गुरु घासीदास यूनिवर्सिटी में सुदामा योजना पर बवाल, स्टाफ में नाराजगी
NEWS IN SHORT
- गुरु घासीदास यूनिवर्सिटी आदेश विवाद
- वेतन दान को लेकर कर्मचारियों में नाराजगी
- जीजीयू सुदामा योजना पर उठे सवाल
- स्वैच्छिक दान या दबाव की चर्चा तेज
- बिलासपुर विश्वविद्यालय में माहौल गर्म
NEWS IN DETAIL
Bilaspur। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय एक बार फिर चर्चा में है। इस बार मामला कर्मचारियों, शिक्षकों और अधिकारियों से जुड़ा एक आर्थिक सहयोग आदेश है। विश्वविद्यालय प्रबंधन ने एक निर्देश जारी कर सभी फैकल्टी और स्टाफ से जून या जुलाई 2026 के वेतन में से एक दिन का वेतन स्वेच्छा से दान करने की अपील की है। इस आदेश के सामने आने के बाद परिसर में असंतोष का माहौल बन गया हैं।
विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि यह पहल जीजीयू सुदामा योजना के तहत की जा रही है, जिसका उद्देश्य संस्थान में शैक्षणिक और सामाजिक गतिविधियों को मजबूत करना है। हालांकि, कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग इसे लेकर सवाल उठा रहा है और इसे दबावपूर्ण व्यवस्था के रूप में देख रहा है।
आदेश में क्या कहा गया है
विश्वविद्यालय के वित्त अनुभाग की ओर से जारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि यह योगदान पूरी तरह स्वैच्छिक होगा। आदेश में कहा गया है कि जो भी शिक्षक, अधिकारी या कर्मचारी इसमें भाग लेना चाहते हैं, वे सहमति पत्र जमा करें। इसके लिए अंतिम तारीख 20 जून या 20 जुलाई 2026 निर्धारित की गई है।
यह निर्णय विद्यापरिषद की स्थायी समिति की 244वीं बैठक में लिए गए प्रस्ताव के आधार पर लागू किया गया है। प्रशासन का दावा है कि यह किसी भी प्रकार की अनिवार्य कटौती नहीं है और केवल इच्छुक लोग ही इसमें योगदान देंगे।
कर्मचारियों में नाराजगी
आदेश जारी होने के बाद विश्वविद्यालय के कई शिक्षक और कर्मचारी असहज नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि पहले से ही विभिन्न योजनाओं के नाम पर आर्थिक सहयोग लिया जा रहा है। कुछ कर्मचारियों ने आरोप लगाया है कि वे पहले से ही स्वाभिमान थाली जैसी योजनाओं के लिए हर महीने एक दिन का वेतन दे रहे हैं।
उनका तर्क है कि जब पहले से ही इस तरह की कटौती या योगदान जारी है, तो बार बार नए मदों में दान की मांग से आर्थिक दबाव बढ़ता है। इससे कर्मचारियों के बीच असंतोष भी पैदा हो रहा है।
दबाव को लेकर उठे सवाल
कुछ फैकल्टी सदस्यों ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि दान को भले ही स्वैच्छिक कहा गया हो, लेकिन व्यवहारिक स्थिति अलग है। उनका कहना है कि जो लोग योगदान नहीं देते, उन्हें भविष्य में इन्क्रीमेंट, पदोन्नति या प्रशासनिक कामकाज में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि विश्वविद्यालय आदेश में ऐसी किसी भी बात का उल्लेख नहीं है। प्रशासन की ओर से यह दोहराया गया है कि किसी भी कर्मचारी पर दबाव नहीं डाला जा रहा है। इसके बावजूद परिसर में इस मुद्दे को लेकर चर्चा और आशंकाओं का दौर जारी है।
विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष
प्रबंधन का कहना है कि यह पहल सामाजिक सहयोग और संस्थागत विकास की भावना से जुड़ी है। विश्वविद्यालय का उद्देश्य किसी पर आर्थिक बोझ डालना नहीं है, बल्कि इच्छुक लोगों को एक मंच देना है ताकि वे संस्थान की गतिविधियों में योगदान दे सकें।
प्रशासन का यह भी दावा है कि इस तरह की योजनाएं कई शैक्षणिक संस्थानों में पहले से चल रही हैं, जहां कर्मचारी स्वेच्छा से सामाजिक या शैक्षणिक फंड में योगदान करते हैं। जीजीयू सुदामा योजना भी इसी दिशा में एक प्रयास है।
लगातार उठ रहे सवालों के बीच माहौल
पिछले कुछ समय से विश्वविद्यालय में प्रशासनिक फैसलों को लेकर पहले भी चर्चाएं होती रही हैं। इसी बीच यह नया आदेश आने से माहौल और संवेदनशील हो गया है। कई कर्मचारी संगठन इस मामले पर आंतरिक स्तर पर चर्चा कर रहे हैं और आगे सामूहिक निर्णय लेने की बात भी सामने आ रही है।
कुल मिलाकर स्थिति यह है कि प्रशासन इसे स्वैच्छिक पहल बता रहा है, जबकि कर्मचारियों का एक वर्ग इसे अनौपचारिक दबाव के रूप में देख रहा है। यही विरोधाभास विश्वविद्यालय परिसर में असमंजस की स्थिति पैदा कर रहा है।
FAQ
- क्या गुरु घासीदास विश्वविद्यालय में वेतन काटना अनिवार्य है?
नहीं, विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यह योगदान अनिवार्य नहीं है। यह पूरी तरह स्वैच्छिक है। यानी शिक्षक, अधिकारी या कर्मचारी अपनी इच्छा से ही एक दिन का वेतन दान कर सकते हैं। किसी पर जबरदस्ती या बाध्यता नहीं है। - यह वेतन दान किस योजना के तहत लिया जा रहा है?
यह पहल जीजीयू सुदामा योजना के अंतर्गत की जा रही है। विश्वविद्यालय का कहना है कि इस योजना का उद्देश्य संस्थान की शैक्षणिक और सामाजिक गतिविधियों को मजबूत करना है। इसके लिए विद्यापरिषद की स्थायी समिति के निर्णय के बाद यह प्रस्ताव लागू किया गया है। - कर्मचारी इस आदेश पर नाराज क्यों हैं?
कई शिक्षक और कर्मचारी मानते हैं कि पहले से ही अलग-अलग योजनाओं के नाम पर आर्थिक सहयोग लिया जाता रहा है। ऐसे में बार-बार वेतन से योगदान मांगने पर असंतोष बढ़ रहा है। कुछ लोग इसे अप्रत्यक्ष दबाव के रूप में भी देख रहे हैं, हालांकि प्रशासन इस बात से सहमत नहीं है।
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