छत्तीसगढ़ में UCC का ड्राफ्ट: लिव-इन में रहना नहीं होगा आसान, 30 नवंबर को रिपोर्ट सौंपेगी समिति
Harrison Masih | Nov 02, 2026, 10:30 IST
दिसंबर में आ सकता है छत्तीसगढ़ UCC का ड्राफ्ट, जानिए लिव-इन और संपत्ति के अधिकारों से जुड़े अहम नियम
रायपुर। छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। सरकार दिसंबर में विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान इसका ड्राफ्ट पेश कर सकती है। इससे पहले समिति 30 नवंबर तक अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपेगी। प्रस्तावित ड्राफ्ट में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कई अहम नियम शामिल किए जा सकते हैं।
इसके तहत लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को रजिस्ट्रार के पास अपने रिश्ते का पंजीयन कराना पड़ सकता है। अगर कोई एक पार्टनर रिश्ता खत्म करना चाहता है, तो इसकी जानकारी भी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करानी होगी।
प्रस्ताव में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को लेकर भी महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं। लिव-इन रिलेशनशिप खत्म होने पर महिला साथी को गुजारा भत्ता देने की व्यवस्था हो सकती है। वहीं, ऐसे रिश्ते से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध संतान का दर्जा देने और पिता की पैतृक संपत्ति में बराबर अधिकार देने का प्रस्ताव है। हालांकि, अभी ये सभी प्रावधान प्रस्तावित हैं। अंतिम फैसला समिति की रिपोर्ट और सरकार के निर्णय के बाद होगा।
छत्तीसगढ़ सरकार ने जून 2026 में समान नागरिक संहिता के लिए पांच सदस्यीय समिति बनाई थी। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं। समिति ने UCC को लेकर आम लोगों से सुझाव और आपत्तियां मांगी थीं।
इसके लिए ई-मेल, वेबसाइट, डाक और सीधे संपर्क के माध्यम से अपनी राय देने का मौका दिया गया था। समिति को आम लोगों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, राजनीतिक दलों और अलग-अलग समुदायों से एक हजार से ज्यादा सुझाव मिले हैं।
ऑनलाइन सुझाव और आपत्तियां भेजने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर थी। अब यह समय-सीमा समाप्त हो चुकी है। समिति मिले सुझावों और मौजूदा कानूनों का अध्ययन कर रही है। इसके बाद अंतिम रिपोर्ट तैयार की जाएगी।
प्रस्तावित UCC ड्राफ्ट में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर खास नियम बनाए जा सकते हैं। इसके तहत साथ रहने का फैसला करने वाले जोड़े को रजिस्ट्रार के पास अपने रिश्ते का पंजीयन कराना जरूरी हो सकता है।
इससे लिव-इन रिलेशनशिप की जानकारी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज रहेगी। यानी जोड़े को अपने रिश्ते की जानकारी संबंधित अधिकारी को देनी पड़ सकती है।
इतना ही नहीं, अगर दोनों में से कोई एक या दोनों साथ नहीं रहना चाहते हैं, तो उन्हें रिश्ता खत्म करने की सूचना भी रजिस्ट्रार को देनी होगी। इस सूचना की एक कॉपी दूसरे पार्टनर को भी भेजने का प्रावधान प्रस्तावित है।
नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माना और जेल तक की सजा का प्रावधान भी विचाराधीन है। हालांकि, इस पर अंतिम फैसला होना बाकी है।
प्रस्तावित ड्राफ्ट में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं के आर्थिक अधिकारों का भी ध्यान रखा गया है। अगर रिश्ता खत्म होता है, तो महिला साथी को गुजारा भत्ता देने की व्यवस्था की जा सकती है।
इसके लिए महिला न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में आवेदन कर सकेगी। इसका उद्देश्य रिश्ता टूटने के बाद महिला को आर्थिक सुरक्षा देना है।
वहीं, लिव-इन रिलेशनशिप से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध संतान का दर्जा देने का प्रस्ताव है। ऐसे बच्चों को पिता की पैतृक संपत्ति में समान अधिकार देने की भी तैयारी है। यानी माता-पिता के अलग होने से बच्चों के कानूनी अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।
समिति को विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और दत्तक ग्रहण जैसे विषयों पर भी सुझाव मिले हैं। अलग-अलग धर्मों के लोगों ने तलाक की प्रक्रिया को लेकर अपनी राय दी है।
प्रस्तावित व्यवस्था में विवाह का पंजीकरण अनिवार्य करने की बात भी शामिल है। इसके साथ ही तलाक के लिए सभी धर्मों के लोगों पर समान कानून लागू करने का प्रस्ताव है।
UCC को लेकर बस्तर और सरगुजा संभाग में आदिवासी समाज की ओर से विरोध और असहमति सामने आई थी। समाज के लोगों ने चिंता जताई थी कि समान नागरिक संहिता से उनकी पुरानी परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान पर असर पड़ सकता है।
ऐसे में समिति के सामने आदिवासी समाज की रीति-रिवाजों और परंपराओं को सुरक्षित रखने की बड़ी चुनौती है। समिति इन सभी पहलुओं का कानूनी और सामाजिक अध्ययन करेगी। इसके बाद अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी।
UCC समिति ने रायपुर, दुर्ग, अंबिकापुर और सूरजपुर के अलावा बस्तर संभाग के तीन जिलों में भी बैठकें की हैं। इन बैठकों में आम लोगों और विभिन्न संगठनों से सुझाव लिए गए।
अब समिति सभी सुझावों का अध्ययन कर रही है। तय कार्यक्रम के अनुसार, 30 नवंबर तक रिपोर्ट सरकार को सौंप दी जाएगी। इसके बाद दिसंबर में विधानसभा के शीतकालीन सत्र में ड्राफ्ट पेश किया जाएगा।
फिलहाल लिव-इन रजिस्ट्रेशन, गुजारा भत्ता और बच्चों को संपत्ति में अधिकार देने जैसे प्रस्ताव अंतिम कानून नहीं हैं। इन पर समिति की सिफारिश और सरकार के फैसले के बाद ही स्थिति साफ होगी।
प्रस्ताव में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को लेकर भी महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं। लिव-इन रिलेशनशिप खत्म होने पर महिला साथी को गुजारा भत्ता देने की व्यवस्था हो सकती है। वहीं, ऐसे रिश्ते से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध संतान का दर्जा देने और पिता की पैतृक संपत्ति में बराबर अधिकार देने का प्रस्ताव है। हालांकि, अभी ये सभी प्रावधान प्रस्तावित हैं। अंतिम फैसला समिति की रिपोर्ट और सरकार के निर्णय के बाद होगा।
30 नवंबर तक सरकार को मिलेगी रिपोर्ट
इसके लिए ई-मेल, वेबसाइट, डाक और सीधे संपर्क के माध्यम से अपनी राय देने का मौका दिया गया था। समिति को आम लोगों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, राजनीतिक दलों और अलग-अलग समुदायों से एक हजार से ज्यादा सुझाव मिले हैं।
ऑनलाइन सुझाव और आपत्तियां भेजने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर थी। अब यह समय-सीमा समाप्त हो चुकी है। समिति मिले सुझावों और मौजूदा कानूनों का अध्ययन कर रही है। इसके बाद अंतिम रिपोर्ट तैयार की जाएगी।
लिव-इन में रहने के लिए कराना पड़ सकता है रजिस्ट्रेशन
इससे लिव-इन रिलेशनशिप की जानकारी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज रहेगी। यानी जोड़े को अपने रिश्ते की जानकारी संबंधित अधिकारी को देनी पड़ सकती है।
इतना ही नहीं, अगर दोनों में से कोई एक या दोनों साथ नहीं रहना चाहते हैं, तो उन्हें रिश्ता खत्म करने की सूचना भी रजिस्ट्रार को देनी होगी। इस सूचना की एक कॉपी दूसरे पार्टनर को भी भेजने का प्रावधान प्रस्तावित है।
नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माना और जेल तक की सजा का प्रावधान भी विचाराधीन है। हालांकि, इस पर अंतिम फैसला होना बाकी है।
महिला को मिलेगा गुजारा भत्ता, बच्चों को संपत्ति में अधिकार
इसके लिए महिला न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में आवेदन कर सकेगी। इसका उद्देश्य रिश्ता टूटने के बाद महिला को आर्थिक सुरक्षा देना है।
वहीं, लिव-इन रिलेशनशिप से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध संतान का दर्जा देने का प्रस्ताव है। ऐसे बच्चों को पिता की पैतृक संपत्ति में समान अधिकार देने की भी तैयारी है। यानी माता-पिता के अलग होने से बच्चों के कानूनी अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।
विवाह और तलाक के लिए भी बन सकता है समान कानून
प्रस्तावित व्यवस्था में विवाह का पंजीकरण अनिवार्य करने की बात भी शामिल है। इसके साथ ही तलाक के लिए सभी धर्मों के लोगों पर समान कानून लागू करने का प्रस्ताव है।
आदिवासी समाज की परंपराओं का रखा जाएगा ध्यान
ऐसे में समिति के सामने आदिवासी समाज की रीति-रिवाजों और परंपराओं को सुरक्षित रखने की बड़ी चुनौती है। समिति इन सभी पहलुओं का कानूनी और सामाजिक अध्ययन करेगी। इसके बाद अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी।
दिसंबर में विधानसभा में पेश होगा ड्राफ्ट
अब समिति सभी सुझावों का अध्ययन कर रही है। तय कार्यक्रम के अनुसार, 30 नवंबर तक रिपोर्ट सरकार को सौंप दी जाएगी। इसके बाद दिसंबर में विधानसभा के शीतकालीन सत्र में ड्राफ्ट पेश किया जाएगा।
फिलहाल लिव-इन रजिस्ट्रेशन, गुजारा भत्ता और बच्चों को संपत्ति में अधिकार देने जैसे प्रस्ताव अंतिम कानून नहीं हैं। इन पर समिति की सिफारिश और सरकार के फैसले के बाद ही स्थिति साफ होगी।
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