छत्तीसगढ़ में स्मार्ट मीटर लगाने पर नया विवाद! बिना टेंडर टाटा पावर को काम देने की तैयारी, कांग्रेस ने उठाए गंभीर सवाल
Umeshwari Baghel | Oct 24, 2026, 16:02 IST
रायपुर में स्मार्ट मीटर लगाने पर नया विवाद
छत्तीसगढ़ में करीब चार हजार औद्योगिक बिजली उपभोक्ताओं के यहां स्मार्ट मीटर लगाने की योजना विवादों में घिर गई है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकारी बिजली कंपनी बिना खुली टेंडर प्रक्रिया के यह काम टाटा पावर को देने की तैयारी कर रही है। पार्टी ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे वित्तीय अनियमितता की आशंका वाला मामला बताया है।
कांग्रेस नेता कन्हैया अग्रवाल का कहना है कि प्रदेश में पहले से मीटर (Chhattisgarh Smart Meter Controversy) रीडिंग की ऑनलाइन व्यवस्था काम कर रही है। इसके बावजूद नई कंपनी को काम देने की जरूरत क्यों पड़ रही है, इसका स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए। उन्होंने पूरी प्रक्रिया रद्द करने और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच कराने की मांग की है। साथ ही चेतावनी दी है कि फैसला वापस नहीं हुआ तो मामला हाई कोर्ट तक ले जाएंगे।
छत्तीसगढ़ में बिजली की मीटरिंग (Tata Power Tender Dispute) व्यवस्था को लेकर नया विवाद सामने आया है। मामला प्रदेश के करीब चार हजार उच्च दाब यानी एचटी औद्योगिक बिजली उपभोक्ताओं से जुड़ा है। इन उपभोक्ताओं के परिसरों में स्मार्ट मीटर लगाने की तैयारी चल रही है।
कांग्रेस ने इस काम को निजी कंपनी टाटा पावर को सौंपने की प्रस्तावित प्रक्रिया पर आपत्ति जताई है। पार्टी का आरोप है कि इसके लिए खुली निविदा नहीं निकाली जा रही है। ऐसे में दूसरी कंपनियों को प्रतिस्पर्धा का मौका नहीं मिलेगा।
कांग्रेस का कहना है कि सरकारी (CSPDCL Smart Meter Project) बिजली कंपनी से जुड़े इतने बड़े काम में पारदर्शिता जरूरी है। अगर बिना खुली टेंडर प्रक्रिया के किसी एक कंपनी को जिम्मेदारी दी जाती है, तो इससे सरकारी धन के इस्तेमाल और काम की लागत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के (छत्तीसगढ़ बिजली विभाग) महामंत्री कन्हैया अग्रवाल ने इस मामले में छत्तीसगढ़ स्टेट पावर कंपनी के अध्यक्ष सुबोध कुमार सिंह को ज्ञापन सौंपा है।
उन्होंने मांग की है कि (Tata Power Congress Protest) स्मार्ट मीटर लगाने का काम टाटा पावर को देने की प्रस्तावित प्रक्रिया तुरंत रोकी जाए। साथ ही यह भी जांच हो कि बिना खुली निविदा के काम देने की तैयारी किन परिस्थितियों में की गई।
अग्रवाल ने आरोप लगाया कि इस फैसले से सरकारी बिजली कंपनी को करोड़ों रुपए का नुकसान हो सकता है। उनका कहना है कि किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पहले उसकी जरूरत, लागत और उससे मिलने वाले फायदे की पूरी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
उन्होंने संबंधित अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कराने की भी मांग की है।
कांग्रेस ने स्मार्ट मीटर लगाने की नई तैयारी के साथ प्रदेश में पहले से मौजूद बिजली मीटर रीडिंग व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं।
कन्हैया अग्रवाल के मुताबिक, साल 2010 में खुली निविदा के जरिए राज्य में ऑटोमैटिक मीटर रीडिंग यानी एएमआर सिस्टम लगाया गया था। इस व्यवस्था के जरिए औद्योगिक बिजली कनेक्शनों की रीडिंग ऑनलाइन ली जाती है।
उनका दावा है कि यह सिस्टम करीब 15 साल से काम कर रहा है। रायपुर के गुढ़ियारी स्थित सेंट्रल कंट्रोल रूम से औद्योगिक उपभोक्ताओं की बिजली खपत पर नजर रखी जाती है।
ऐसे में कांग्रेस का सवाल है कि जब मौजूदा व्यवस्था काम कर रही है, तो उसे बदलने की जरूरत क्यों पड़ रही है।
पार्टी का कहना है कि पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि पुराने सिस्टम में क्या तकनीकी कमी है। नई व्यवस्था से बिजली कंपनी को क्या फायदा होगा और उस पर कितना खर्च आएगा, इसकी जानकारी भी सामने आनी चाहिए।
हालांकि, मौजूदा एएमआर सिस्टम और प्रस्तावित स्मार्ट मीटर व्यवस्था की तकनीकी क्षमताओं में कितना अंतर है, इसकी स्वतंत्र जानकारी सामने नहीं आई है।
इस विवाद में टाटा पावर के बिजली वितरण लाइसेंस का मुद्दा भी सामने आया है।
कन्हैया अग्रवाल के अनुसार, टाटा पावर ने 4 दिसंबर 2025 को रायपुर क्षेत्र में बिजली वितरण का लाइसेंस हासिल करने के लिए आवेदन किया था।
कांग्रेस नेता का कहना है कि जिस कंपनी ने बिजली वितरण के क्षेत्र में उतरने के लिए आवेदन किया है, उसी को औद्योगिक उपभोक्ताओं की मीटरिंग से जुड़ा काम देना उचित नहीं होगा।
उनके मुताबिक, इससे हितों के टकराव की स्थिति बन सकती है। उन्होंने आशंका जताई है कि मीटरिंग से जुड़े काम और उपभोक्ताओं के बिजली खपत के आंकड़ों तक पहुंच मिलने से संबंधित कंपनी को व्यावसायिक फायदा हो सकता है।
हालांकि, केवल वितरण लाइसेंस के लिए आवेदन करने से हितों का टकराव साबित नहीं होता। यह स्पष्ट होना जरूरी है कि प्रस्तावित अनुबंध में उपभोक्ताओं के डेटा तक पहुंच, उसके इस्तेमाल और सुरक्षा को लेकर क्या शर्तें रखी गई हैं।
कांग्रेस की सबसे बड़ी आपत्ति खुली निविदा प्रक्रिया को लेकर है। (Tata Power Tender Dispute ) पार्टी का कहना है कि सरकारी बिजली कंपनी के काम में प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता होनी चाहिए।
खुली निविदा में अलग-अलग कंपनियां काम की लागत और अपनी तकनीकी क्षमता के आधार पर प्रस्ताव दे सकती हैं। इससे बिजली कंपनी को उपलब्ध विकल्पों की तुलना करने का अवसर मिलता है।
कांग्रेस का आरोप है कि स्मार्ट मीटर का काम बिना खुली निविदा के देने की तैयारी से इस प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
हालांकि, किसी सरकारी परियोजना में खुली निविदा के अलावा दूसरी खरीद प्रक्रिया अपनाना हर स्थिति में नियमों का उल्लंघन नहीं होता। इसका फैसला संबंधित खरीद नियमों, स्वीकृतियों और अनुबंध की शर्तों के आधार पर किया जाता है।
ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि स्मार्ट मीटर परियोजना के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जा रही है और उसके पीछे क्या कारण हैं।
कांग्रेस नेता ने इस मामले को सरकारी पैसे के इस्तेमाल से भी जोड़ा है। उनका आरोप है कि पहले से काम कर रही मीटर रीडिंग व्यवस्था के बावजूद नई कंपनी को जिम्मेदारी देने से बिजली कंपनी पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है।
उन्होंने सवाल उठाया है कि मौजूदा सिस्टम में अब तक किए गए निवेश का क्या होगा। यदि नई व्यवस्था लागू की जाती है, तो पुराने उपकरणों और तकनीकी ढांचे का इस्तेमाल जारी रहेगा या उन्हें बदला जाएगा।
पार्टी यह भी जानना चाहती है कि प्रस्तावित परियोजना की कुल लागत कितनी है और स्मार्ट मीटर लगाने के बाद संचालन तथा रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी होगी।
फिलहाल सामने आई जानकारी में परियोजना की कुल स्वीकृत लागत या संभावित नुकसान का प्रमाणित आंकड़ा नहीं दिया गया है। इसलिए करोड़ों रुपए के नुकसान की बात कांग्रेस का आरोप है, जिसकी पुष्टि जांच और संबंधित दस्तावेजों से ही हो सकेगी।
कन्हैया अग्रवाल ने कहा है कि अगर स्मार्ट मीटर लगाने की प्रस्तावित प्रक्रिया वापस नहीं ली गई, तो कांग्रेस इस मामले को आगे बढ़ाएगी।
उन्होंने राज्य के ऊर्जा मंत्री और राज्यपाल के सामने भी यह मुद्दा उठाने की बात कही है।
कांग्रेस की मांग है कि पहले पूरे मामले की जांच कराई जाए। इसके बाद ही स्मार्ट मीटर लगाने के संबंध में कोई अंतिम फैसला लिया जाए।
अग्रवाल ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर सरकारी बिजली कंपनी ने अपनी प्रक्रिया पर दोबारा विचार नहीं किया, तो कानूनी रास्ता अपनाया जाएगा।
उन्होंने हाई कोर्ट जाने की बात कही है। कांग्रेस का कहना है कि सरकारी बिजली व्यवस्था से जुड़े फैसलों में प्रदेश के हित और सार्वजनिक धन की सुरक्षा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
इस पूरे मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण बात सरकारी बिजली कंपनी का पक्ष है। कंपनी को स्पष्ट करना होगा कि चार हजार औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए नई मीटरिंग व्यवस्था लाने की जरूरत क्या है।
इसके अलावा टाटा पावर को काम देने की प्रक्रिया, संभावित लागत और मौजूदा एएमआर सिस्टम के भविष्य को लेकर भी कई सवाल हैं।
उपलब्ध खबर में छत्तीसगढ़ स्टेट पावर कंपनी या टाटा पावर का विस्तृत आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है। इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि काम देने में वित्तीय अनियमितता साबित हो चुकी है।
फिलहाल कांग्रेस ने प्रस्तावित प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाते हुए उसे निरस्त करने की मांग की है। अब देखना होगा कि बिजली कंपनी इन आपत्तियों पर क्या जवाब देती है और स्मार्ट मीटर लगाने की योजना को लेकर आगे क्या फैसला होता है।
चार हजार औद्योगिक उपभोक्ताओं के स्मार्ट मीटर पर विवाद
कांग्रेस ने इस काम को निजी कंपनी टाटा पावर को सौंपने की प्रस्तावित प्रक्रिया पर आपत्ति जताई है। पार्टी का आरोप है कि इसके लिए खुली निविदा नहीं निकाली जा रही है। ऐसे में दूसरी कंपनियों को प्रतिस्पर्धा का मौका नहीं मिलेगा।
कांग्रेस का कहना है कि सरकारी (CSPDCL Smart Meter Project) बिजली कंपनी से जुड़े इतने बड़े काम में पारदर्शिता जरूरी है। अगर बिना खुली टेंडर प्रक्रिया के किसी एक कंपनी को जिम्मेदारी दी जाती है, तो इससे सरकारी धन के इस्तेमाल और काम की लागत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कांग्रेस नेता ने पावर कंपनी के अध्यक्ष को सौंपा ज्ञापन
उन्होंने मांग की है कि (Tata Power Congress Protest) स्मार्ट मीटर लगाने का काम टाटा पावर को देने की प्रस्तावित प्रक्रिया तुरंत रोकी जाए। साथ ही यह भी जांच हो कि बिना खुली निविदा के काम देने की तैयारी किन परिस्थितियों में की गई।
अग्रवाल ने आरोप लगाया कि इस फैसले से सरकारी बिजली कंपनी को करोड़ों रुपए का नुकसान हो सकता है। उनका कहना है कि किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पहले उसकी जरूरत, लागत और उससे मिलने वाले फायदे की पूरी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
उन्होंने संबंधित अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कराने की भी मांग की है।
2010 से चल रही व्यवस्था बदलने की जरूरत क्यों?
कन्हैया अग्रवाल के मुताबिक, साल 2010 में खुली निविदा के जरिए राज्य में ऑटोमैटिक मीटर रीडिंग यानी एएमआर सिस्टम लगाया गया था। इस व्यवस्था के जरिए औद्योगिक बिजली कनेक्शनों की रीडिंग ऑनलाइन ली जाती है।
उनका दावा है कि यह सिस्टम करीब 15 साल से काम कर रहा है। रायपुर के गुढ़ियारी स्थित सेंट्रल कंट्रोल रूम से औद्योगिक उपभोक्ताओं की बिजली खपत पर नजर रखी जाती है।
ऐसे में कांग्रेस का सवाल है कि जब मौजूदा व्यवस्था काम कर रही है, तो उसे बदलने की जरूरत क्यों पड़ रही है।
पार्टी का कहना है कि पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि पुराने सिस्टम में क्या तकनीकी कमी है। नई व्यवस्था से बिजली कंपनी को क्या फायदा होगा और उस पर कितना खर्च आएगा, इसकी जानकारी भी सामने आनी चाहिए।
हालांकि, मौजूदा एएमआर सिस्टम और प्रस्तावित स्मार्ट मीटर व्यवस्था की तकनीकी क्षमताओं में कितना अंतर है, इसकी स्वतंत्र जानकारी सामने नहीं आई है।
टाटा पावर के वितरण लाइसेंस आवेदन पर भी सवाल
कन्हैया अग्रवाल के अनुसार, टाटा पावर ने 4 दिसंबर 2025 को रायपुर क्षेत्र में बिजली वितरण का लाइसेंस हासिल करने के लिए आवेदन किया था।
कांग्रेस नेता का कहना है कि जिस कंपनी ने बिजली वितरण के क्षेत्र में उतरने के लिए आवेदन किया है, उसी को औद्योगिक उपभोक्ताओं की मीटरिंग से जुड़ा काम देना उचित नहीं होगा।
उनके मुताबिक, इससे हितों के टकराव की स्थिति बन सकती है। उन्होंने आशंका जताई है कि मीटरिंग से जुड़े काम और उपभोक्ताओं के बिजली खपत के आंकड़ों तक पहुंच मिलने से संबंधित कंपनी को व्यावसायिक फायदा हो सकता है।
हालांकि, केवल वितरण लाइसेंस के लिए आवेदन करने से हितों का टकराव साबित नहीं होता। यह स्पष्ट होना जरूरी है कि प्रस्तावित अनुबंध में उपभोक्ताओं के डेटा तक पहुंच, उसके इस्तेमाल और सुरक्षा को लेकर क्या शर्तें रखी गई हैं।
बिना टेंडर काम देने पर क्यों उठ रहे सवाल?
खुली निविदा में अलग-अलग कंपनियां काम की लागत और अपनी तकनीकी क्षमता के आधार पर प्रस्ताव दे सकती हैं। इससे बिजली कंपनी को उपलब्ध विकल्पों की तुलना करने का अवसर मिलता है।
कांग्रेस का आरोप है कि स्मार्ट मीटर का काम बिना खुली निविदा के देने की तैयारी से इस प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
हालांकि, किसी सरकारी परियोजना में खुली निविदा के अलावा दूसरी खरीद प्रक्रिया अपनाना हर स्थिति में नियमों का उल्लंघन नहीं होता। इसका फैसला संबंधित खरीद नियमों, स्वीकृतियों और अनुबंध की शर्तों के आधार पर किया जाता है।
ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि स्मार्ट मीटर परियोजना के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जा रही है और उसके पीछे क्या कारण हैं।
करोड़ों रुपए के नुकसान की आशंका जताई
उन्होंने सवाल उठाया है कि मौजूदा सिस्टम में अब तक किए गए निवेश का क्या होगा। यदि नई व्यवस्था लागू की जाती है, तो पुराने उपकरणों और तकनीकी ढांचे का इस्तेमाल जारी रहेगा या उन्हें बदला जाएगा।
पार्टी यह भी जानना चाहती है कि प्रस्तावित परियोजना की कुल लागत कितनी है और स्मार्ट मीटर लगाने के बाद संचालन तथा रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी होगी।
फिलहाल सामने आई जानकारी में परियोजना की कुल स्वीकृत लागत या संभावित नुकसान का प्रमाणित आंकड़ा नहीं दिया गया है। इसलिए करोड़ों रुपए के नुकसान की बात कांग्रेस का आरोप है, जिसकी पुष्टि जांच और संबंधित दस्तावेजों से ही हो सकेगी।
ऊर्जा मंत्री और राज्यपाल तक मामला ले जाने की तैयारी
उन्होंने राज्य के ऊर्जा मंत्री और राज्यपाल के सामने भी यह मुद्दा उठाने की बात कही है।
कांग्रेस की मांग है कि पहले पूरे मामले की जांच कराई जाए। इसके बाद ही स्मार्ट मीटर लगाने के संबंध में कोई अंतिम फैसला लिया जाए।
अग्रवाल ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर सरकारी बिजली कंपनी ने अपनी प्रक्रिया पर दोबारा विचार नहीं किया, तो कानूनी रास्ता अपनाया जाएगा।
उन्होंने हाई कोर्ट जाने की बात कही है। कांग्रेस का कहना है कि सरकारी बिजली व्यवस्था से जुड़े फैसलों में प्रदेश के हित और सार्वजनिक धन की सुरक्षा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
अब बिजली कंपनी के जवाब पर नजर
इसके अलावा टाटा पावर को काम देने की प्रक्रिया, संभावित लागत और मौजूदा एएमआर सिस्टम के भविष्य को लेकर भी कई सवाल हैं।
उपलब्ध खबर में छत्तीसगढ़ स्टेट पावर कंपनी या टाटा पावर का विस्तृत आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है। इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि काम देने में वित्तीय अनियमितता साबित हो चुकी है।
फिलहाल कांग्रेस ने प्रस्तावित प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाते हुए उसे निरस्त करने की मांग की है। अब देखना होगा कि बिजली कंपनी इन आपत्तियों पर क्या जवाब देती है और स्मार्ट मीटर लगाने की योजना को लेकर आगे क्या फैसला होता है।
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