सरकारी कॉलेज घोटाला; बिना ऑडिट डकार गए करोड़ों का बजट, कागजों में खरीद लिए करोड़ों के फर्नीचर और कंप्यूटर!
NEWS IN SHORT
- 67 करोड़ रुपये की खरीदी गड़बड़ी पर पर्दा नहीं डाला जा सकता हैं
- कोरोना में बंद कॉलेजों में 10 करोड़ की फर्जी खरीदी की गई हैं
- फर्नीचर और आईटी उपकरणों पर 70% खर्च का अनुमान हैं
- शिकायतकर्ता के झूठे आरोपों के बावजूद जांच में गड़बड़ी हुई हैं
- मंत्री ने कहा- इस मामले की जल्द जांच होगी
NEWS IN DETAIL
Raipur। सरकारी कॉलेज घोटाला:प्रदेश के 200 से अधिक सरकारी कॉलेजों में हुई खरीदी में 67.37 करोड़ रुपये की गड़बड़ी सामने आई है। यह खुलासा तब हुआ जब शिक्षा सचिव को 46 अलग-अलग मामलों की जांच रिपोर्ट भेजी गई, जिसमें वित्तीय अनियमितताएं स्पष्ट रूप से सामने आईं हैं।
रिपोर्ट में यह पाया गया कि कई मामलों में यह भी नहीं पता चला कि सामग्री खरीदी भी गई थी या नहीं। न ही इसका ऑडिट कराया गया, न ही उपयोगिता प्रमाण पत्र लिया गया।
सिर्फ जांच, कार्रवाई कुछ भी नहीं
छत्तीसगढ़ भ्रष्टाचार :रिपोर्ट में जांच के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। आयुक्त ने बस 13 सुझाव दिए, जिनमें एक ही सामान के लिए बार-बार भुगतान न करने, अनावश्यक खरीद से बचने और जेम (Government e-Marketplace) से खरीदारी सुनिश्चित करने की बात कही। गड़बड़ी स्वीकार की गई, लेकिन किसी जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की बात नहीं की गई।
कोरोना के दौरान बंद कॉलेजों में हुई खरीदारी
2020 के मार्च से अगस्त 2021 के बीच, कोरोना काल मेंजब सभी कॉलेज बंद थे, तब 10.34 करोड़ रुपये की सामग्री खरीदी गई। हालांकि, कॉलेज बंद थे, लेकिन कागजों में फर्नीचर और आईटी उपकरणों की सप्लाई दिखाई गई। इस दौरान छात्रों का कॉलेज आना-जाना बंद था, फिर भी यह खर्चे दिखाए गए।
बजट का 70% तीन मदों में खर्च
पिछले तीन सालों में कुल 67.37 करोड़ रुपये का बजट आवंटित हुआ था, जिसमें से 96% राशि सिर्फ तीन मदों में खर्च हुई—फर्नीचर, भंडार/कच्चा माल और आईटी उपकरण। इन तीन मदों में फर्नीचर पर 17 करोड़ रुपये का खर्च संदिग्ध पाया गया,
क्योंकि इसमें नियमों का उल्लंघन करते हुए फर्नीचर को अलग-अलग भागों में बांटा गया था। स्थानीय स्तर पर 3 कोटेशन मंगाकर चहेती फर्मों को फायदा पहुंचाया गया, और कई फर्मों का पता चला कि वे एक ही परिवार से संबंधित थीं।
मंत्री ने जांच कराने का वादा किया
उच्च शिक्षा मंत्री टंकराम वर्मा ने कहा कि शिकायत की जानकारी मुझे नहीं थी, लेकिन अब जब मामला सामने आया है, तो मैं इस पर जांच कराऊंगा और देखूंगा कि किस महाविद्यालय को राशि आवंटित हुई और कितनी खरीदी हुई।
शिकायतकर्ता ने बाद में आरोपों को झूठा बताया
मामला तब और गंभीर हुआ जब छत्तीसगढ़ कर्मचारी-अधिकारी फेडरेशन के लेटरहैड पर एक शिकायत पीएमओ और सीएम तक पहुंची थी। इसमें आरोप था
कि ग्वालियर के अरुण प्रकाशन से साठगांठ कर प्राचार्यों को तबादले की धमकी देकर किताबें और अन्य सामग्री खरीदी गई थी। हालांकि, शिकायतकर्ता ने बाद में इसे फर्जी बताया, लेकिन विभाग ने इसे आधार बनाकर जांच की
दिशा बदल दी। सवाल अब यह उठता है कि अगर शिकायत झूठी थी तो क्या जांच में मिली गड़बड़ी और बिना ऑडिट किए खर्च हुए करोड़ों की राशि भी फर्जी हो गई?
विशेषज्ञों ने क्या कहा
रिटायर्ड आईएएस डॉ. सुशील त्रिवेदी ने कहा कि इस मामले में गंभीरता नहीं बरती गई। किसी भी स्तर पर यह जांच साफ-साफ नहीं की गई।
तय नियमों के मुताबिक खरीदी हुई या नहीं, इसकी जिम्मेदारी किस अफसर की थी, इसको जाँच होनी चाहिए थी। अगर गड़बड़ी हुई तो शासन को इसका नुकसान कितना हुआ, यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए था।
निष्कर्ष
प्रदेश के सरकारी कॉलेजों में करोड़ों रुपये की गड़बड़ी की जांच में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि जब वित्तीय अनियमितताओं के संकेत मिले थे, तो क्यों कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई?
और न ही जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई की गई। यह मामला राज्य सरकार के शिक्षा विभाग में बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
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