नहीं रहे छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी विश्वरंजन, लंबे समय से चल रहे थे बीमार

छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी विश्वरंजन का शनिवार, 08 मार्च की रात निधन हो गया है। उन्होंने पटना के मेदांता अस्पताल में अपनी आखिरी सांस ली है। वह लंबे समय से हृदय संबंधी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे।

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Aman Vaishnav
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chhattisgarh former dgp vishwa ranjan passes away

छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी विश्वरंजन का निधन हो गया है। उन्होंने शनिवार 07 मार्च की रात पटना के मेदांता अस्पताल में आखिरी सांस ली है। पूर्व डीजीपी पिछले काफी समय से बीमार थे और उनका इलाज पटना के अस्पताल में चल रहा था।

इस कारण हुए थे भर्ती

पूर्व डीजीपी विश्वरंजन की तबीयत पिछले महीने अचानक बिगड़ गई थी। इसके बाद उन्हें पटना के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था। यहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा था।

बताया जा रहा है कि उन्हें गंभीर कार्डियक (हार्ट) संबंधी समस्या हो गई थी। इस कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया था। इलाज के दौरान उनकी हालत ज्यादा खराब हो गई थी जिसके चलते अस्पताल में ही उन्होंने आखिरी सांस ली।

2007 में मिला था डीजीपी का पद

विश्वरंजन छत्तीसगढ़ के छठे डीजीपी रहे हैं। 2007 में ओपी राठौर के निधन के बाद राज्य सरकार ने उन्हें यह जिम्मेदारी दी थी। वे करीब चार साल तक इस पद पर रहे थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में पुलिस प्रशासन में कई अहम सुधार किए थे।

उनकी अगुवाई में कानून-व्यवस्था को मजबूती दी गई थी। साथ ही नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा पर खास ध्यान दिया गया था।

विभाजन के बाद मिला छत्तीसगढ़ कैडर

1973 बैच के आईपीएस अधिकारी विश्वरंजन का प्रशासनिक अनुभव बहुत व्यापक रहा है। जब मध्यप्रदेश का विभाजन हुआ तब उन्हें छत्तीसगढ़ कैडर मिला था। हालांकि 2007 से पहले वे कभी छत्तीसगढ़ में नहीं थे।

विश्वरंजन को मिले कई बड़े सम्मान 

अपने लंबे और शानदार करियर में विश्वरंजन को कई बड़े सम्मान मिले थे। उन्हें राष्ट्रपति पुलिस पदक सहित कई पुरस्कार मिले थे। ये पुरस्कार उनकी ईमानदारी और काम के प्रति उनकी जिम्मेदारी को साबित करते हैं।

चित्रकला और फोटोग्राफी में रुचि 

वह चित्रकला और फोटोग्राफी में भी काफी रुचि रखते थे। उन्होंने प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान की शुरुआत की थी। इससे छत्तीसगढ़ की साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को नई ताकत मिली थी। उनके समय में यह संस्थान प्रदेश में साहित्य और संस्कृति पर चर्चा करने का अहम स्थान बन गया था।

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