स्कूलों के लिए 105 करोड़ की फर्नीचर खरीदी पर BIS गायब, भूपेश बघेल ने सरकार को घेरा
Raipur. छत्तीसगढ़ सरकार ने बजट 2026-27 में स्कूल शिक्षा विभाग के लिए 22,466 करोड़ रूपए का बड़ा प्रावधान किया है। इसमें स्कूलों के आधुनिकीकरण के तहत स्मार्ट क्लास, डिजिटल लाइब्रेरी और नई प्रयोगशालाओं के लिए कुल 250 करोड़ रूपए तय किए गए हैं। इसी के तहत फर्नीचर खरीदी के लिए 105 करोड़ 20 लाख रूपए का प्रावधान रखा गया है। लेकिन अब यही खरीदी प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई है।
BIS मानक गायब, बढ़ी चिंता
समग्र शिक्षा विभाग द्वारा जारी स्कूल फर्नीचर खरीदी के टेंडर में एक बड़ी खामी सामने आई है। आरोप है कि निविदा की शर्तों में भारतीय मानक ब्यूरो प्रमाणन को शामिल ही नहीं किया गया। यह वही मानक है, जो सरकारी खरीद में गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य माना जाता है। ऐसे में इस शर्त का गायब होना कई सवाल खड़े कर रहा है।
घटिया फर्नीचर का खतरा फिर
जानकारों का कहना है कि अगर बिना बीआईएस मानकों के खरीदी होती है, तो स्कूलों में निम्न गुणवत्ता का फर्नीचर पहुंच सकता है। इससे न सिर्फ सरकारी धन की बर्बादी होगी, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और सुविधाओं पर भी सीधा असर पड़ेगा।
पहले भी कई बार स्कूलों में घटिया फर्नीचर सप्लाई को लेकर शिकायतें सामने आ चुकी हैं, ऐसे में यह मामला और गंभीर हो गया है।
भूपेश बघेल का हमला
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस मुद्दे को लेकर सरकार पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए आरोप लगाया कि समग्र शिक्षा विभाग ने केंद्र सरकार के नियमों की अनदेखी की है।
बघेल के मुताबिक, भारत सरकार के स्पष्ट निर्देश हैं कि सरकारी विभागों द्वारा खरीदा जाने वाला फर्नीचर BIS प्रमाणित होना चाहिए और यह नियम सभी राज्यों पर लागू होता है।
‘सांय-सांय’ तंज से गरमाई सियासत
बघेल ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय पर तंज कसते हुए उनके चर्चित शब्द ‘सांय-सांय’ का इस्तेमाल किया। उन्होंने सवाल उठाया कि “यह घोटाला है या घपला है सांय-सांय?” उन्होंने टेंडर को तत्काल निरस्त करने की मांग करते हुए चेतावनी दी कि यदि सुधार नहीं किया गया, तो सरकार को विधानसभा सत्र और जनता के बीच जवाब देना पड़ेगा।
राजनीतिक माहौल गरमाया
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद राजनीतिक माहौल गर्मा गया है। विपक्ष इस मुद्दे को लेकर आक्रामक रुख अपनाता नजर आ रहा है। माना जा रहा है कि आने वाले विधानसभा सत्र में यह मामला जोरदार तरीके से उठेगा और सरकार को घेरा जाएगा।
सरकार की चुप्पी से बढ़े सवाल
फिलहाल इस विवाद पर सरकार की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन जिस तरह से आरोप लगे हैं, उससे सरकार पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। अगर जल्द ही स्थिति स्पष्ट नहीं की गई, तो यह मामला बड़े राजनीतिक विवाद में बदल सकता है।
शिक्षा सुधार या ‘सिस्टम में सेंध’?
सरकार एक तरफ स्कूलों के आधुनिकीकरण की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ उसी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर ‘सिस्टम में सेंध’ का संकेत? आने वाले दिनों में इसका जवाब सरकार को देना ही होगा।
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