लिव-इन में रहना है तो कराओ रजिस्ट्रेशन! पैतृक संपत्ति में भी बराबरी चाहती हैं महिलाएं

Arun Tiwari | Oct 13, 2026, 14:48 IST
UCC पर महिलाओं की मांग
Raipur. छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर महिलाओं ने अपने अधिकारों, विवाह और तलाक की प्रक्रिया, संपत्ति में हिस्सेदारी और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े कानूनी प्रावधानों में बदलाव की मांग उठाई है। महिलाओं का कहना है कि कानून ऐसा होना चाहिए, जिससे महिला और पुरुष को समान अधिकार मिलें और किसी भी परिस्थिति में महिलाओं तथा बच्चों को उनके अधिकारों से वंचित न होना पड़े।

चर्चा के दौरान लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीयन अनिवार्य करने, पैतृक संपत्ति में महिलाओं को बराबर का हिस्सा देने और आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया आसान बनाने जैसे सुझाव सामने आए। रायपुर में आयोजित चर्चा में महिला स्व-सहायता समूहों की पदाधिकारियों ने अपनी राय रखी। समान नागरिक संहिता समिति के समिति की ओर से इन सुझावों को रिपोर्ट में शामिल करने का आश्वासन दिया गया।



लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीयन अनिवार्य करने की मांग

चर्चा में सबसे महत्वपूर्ण सुझाव लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी रूप से दर्ज करने की व्यवस्था से जुड़ा रहा। महिलाओं ने कहा कि लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट नियम होने चाहिए। ऐसे संबंधों का पंजीयन अनिवार्य किया जाए, ताकि जरूरत पड़ने पर महिला को अपने संबंध और कानूनी अधिकार साबित करने में कठिनाई न हो।



महिलाओं का तर्क था कि संबंध समाप्त होने की स्थिति में कई बार महिला को आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी परिस्थितियों में कानून का संरक्षण मिलना जरूरी है। पंजीयन की व्यवस्था से संबंधित पक्षों की पहचान और संबंध से जुड़े तथ्यों को दर्ज करने में मदद मिल सकती है।



इसके साथ ही लिव-इन रिलेशनशिप से जन्म लेने वाले बच्चों के अधिकारों पर भी विशेष जोर दिया गया। महिलाओं ने कहा कि बच्चों के पालन-पोषण, आर्थिक जिम्मेदारी और उत्तराधिकार से संबंधित प्रावधान स्पष्ट होने चाहिए। किसी भी स्थिति में बच्चों को उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।




पैतृक संपत्ति में महिलाओं को मिले बराबर हिस्सा

समान नागरिक संहिता को लेकर महिलाओं ने संपत्ति के अधिकारों में समानता की मांग भी प्रमुखता से उठाई। उनका कहना था कि पैतृक और व्यक्तिगत संपत्ति में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार मिलना चाहिए। संपत्ति के बंटवारे में महिला होने के कारण किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए।



महिलाओं ने धर्म आधारित व्यक्तिगत कानूनों में आवश्यक बदलाव करने का सुझाव देते हुए कहा कि समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनके मुताबिक, संपत्ति में बराबर की हिस्सेदारी महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।



संपत्ति पर अधिकार केवल कानूनी विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध महिलाओं की सामाजिक स्थिति और आर्थिक सुरक्षा से भी है। यदि महिलाओं को संपत्ति में उचित अधिकार मिलते हैं, तो वे कठिन परिस्थितियों में अधिक आत्मनिर्भर होकर निर्णय ले सकती हैं।



आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया हो आसान

विवाह और तलाक से संबंधित नियमों में समानता लाने का सुझाव भी चर्चा में रखा गया। महिलाओं ने कहा कि आपसी सहमति से विवाह समाप्त करने की प्रक्रिया को सरल बनाया जाना चाहिए, ताकि पति-पत्नी के बीच सहमति होने पर उन्हें अनावश्यक कानूनी जटिलताओं का सामना न करना पड़े।



महिलाओं के अनुसार, विवाह-विच्छेद के मामलों में भरण-पोषण से जुड़े नियम भी स्पष्ट और एकसमान होने चाहिए। तलाक के बाद आर्थिक रूप से कमजोर स्थिति में पहुंचने वाली महिलाओं को उचित सहायता मिल सके, इसके लिए कानूनी प्रावधान प्रभावी होने चाहिए। उनका मानना है कि समान नागरिक संहिता में ऐसे नियमों पर विचार किया जाना चाहिए, जो महिला और पुरुष दोनों के अधिकारों के साथ उनकी जिम्मेदारियों को भी स्पष्ट करें।




दहेज और उपहार से जुड़े नियमों में समानता की जरूरत

चर्चा में विवाह के दौरान दिए जाने वाले उपहार और दहेज से जुड़े नियमों को लेकर भी सुझाव दिए गए। महिलाओं ने कहा कि इन विषयों पर स्पष्ट कानूनी व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि विवाह के बाद किसी भी पक्ष को अनावश्यक विवाद या शोषण का सामना न करना पड़े।उनका मानना था कि विवाह के दौरान दिए जाने वाले उपहारों और संपत्ति से जुड़े मामलों में पारदर्शिता जरूरी है। हालांकि, दहेज जैसी सामाजिक कुरीति पर रोक लगाने और वैध उपहारों की स्थिति स्पष्ट करने के लिए कानून में अंतर को समझना भी महत्वपूर्ण होगा।



आदिवासी परंपराओं और संस्कृति का संरक्षण जरूरी

छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में जनजातीय समुदायों की मौजूदगी को देखते हुए महिलाओं ने समान नागरिक संहिता तैयार करने की प्रक्रिया में स्थानीय परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान का ध्यान रखने की जरूरत बताई।



महिलाओं का कहना था कि समान अधिकारों की व्यवस्था बनाते समय प्रदेश के अलग-अलग समुदायों की सामाजिक परिस्थितियों को समझना जरूरी है। कानून ऐसा हो, जिससे महिलाओं को न्याय मिले और स्थानीय समुदायों की विशिष्ट परंपराओं को लेकर भी व्यापक विचार-विमर्श किया जाए।



ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं तक कानूनी जानकारी पहुंचाने की जरूरत भी सामने आई। इसके लिए पंचायत स्तर पर कानूनी सलाह उपलब्ध कराने और महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने की व्यवस्था का सुझाव दिया गया। इससे महिलाएं अपने अधिकारों को बेहतर ढंग से समझ सकेंगी और जरूरत पड़ने पर उचित कानूनी सहायता प्राप्त कर सकेंगी।




सुझावों को रिपोर्ट में शामिल करने का आश्वासन

चर्चा के दौरान महिलाओं ने कहा कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य महिलाओं को समान अधिकार और न्याय दिलाने की दिशा में होना चाहिए। इसके लिए कानून बनाते समय महिलाओं के व्यावहारिक अनुभवों और सामाजिक परिस्थितियों को भी महत्व दिया जाना चाहिए।



समिति के सदस्यों एम.के. राऊत और मोहन पवार ने महिलाओं की बात सुनी और उनके सुझावों को रिपोर्ट में शामिल करने का आश्वासन दिया। इस चर्चा के जरिए विवाह, तलाक, संपत्ति, भरण-पोषण और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मुद्दों पर महिलाओं की अपेक्षाएं सामने आईं।



महिलाओं की मांग है कि समान नागरिक संहिता की व्यवस्था में अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां भी स्पष्ट हों। साथ ही, कानून का लाभ शहरी क्षेत्रों तक सीमित न रहकर गांवों और दूरस्थ इलाकों में रहने वाली महिलाओं तक पहुंचे। अब इन सुझावों पर समिति की रिपोर्ट में किस तरह विचार किया जाता है, यह आगे की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण होगा।



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