत मिल गई।
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू मुख्य गवाह विनय वर्मा को लेकर सामने आया है। आरोप है कि केस के अहम गवाह होने के बावजूद पिछले 15 वर्षों में उनकी गवाही तक नहीं हो सकी। बताया जा रहा है कि शुरुआती पेशियों में बचाव पक्ष के वकील सवाल पूछने से ही मना कर देते थे। इसके बाद हर पेशी में नई एप्लीकेशन लगाकर सुनवाई आगे बढ़ाने का सिलसिला चलता रहा।
बचाव पक्ष लगातार यह तर्क देता रहा कि 76 अभ्यर्थियों के वकील एक साथ सवाल करेंगे, इसलिए पर्याप्त समय दिया जाए। यही वजह रही कि हर तारीख पर सुनवाई आगे बढ़ती गई। बिलासपुर के तखतपुर कोर्ट में आज भी मामले की सुनवाई जारी है, लेकिन 15 साल बाद भी ट्रायल निर्णायक मोड़ तक नहीं पहुंच पाया। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार है या फिर जानबूझकर केस को कमजोर किया गया?
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कानूनी प्रक्रिया में लगातार देरी का फायदा सीधे आरोपी अभ्यर्थियों को मिला। बताया जाता है कि सुनवाई लंबी खिंचने और समय पर ट्रायल पूरा नहीं होने के कारण सुप्रीम कोर्ट से भी कई आरोपियों को जमानत मिल गई। जमानत मिलते ही कई छात्र विदेश चले गए और वहां से मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर ली। अब इनमें से कई आरोपी डॉक्टर बन चुके हैं। यानी जिन छात्रों पर पैसे देकर मेडिकल सीट हासिल करने का आरोप था, वे आज मरीजों का इलाज कर रहे हैं।
अब पूरे मामले में सबसे बड़ा आरोप यही लग रहा है कि सिस्टम ने ही आरोपियों को बचाने का काम किया। जांच रिपोर्टों में विरोधाभास, मुख्य गवाह की गवाही लंबित रहना, लगातार टलती सुनवाई और जमानत के बाद आरोपियों का विदेश जाकर डॉक्टर बन जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यह मामला सिर्फ पेपर लीक नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक और कानूनी सिस्टम की विफलता की कहानी बन गया है।
छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम में लगातार गड़बड़ियों और पेपर लीक की घटनाओं के बाद परीक्षा प्रणाली को केंद्रीकृत किया गया। बाद में राष्ट्रीय स्तर पर मेडिकल प्रवेश परीक्षा की व्यवस्था लागू हुई ताकि राज्यों में होने वाले ऐसे घोटालों पर रोक लग सके। लेकिन विडंबना यह है कि केंद्रीय स्तर पर भी मेडिकल एंट्रेंस परीक्षाओं में पेपर लीक और गड़बड़ी के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं। यानी व्यवस्था बदली, लेकिन सिस्टम की बीमारी खत्म नहीं हुई।
पीएमटी पेपर लीक कांड सिर्फ एक परीक्षा घोटाला नहीं था, बल्कि यह उन हजारों मेहनती छात्रों के सपनों के साथ धोखा था जो ईमानदारी से डॉक्टर बनने की तैयारी कर रहे थे। 15 साल बाद भी मुख्य आरोपी सजा से दूर हैं, कई डॉक्टर बन चुके हैं और केस अब भी अदालत में उलझा हुआ है। अब सवाल सिर्फ आरोपियों की सजा का नहीं, बल्कि उस सिस्टम की जवाबदेही का है जिसने शिक्षा के इस सबसे बड़े अपराध को समय की धूल में दबने दिया।
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बड़े सवाल जो अब भी कायम
दो जांच अधिकारियों की रिपोर्ट अलग-अलग कैसे हुई?
मुख्य गवाह की गवाही 15 साल में भी क्यों नहीं हो सकी?
जमानत के बाद आरोपी विदेश कैसे चले गए?
क्या सिस्टम ने जानबूझकर केस को कमजोर किया?
मेडिकल सीट के बदले 13 लाख की डील में और कौन-कौन शामिल था?
क्या अब भी पूरे नेटवर्क का सच सामने आना बाकी है?
संगठित गैंग का था पूरा काम
स्टिंग ऑपरेशन के बाद पुलिस ने मारी थी रेड
दो जांच अधिकारी और दो अलग-अलग कहानी
मुख्य गवाह की 15 साल में नहीं हो सकी गवाही
76 वकीलों के नाम पर टलती रही सुनवाई
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लेटलतीफी ने आरोपियों को बना दिया डॉक्टर
क्या सिस्टम ने बचा लिए आरोपी?
पेपर लीक के बाद बदली गई परीक्षा व्यवस्था
मेडिकल शिक्षा पर लगा सबसे बड़ा दाग
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